पोचम्मा दोपहर में आई और दरवाज़े के बाहर ही खड़ी रही। रामुलु आँगन में उलटी रखी एक चारपाई पर काम कर रहा था।
जेठ में उस इलाक़े में सब लोग बाहर सोते हैं और चारपाईें जून से पहले ठीक करा ली जाती हैं। रामुलु के पास हर साल इन्हीं दिनों काम का ढेर लग जाता था। नलगोंडा की तरफ़ अब भी चारपाई बुनवाई जाती है, हालाँकि निवार अब प्लास्टिक की आती है और खजूर वाली मुश्किल से मिलती है।
अड़सठ बरस की उम्र में उसकी उँगलियाँ अब भी वही खींच लेती थीं जो जवान आदमी डंडे से खींचता है। 'क्या है?' उसने बिना ऊपर देखे पूछा। 'चारपाई चाहिए।' 'नाप रख जा, हफ़्ते भर में हो जाएगी।' 'वैसी वाली चाहिए।'
निवार उसकी मुट्ठी में थी और उसका हाथ वहीं रुक गया।
उस इलाक़े में उसे कोई जादूगर नहीं कहता था और वह ख़ुद भी ऐसा कुछ नहीं मानता था। बात बस इतनी थी कि जब घर में कोई लंबी बीमारी में पड़ जाए, तो लोग कहते थे कि रामुलु से बुनवा लो।
बीमार आदमी चारपाई पर दो महीने पड़ा रहे तो निवार बीच से बैठ जाती है। शरीर गड्ढे में चला जाता है, करवट लेना बंद हो जाता है, और पीठ पर घाव पड़ने लगते हैं। यही ज़्यादातर लोगों को ले जाता है, बीमारी नहीं।
रामुलु की एक गाँठ थी जो उसके नाना की थी।
उससे बुनी चारपाई बीच से नहीं बैठती। आदमी जहाँ लेटा है वहीं रहता है, बराबर, और वह सँभल जाता है। ग्यारह बार यह हो चुका था और उसमें से नौ बार आदमी उठ खड़ा हुआ था।
उसकी क़ीमत भी सबको मालूम थी।
वह गाँठ डंडे से नहीं कसती। वह सिर्फ़ हाथ से कसती है, एक-एक फंदा, और उसमें चार दिन लगते हैं। चार दिन झुककर बैठने के बाद रामुलु की कमर तीन हफ़्ते के लिए जकड़ जाती थी। हर बार पहले से ज़्यादा दिन लगते थे।
ग्यारह चारपाईों ने उसकी अपनी रीढ़ को वह टेढ़ापन दे दिया था जो अब सीधा नहीं होता। 'किसके लिए?' उसने पूछा। पोचम्मा ने ज़मीन की तरफ़ देखा। 'यादगिरि के लिए।' आँगन में कुछ देर सिर्फ़ निवार खिंचने की आवाज़ आती रही, फिर वह भी रुक गई।
यादगिरि उन्नीस बरस पहले गाँव का सरपंच था।
उन्हीं दिनों नहर के पानी की बारी को लेकर झगड़ा हुआ था और उसमें रामुलु के छोटे भाई का नाम आया था। नाम किसने लिखवाया, यह पूरे गाँव को मालूम था। भाई चौदह महीने अंदर रहा और जब बाहर आया तो उसने बोलना कम कर दिया। चार साल बाद वह चला गया।
यादगिरि पर कभी कुछ साबित नहीं हुआ, क्योंकि साबित करने के लिए भी आदमी चाहिए होते हैं। 'उसे क्या हुआ?' रामुलु ने पूछा। 'लक़वा मार गया, दो महीने हो गए। दाहिनी तरफ़ बिलकुल नहीं चलती।' 'तो उसे अस्पताल ले जाओ।'
'ले गए थे। हैदराबाद से लौटा दिया।' रामुलु ने कहा कि नाप रख जा और वह अंदर चला गया। उस शाम घर में बात हुई। उसकी बहू ने साफ़ मना किया। उसके लड़के ने कहा कि दूसरी बुन दो, अच्छी बुन दो, पूरे गाँव में सबसे अच्छी बुन दो, पर वाली मत बुनो।
रामुलु ने एक बार पहले भी मना किया था।
आठ साल पहले एक ठेकेदार आया था, जिसके बाप की कमर टूटी थी, और उसने पैसे भी ठीक-ठाक कहे थे। रामुलु ने कह दिया था कि उम्र हो गई। किसी ने बुरा नहीं माना। इस बार मना करना उससे भी आसान था।
वह तीन दिन कुछ नहीं बोला। चौथे दिन सुबह उसने तुम्मे की लकड़ी वाला पुराना ढाँचा निकाला, उसे पानी से पोंछा, और आँगन के बीच में उलटा करके रख दिया। उसने अपनी बहू से इतना ही कहा कि खाना वहीं ले आना।
बुनाई चार दिन चली।
पहले दिन वह छह घंटे बैठा और दूसरे दिन आठ। तीसरे दिन उससे उठा नहीं गया और उसका लड़का उसे बाँह पकड़कर उठाकर अंदर ले गया। चौथे दिन उसने सिर्फ़ किनारे की कसाई की, जो सबसे भारी काम है, और शाम को चारपाई सीधी करके देखी।
निवार तनी हुई थी। बीच में हाथ रखकर दबाओ तो वह उतना ही धँसता था जितना किनारे पर। चारपाई उसी रात यादगिरि के घर पहुँचा दी गई। रामुलु उसे देने नहीं गया और उसने पैसे भी नहीं लिए, इसलिए नहीं कि वह कुछ जताना चाहता था, बल्कि इसलिए कि लेने के लिए भी वहाँ जाना पड़ता।
उसकी कमर इस बार तीन हफ़्ते में नहीं खुली, जैसी पिछली दस बार खुलती आई थी।
पाँच हफ़्ते लगे और उसके बाद भी वह पहले जैसी नहीं हुई। सुबह उठते वक़्त अब उसे दीवार का सहारा लेना पड़ता था और झुककर बैठना पूरी तरह बंद हो गया।
इसके बाद यादगिरि ग्यारह महीने और जिया।
वह उठकर चला नहीं, पर वह गड्ढे में भी नहीं गया। पीठ पर घाव नहीं पड़ा और वह आख़िर तक करवट लेता रहा। मरने के बाद पोचम्मा ने वह चारपाई किसी को नहीं दी और वह उनके बरामदे में खड़ी रहती है।
रामुलु के घर में हर चारपाई उसकी अपनी बुनी हुई है।
सिर्फ़ एक को छोड़कर, जो उसकी अपनी है और जो उसने तीस बरस पहले बुनी थी। वह बीच से बैठ चुकी है और उसमें एक कोने की निवार भी ढीली है। उसे दोबारा बुनने में चार दिन लगते और वे चार दिन हर बार किसी और के हिस्से में चले जाते थे। अब वे चार दिन उसके पास हैं ही नहीं। चारपाई आँगन में उसी जगह खड़ी रहती है, बिस्तर समेत, और गर्मियों में रामुलु उसके बग़ल में ज़मीन पर चटाई डालकर सोता है।