स्कूल वैन वह छह बरस चलाती रही। कमाई तय नहीं होती।

हंसाबेन अहमदाबाद के एक इलाक़े में रहती है। उसके पति का देहांत दो हज़ार अठारह में हुआ और उसके बाद वैन उसके पास आ गई, जो पहले वही चलाते थे।

वैन चलाने के लिए हल्के वाहन का लाइसेंस चाहिए और वह उसके पास पहले से था, क्योंकि उन्होंने बरसों पहले उसे सिखा दिया था।

वैन का काम इस तरह चलता है। आप अपने आसपास के घरों से बच्चे जोड़ते हैं, महीने का पैसा तय करते हैं, और स्कूल से आपका कोई रिश्ता नहीं होता।

यानी हर बच्चा अलग ग्राहक है। हर महीने नया हिसाब।

📚 यह भी पढ़ें पिन नंबर
पिन नंबर

इसका असर यह होता है कि छुट्टियों में पैसा नहीं आता, बच्चा स्कूल बदल ले तो पैसा नहीं आता, और डीज़ल बढ़ जाए तो पैसा उतना ही रहता है।

छह बरस में उसकी सबसे अच्छी कमाई सत्रह हज़ार महीने की रही और सबसे ख़राब महीने में सैंतीस सौ।

बस का काम अलग होता है।

स्कूल की बस स्कूल की होती है और चालक तनख़्वाह पर होता है। बारह महीने की तनख़्वाह, छुट्टियों में भी, और डीज़ल स्कूल का।

उस बस के लिए भारी वाहन का लाइसेंस चाहिए।

📚 यह भी पढ़ें ठेला
ठेला

बात यहीं रुकी हुई थी। छह बरस रुकी रही।

भारी वाहन का लाइसेंस लेने के लिए तीन चीज़ें चाहिए। एक, हल्के वाहन का लाइसेंस कम से कम एक बरस पुराना हो, जो उसका था। दो, प्रशिक्षण। तीन, आरटीओ में गाड़ी चलाकर दिखाना, और वह गाड़ी भारी होनी चाहिए।

दूसरी और तीसरी चीज़ में वही अड़चन थी। भारी गाड़ी उसके पास नहीं थी और सीखने के लिए कोई देता नहीं।

प्रशिक्षण के जो सरकारी केंद्र हैं, उनमें उस बरस उसे जगह नहीं मिली। निजी स्कूल का ख़र्च अठारह हज़ार था।

उसने वह ख़र्च किया और उसमें आठ महीने लगे।

📚 यह भी पढ़ें गेहूँ की बोरी
गेहूँ की बोरी

पैसा उसने वैन से जोड़ा नहीं, वह उसने अपनी बहन से लिया और अठारह महीने में लौटाया।

आठ महीने का इंतज़ाम उसने इस तरह किया। वैन सुबह साढ़े छह से नौ और दोपहर डेढ़ से चार चलती है, इसलिए बीच का वक़्त और शाम ख़ाली थे। प्रशिक्षण का मैदान नरोडा की तरफ़ था और वहाँ आने-जाने में डेढ़ घंटा लगता था। गरमी में मई-जून की दोपहरें उसने उसी मैदान में निकालीं, जब पारा तैंतालीस पर होता है और वहाँ छाँव नहीं है।

प्रशिक्षण में जो सबसे मुश्किल निकला, वह चलाना नहीं था।

बस चलाना वैन चलाने से मुश्किल है, पर उसमें सिर्फ़ अभ्यास लगता है। मुश्किल दो और चीज़ें थीं।

पहली, पीछे देखना। बस में शीशे से जो दिखता है वह बहुत कम है और मुड़ते वक़्त पिछला पहिया कहाँ जाएगा, यह अंदाज़े से पता होना चाहिए। इसे सीखने में उसे चार महीने लगे और आज भी वह किसी तंग गली में दो बार उतरकर देखती है।

📚 यह भी पढ़ें पिन नंबर
पिन नंबर

दूसरी चीज़ आदमी थे।

प्रशिक्षण में उसके साथ के सत्रह लोगों में वह अकेली औरत थी। किसी ने उसे रोका नहीं और यह भी सच है कि किसी ने उसे सिखाया भी नहीं। जो प्रशिक्षक था, वह उसे बाक़ी सबसे कम वक़्त देता था, और यह उसने कहा नहीं, यह उसने घड़ी से नापा।

उसने इसका जो हल निकाला, वह चतुर था। उसने सबसे आख़िरी बारी लेनी शुरू कर दी।

आख़िरी बारी में प्रशिक्षक को जल्दी होती है और वह ज़्यादा बोलता नहीं, पर गाड़ी मैदान में खड़ी रहती है और बाक़ी लोग जा चुके होते हैं, इसलिए वह अकेली दस-पंद्रह मिनट और चला लेती थी।

आठ महीने में उसने ऐसे लगभग अस्सी घंटे जोड़े, जो किसी हिसाब में दर्ज नहीं हैं।

📚 यह भी पढ़ें ठेला
ठेला

आरटीओ की जाँच में वह पहली बार में पास हुई। एक ही बार में।

इसके बाद वाला हिस्सा जो हुआ, वह उसने सोचा नहीं था।

लाइसेंस मिलने के बाद उसने चार स्कूलों में अर्ज़ी दी और तीन जगह उससे कहा गया कि हमारे यहाँ बस पर महिला चालक नहीं है।

चौथी जगह उसे रख लिया गया और वह भी इसलिए कि उस स्कूल में लड़कियों की संख्या ज़्यादा थी और उन्हें एक महिला चालक की बात ठीक लगी।

तनख़्वाह इक्कीस हज़ार से शुरू हुई। हर महीने।

📚 यह भी पढ़ें गेहूँ की बोरी
गेहूँ की बोरी

वैन उसने बेची नहीं। वह अब उसके भतीजे के पास है और वही चलाता है, और उसमें से हंसाबेन को कुछ नहीं आता, क्योंकि उसने लेना नहीं चाहा।

बच्चों की तरफ़ से पहले दिन जो हुआ, वह उसे याद है। तीसरी कक्षा की एक लड़की चढ़ते वक़्त रुक गई और उसने पूछा कि आप ही चलाएँगी। उसने कहा कि हाँ। उस लड़की ने और कुछ नहीं पूछा और आगे वाली सीट पर बैठ गई, और अगले दिन से वहीं बैठती रही।

बस में जो चीज़ उसने अपनी तरफ़ से जोड़ी, वह एक शीशा है। बाईं तरफ़ के दरवाज़े के ऊपर उसने एक छोटा गोल शीशा और लगवाया, अपने पैसे से, तीन सौ बीस रुपए में, जिससे उतरते वक़्त आख़िरी सीढ़ी दिख जाती है। स्कूल ने उसे लगाने से मना नहीं किया और उसका पैसा भी नहीं दिया, और अब उस स्कूल की बाक़ी दोनों बसों में भी वैसा शीशा लगा है।