बाँसुरी में सात छेद होते हैं। यह बात सिरतौर को उसके बाप ने बताई थी और बाप को उसके बाप ने।
वह सोन के किनारे वाले उस गाँव में अकेला बनाने वाला था। बाँस वह ख़ुद काटता था, बरसात के बाद, जब गाँठें दूर-दूर पड़ती हैं। फिर वह उसे छह महीने छाँव में सुखाता था और उसके बाद ही छेद करता था, गरम सलाख से, एक-एक करके, नाप लेकर।
उसकी बाँसुरियाँ अच्छी मानी जाती थीं और मेले में हाथों-हाथ बिक जाती थीं।
जिस बरस उसकी पत्नी गई, उस बरस उसने बाँस नहीं काटा।
उसकी पत्नी का नाम लेकर वह बाद में कभी बात नहीं करता था। वह चालीस बरस उसके साथ रही थी और उसे बाँसुरी की समझ नहीं थी। वह इतना जानती थी कि कौन सी अच्छी बनी है और कौन सी नहीं, और वह यह आवाज़ से नहीं बताती थी, हाथ में लेकर बताती थी। सिरतौर उससे पूछे बिना कोई बाँसुरी मेले में नहीं ले जाता था।
आठ महीने उसने कुछ नहीं बनाया। नौवें महीने में वह पिछवाड़े बैठा था और उसके हाथ में एक पुरानी खपच्ची थी जो दो बरस से पड़ी थी। उसने सलाख गरम की और बिना सोचे उस पर छेद करने लगा।
उसने आठ किए।
आठवाँ छेद उसने कहाँ किया, यह उसे बाद में याद नहीं आया। वह नाप में नहीं था। वह किसी सुर पर नहीं पड़ता था। उसने उसे मिट्टी से भरने की कोशिश की और मिट्टी टिकी नहीं।
उसने वह बाँसुरी फेंकी नहीं। उसने उसे छप्पर की खपच्चियों में खोंस दिया और भूल गया।
उस साल मेला आया और सिरतौर बेचने नहीं गया, पर चंदिया गई।
चंदिया उसकी भांजी थी, ग्यारह बरस की, और उसे बाँसुरी बजाना आता नहीं था। वह छप्पर से वही वाली खींच लाई क्योंकि वह सबसे ऊपर थी।
मेले में उसने उसे फूँका।
उसने उसे ठीक से फूँका भी नहीं। ग्यारह बरस की लड़की जैसे फूँकती है, वैसे ही, बिना उँगली किसी छेद पर रखे। आवाज़ एक ही निकली और वह लंबी नहीं थी।
जो हुआ वह उसने नहीं सुना। भीड़ में एक औरत रो पड़ी। फिर एक आदमी बैठ गया। एक बूढ़ा जो नौ बरस से अपनी बेटी से नहीं मिला था, वह वहीं खड़ा रह गया और उसके बाद उसने घर लौटकर चिट्ठी लिखवाई।
चंदिया को कुछ सुनाई नहीं दिया। उसे लगा कि बाँसुरी बजी ही नहीं।
वह उसे वापस ले आई और उसने सिरतौर को सब बताया।
सिरतौर ने उसे लेकर ख़ुद फूँका। उसे भी कुछ सुनाई नहीं दिया।
पर आँगन में बैठी पड़ोस की बुढ़िया ने अपनी चादर मुँह पर रख ली, और बकरी बाँधने वाला लड़का खूँटा छोड़कर खड़ा हो गया।
उस बाँसुरी का सुर उसे बजाने वाले तक कभी नहीं पहुँचता था।
यह बात गाँव में फैलने में एक महीना लगा और उसके बाद सिरतौर के घर लोग आने लगे। किसी का बेटा नाराज़ होकर चला गया था। किसी की बहू छह महीने से बात नहीं कर रही थी। किसी को बस यह बताना था कि उसके भीतर क्या भरा है और उसके पास शब्द नहीं थे।
सिरतौर ने इसके लिए पैसा नहीं लिया और यह उसने पहले ही दिन तय कर लिया था। वजह उसने किसी को नहीं बताई और वजह यह थी कि जो चीज़ उसने बनाई ही नहीं, उसका दाम वह कैसे लेता। लोग फिर भी कुछ न कुछ रख जाते थे। कोई गुड़ रख जाता, कोई तंबाकू। एक आदमी बरसात में दो दिन लगाकर उसका छप्पर ठीक कर गया और बात करने से पहले चला गया।
सिरतौर उन्हें बिठाता, बाँसुरी उनके हाथ में देता, और उनसे कहता कि जिसे सुनाना है उसके सामने बजाओ।
वह ख़ुद कभी उस कमरे में नहीं बैठता था, क्योंकि उसे कुछ सुनाई नहीं देता था और उसे यह देखना अच्छा नहीं लगता था कि बाक़ी सबको सुनाई दे रहा है।
दो बरस यही चला।
उन दो बरसों में कुछ लोग दोबारा आए। एक औरत तीन बार आई और तीनों बार उसने अपने बड़े बेटे के सामने बजाया, और तीसरी बार लड़का बजाने के बीच में उठकर बाहर चला गया। वह चौथी बार नहीं आई। सिरतौर को यह मालूम था कि यह चीज़ हर बार काम नहीं करती, और उसने कभी किसी से यह नहीं कहा कि काम करेगी।
तीसरे बरस उसने चंदिया से कहा कि वह उसे लेकर उस कमरे में बैठे और उसके सामने बजाए।
"मामा, आपको सुनाई नहीं देगा।" "मालूम है।" "तो?" "तू बजा।"
उसने बजाई। सिरतौर बैठा रहा। उसे कुछ सुनाई नहीं दिया, न उस दिन, न उसके बाद कभी।
पर वह रोज़ बैठने लगा। शाम को, उसी कमरे में, और चंदिया रोज़ बजाती रही, और यह उन दोनों के बीच तय हो गया बिना तय किए।
छह महीने बाद उसने फिर बाँस काटा।
उसने जो बाँसुरियाँ उसके बाद बनाईं, उन सबमें सात छेद थे। आठवाँ उसने दोबारा कभी नहीं किया और उसने कोशिश भी नहीं की, क्योंकि उसे मालूम था कि वह उसने किया नहीं था।
वह पुरानी बाँसुरी उसी कमरे में एक कील पर टँगी रही। गाँव के लोग आते रहे और उसे बजाते रहे, और उनमें से कोई भी अपनी बजाई हुई आवाज़ नहीं सुन पाया, और सबने यह बात मान ली, क्योंकि सुनने वाला दूसरी तरफ़ बैठा होता था और उसका चेहरा दिख जाता था।