जिस दिन सर्वे हुआ, हसीना अस्पताल में थी।
उसकी सास को दूसरा दौरा पड़ा था और वह चार दिन मेयो में रही। चार दिन ठेला नहीं लगा। नागपुर नगर निगम की टीम उन्हीं चार दिनों में उस सड़क पर आई, फ़ोटो खींचे, फ़ॉर्म भरवाए, और जो लोग मौजूद थे उनके नाम सूची में चढ़ा दिए।
यह बाईस की बात है।
उस सूची का मतलब वह तब समझी नहीं। समझ चार बरस बाद आई, जब उस सड़क को व्यवस्थित करने का काम शुरू हुआ। शहरी पथ विक्रेता क़ानून के तहत जिनका नाम सर्वे में है उन्हें विक्रय क्षेत्र में जगह मिलती है और पहचान पत्र मिलता है। जिनका नाम नहीं है, वे क़ानून की नज़र में वहाँ हैं ही नहीं।
हसीना का ठेला उस फुटपाथ पर नौ बरस से लगता था। सुबह छह बजे से दोपहर दो बजे तक, धनिया, मिर्च, नींबू, अदरक और मौसम की एक-दो चीज़ें।
नौ बरस के काग़ज़ उसके पास कुछ नहीं थे। ठेले का काग़ज़ नहीं होता।
पहली बार जब निगम की गाड़ी आई, तब पाँच ठेले हटाए गए और उनमें उसका था। सामान गाड़ी में गया और शाम को जुर्माना भरकर छूटा। नुक़सान ग्यारह सौ का हुआ। उसमें दो किलो धनिया था, जो अगले दिन बिकने लायक़ नहीं बचा।
उस शाम उसने अपने बेटे से कहा कि उस क़ानून का नाम लिखकर लाओ।
बेटा उन्नीस का था और मोबाइल की दुकान पर काम करता था। वह नाम लिख लाया और उसके साथ यह भी लिख लाया कि नगर निगम में एक नगर विक्रेता समिति होती है, जिसमें विक्रेताओं के अपने प्रतिनिधि भी होते हैं, और सर्वे से छूट गए लोग उसमें दावा कर सकते हैं।
दावे के लिए यह साबित करना होता है कि आप उस जगह पर पहले से बैठते आए हैं।
यह वह हिस्सा है जिसमें दो बरस लगे।
उसके पास जो चीज़ें निकलीं, वे किसी ने उसे रखने को कही नहीं थीं। उसने वे इसलिए रखी थीं कि फेंकना उसे आता नहीं था। थोक मंडी की पर्चियाँ, जिन पर तारीख़ छपी होती है। पूरे अठारह महीनों की। बिजली वाले का हिसाब, क्योंकि शाम को वह बग़ल की दुकान से बल्ब का तार लेती थी और महीने के तीस रुपए देती थी। जुर्माने की वह रसीद।
इतने से नौ बरस नहीं बनते।
बाक़ी उसने आदमियों से बनवाया। जिस मकान के सामने वह बैठती थी उसके मालिक से, बग़ल के मेडिकल वाले से, स्कूल वैन वाले से जो रोज़ वहीं गाड़ी मोड़ता था, और उस सड़क के दो और ठेले वालों से जिनका नाम सूची में था। सात लोगों ने लिखकर दिया कि यह औरत यहाँ बरसों से बैठती है। आठवाँ नहीं मिला।
सात में से दो ने पहली बार मना किया था। एक ने कहा कि निगम के मामले में नाम नहीं देना चाहता। हसीना उसके पास तीन बार गई और तीसरी बार उसने लिख दिया।
समिति की बैठक साल में तीन-चार बार होती है और उसमें आम आदमी को बोलने का वक़्त पाँच मिनट मिलता है, और वह भी तब जब आपका नाम पहले से दर्ज हो।
पहली बैठक में उसका दावा आगे बढ़ा नहीं, क्योंकि उसके फ़ॉर्म में जगह का ब्योरा ठीक से नहीं लिखा था। फुटपाथ पर पता कैसे लिखा जाता है, यह किसी ने उसे बताया नहीं था। दूसरी बार उसने वह ब्योरा मकान के नंबर के हिसाब से लिखा, जो सही तरीक़ा है।
दूसरी बैठक टल गई।
तीसरी बैठक में एक सदस्य ने उससे पूछा कि आप दो हज़ार बाईस में कहाँ थीं। उसने बताया कि मेयो अस्पताल में। उससे पूछा गया कि इसका कोई काग़ज़ है। और यहीं वह चीज़ काम आई जो उसने चार बरस पहले, बिना किसी वजह के, एक डिब्बे में डाल दी थी। सास के भर्ती होने के परचे, जिन पर उन चार दिनों की तारीख़ें थीं।
उन तारीख़ों का सर्वे की तारीख़ से मिलान हुआ। चारों दिन उसी हफ़्ते के थे।
इससे उसका दावा सही हो गया, और यह इसलिए हुआ कि एक अफ़सर ने वह मिलान करने की मेहनत की। उसका नाम हसीना को आज भी नहीं मालूम, क्योंकि बैठक में नाम बताए नहीं जाते।
पहचान पत्र अक्षय तृतीया के दो दिन बाद मिला। अप्रैल की गरमी शुरू हो चुकी थी और उस हफ़्ते सुबह छह बजे भी सड़क तप रही थी।
उसके साथ जगह भी तय हुई। पहले वह जहाँ बैठती थी, वहाँ से नौ फ़ुट आगे, क्योंकि विक्रय क्षेत्र में जगहें नापकर दी जाती हैं।
नौ फ़ुट आगे वाली जगह पहली वाली से थोड़ी ख़राब है। छाँव वहाँ नहीं पहुँचती। यह उसने मानने से पहले पूछा भी था और उसे बताया गया कि नाप बदला नहीं जा सकता। उसने दोबारा नहीं पूछा।
उसने ले ली।
जगह के आगे सफ़ेद रंग से नंबर लिखा जाता है, ताकि निगम की गाड़ी को मालूम रहे कि यहाँ किसका हक़ है। उसका नंबर सैंतालीस है। हर बरसात में वह रंग हल्का पड़ जाता है और हर अक्टूबर में हसीना उसे अपने हाथ से दोबारा भर देती है, उसी सफ़ेद रंग से, जिसकी डिबिया वह घर में रखती है।