कार्ड में पाँच लोग थे और हर महीने पच्चीस किलो मिलना था।
लिछमा को अठारह या बीस मिलता था।
जालोर ज़िले के उस गाँव में राशन की दुकान हफ़्ते में तीन दिन खुलती है। मशीन पर अँगूठा लगता है, तराज़ू पर अनाज तुलता है, और परची निकलती है।
फ़र्क़ की शिकायत वहाँ हर महीने होती थी और वह बहस में ख़त्म हो जाती थी। दुकानदार कहता था कि बोरी में इतना ही आया, और यह बात साबित नहीं की जा सकती।
लिछमा पढ़ी नहीं है। अंक वह पहचान लेती है, क्योंकि मज़दूरी का हिसाब उसे रखना पड़ता था।
परची उसने चार बरस तक नहीं देखी।
इसकी वजह यह थी कि परची अँगूठा लगाने के बाद मशीन से निकलती है और दुकानदार उसे अपने पास रख लेता था। किसी ने माँगी नहीं, इसलिए किसी को दी नहीं गई।
एक बार उसकी भतीजी, जो शहर में पढ़ती है, गाँव आई हुई थी और वह उसके साथ दुकान पर गई।
उसने परची माँगी।
दुकानदार ने दे दी, बिना किसी बहस के।
उस परची पर पच्चीस किलो लिखा था।
तुला था अठारह।
यहीं से सब बदला, और उसमें किसी की चालाकी नहीं थी। परची मशीन बनाती है और मशीन में कार्ड के हिसाब से पूरा अनाज दर्ज होता है। तराज़ू अलग चीज़ है।
यानी काग़ज़ पर पच्चीस निकलता था और हाथ में अठारह आता था, और उस सात किलो का हिसाब कहीं नहीं था।
सात किलो का मतलब उस घर में क्या था, यह गिना जा सकता है। पाँच लोगों के घर में गेहूँ महीने का लगभग बीस किलो लगता है और उसमें से जो कम पड़ता है वह बाज़ार से आता है, अट्ठाईस-तीस रुपए किलो। यानी हर महीने दो सौ रुपए की जगह बनती थी, जो उस घर की चार दिन की मज़दूरी है।
लिछमा ने उस दिन के बाद हर महीने परची लेनी शुरू कर दी।
और उसने उस पर एक चीज़ अपने हाथ से लिखनी शुरू की। तुला हुआ वज़न, अंकों में।
यह लिखना उसे आता था।
ग्यारह महीने में उसके पास ग्यारह परचियाँ थीं, जिन पर दो नंबर थे। एक छपा हुआ, एक हाथ का।
परची माँगना उसने हर बार एक ही तरीक़े से किया। वह अँगूठा लगाने के बाद खड़ी रहती थी और हाथ बढ़ा देती थी, और कुछ कहती नहीं थी। दुकानदार पहले दो-तीन महीने उसे देखता रहा और फिर उसने भी बिना कुछ कहे देना शुरू कर दिया।
इस बीच उसने और कुछ नहीं किया। न शिकायत, न शोर।
वह जानती थी कि एक महीने की एक परची से कुछ नहीं होगा, और दुकानदार को पता चल जाता तो वह परची देना बंद कर देता।
भतीजी उन ग्यारह महीनों में गाँव दो बार आई और दोनों बार उसने परचियाँ जोड़ीं। बीच के महीनों में लिछमा उन्हें बस जमा करती रही और जोड़ कितना बन रहा है, यह उसे पता ही नहीं था। उसे बस यह दिखता था कि हर परची पर दो नंबर हैं और वे बराबर नहीं हैं। यही उसे काफ़ी लगा।
बारहवें महीने में उसने वे ग्यारह परचियाँ अपनी भतीजी से जुड़वाईं।
छपा हुआ जोड़ दो सौ पचहत्तर किलो निकला। हाथ का जोड़ दो सौ चार।
इकहत्तर किलो का फ़र्क़।
शिकायत उसने ब्लॉक के आपूर्ति निरीक्षक के पास दी और उसमें उसने वे ग्यारह परचियाँ लगाईं।
उसके बाद जो हुआ, वह उम्मीद से कम था और शून्य नहीं था।
जाँच हुई और उसमें दुकानदार पर कार्रवाई नहीं हुई, क्योंकि हाथ से लिखा नंबर सबूत नहीं माना गया। यह सही भी था। लिछमा उसमें कुछ भी लिख सकती थी।
हुआ यह कि उस दुकान पर तौल की जाँच हुई और तराज़ू में गड़बड़ी निकली।
वह तराज़ू बदला गया और उसका ख़र्च दुकानदार से लिया गया।
उसके बाद के महीनों में लिछमा को तेईस से चौबीस किलो मिलने लगा, यानी पूरा नहीं, पर सात किलो का फ़र्क़ एक-दो किलो पर आ गया।
जो इकहत्तर किलो गया, वह वापस नहीं आया और उसकी कोई भरपाई नहीं हुई।
जाँच के दिन दुकानदार उससे नाराज़ हुआ और वह नाराज़गी दो-तीन महीने चली। उन महीनों में उसे लाइन में आख़िर में बुलाया गया और एक बार दो घंटे खड़ा रखा गया। लिछमा उन दिनों भी हर बार परची लेती रही, और उसने इसकी शिकायत कहीं नहीं की, क्योंकि उसे यह मालूम था कि दो-तीन महीने की बात है।
गाँव में उसके बाद पाँच-छह और औरतें परची लेने लगीं।
यह अपने आप हुआ और लिछमा ने किसी से कहा नहीं। दुकान पर परची माँगते हुए उसे देखा गया, बस इतना।
उस दुकान पर अब परची अपने आप दी जाती है और यह दुकानदार ने ख़ुद शुरू किया, क्योंकि उससे बहस बंद हो जाती है।
लिछमा की वे ग्यारह परचियाँ अब भी उसके पास हैं, एक कपड़े की थैली में, और उनके साथ बाद की सैंतालीस और हैं। हाथ का नंबर वह अब भी हर महीने लिखती है, हालाँकि फ़र्क़ अब लगभग नहीं आता, और वह जानती है कि उस नंबर का अब कोई काम नहीं है।