नुक्कड़ की दुकान पर पैसा भेजने का दाम बीस रुपए था, हर बार।
जबलपुर के उस मुहल्ले में यह कोई छिपी बात नहीं थी और किसी ने इसे ग़लत भी नहीं कहा था। दुकान वाला लड़का अपना फ़ोन देता था, अपना डेटा लगाता था, और नंबर ठीक से डालने की ज़िम्मेदारी लेता था। बीस रुपए उसकी मेहनत का दाम थे।
मुश्किल यह थी कि गली की सत्रह औरतें महीने में कई बार भेजती थीं।
मकान का किराया, बिजली, बच्चों की फ़ीस, गाँव में माँ-बाप को, और अपने आदमी के मोबाइल में जब वह बाहर काम पर होता। एक औरत का महीने में औसतन छह बार बनता था। यानी एक सौ बीस रुपए महीना, सिर्फ़ भेजने का।
हेमलता उन सत्रह में थी। वह एक निजी अस्पताल में सफ़ाई करती थी, और तनख़्वाह सात हज़ार आठ सौ थी।
उसके पास फ़ोन था। बटन वाला नहीं, छूने वाला। उसका बेटा उसमें उसे वीडियो चलाकर दे देता था और वह देख लेती थी।
पैसा भेजना उसे नहीं आता था और इसकी वजह पढ़ाई नहीं थी। वह आठवीं पास थी और हिंदी पढ़ लेती थी। वजह डर था।
यह डर बेवजह नहीं था। दो बरस पहले उसी गली की एक औरत के खाते से ग्यारह हज़ार निकल गए थे, किसी फ़ोन पर आए झाँसे से, और वह पैसा वापस नहीं आया। उसके बाद उस गली में यह तय हो गया कि अपने फ़ोन से पैसे का काम नहीं करना।
बीस रुपए उसी तय बात का दाम थे।
हेमलता ने सीखने का फ़ैसला किसी बड़ी वजह से नहीं किया। जुलाई में एक रात उसे बेटे के हॉस्टल में तीन हज़ार भेजने थे और दुकान बंद थी, क्योंकि लड़के के घर में शादी थी, और वह तीन दिन बंद रही।
उन तीन दिनों में उसे यह समझ आया कि उसका पैसा उसके हाथ में नहीं है।
सिखाने वाली उसकी भांजी थी, जो बारहवीं में थी और छुट्टियों में आई हुई थी। उसने कहा कि दस मिनट का काम है।
दस मिनट का नहीं था। उसमें चार हफ़्ते लगे।
इसकी वजह यह थी कि हेमलता को एक-एक कदम रटना नहीं था, उसे यह समझना था कि किस कदम पर पैसा जाता है और किस कदम पर नहीं। यह फ़र्क़ बहुत लोगों को नहीं मालूम होता और डर वहीं से आता है।
पहले हफ़्ते उन्होंने कोई पैसा नहीं भेजा। भांजी ने उसे सिर्फ़ यह दिखाया कि कौन सा पर्दा किस चीज़ का है।
दूसरे हफ़्ते उसने एक रुपया भेजा। अपनी भांजी को ही।
तीसरे हफ़्ते उसने सौ रुपए भेजे और वह चार बार जाँचकर भेजे, यानी नंबर के आख़िरी चार अंक उसने चार बार पढ़े।
चौथे हफ़्ते उसने अपने बेटे को तीन हज़ार भेजे। उसमें उसे सात मिनट लगे और उसका हाथ काँपा।
इसके आगे की बात उसने सोची नहीं थी।
गली में यह बात फैल गई और तीन औरतें उसके पास आईं। उन्होंने कहा कि हमें भी करा दो, यानी वे यह चाहती थीं कि हेमलता उनका पैसा अपने फ़ोन से भेज दे।
उसने मना कर दिया।
यह उसका सबसे ठीक फ़ैसला था और उस वक़्त वह लोगों को बुरा लगा। उसने कहा कि मैं भेज दूँगी तो मैं दुकान बन जाऊँगी, और अगले महीने मैं भी बीस रुपए लेने लगूँगी। सीखो।
सिखाने में उसे नौ महीने लगे और सत्रह में से बारह ने सीखा।
पाँच ने नहीं सीखा। दो के पास छूने वाला फ़ोन नहीं था और तीन ने कहा कि हमसे नहीं होगा। उन तीन में एक की उम्र सत्तर के ऊपर थी।
जो तरीक़ा उसने अपनाया, वह उसी का था जिससे उसने सीखा था। पहले हफ़्ते कोई पैसा नहीं। फिर एक रुपया। फिर सौ।
एक रुपया भेजने पर हर औरत का वही होता था जो उसका हुआ था। हाथ काँपता था। और एक रुपया चला जाए तो कुछ नहीं जाता।
सिखाने का वक़्त उसने रविवार से निकाला। अस्पताल की उसकी ड्यूटी सुबह छह से दोपहर दो की थी और घर का काम शाम तक चलता था, इसलिए उसने रविवार तय किया। नौ महीने में उसके अड़तीस रविवार इसी में गए, और उन रविवारों में वह अपने बेटे से बात करने का वह वक़्त भी छोड़ती रही जो उसे हॉस्टल से मिलता था।
दुकान वाले लड़के ने इस पर कुछ नहीं कहा। उसका काम कम हुआ और वह उसी बरस मोबाइल का कवर और चार्जर रखने लगा, जिसमें उसे उतना ही मिलता है।
बारह औरतों का महीने का एक सौ बीस रुपए बचा, यानी सब मिलाकर चौदह सौ चालीस, और यह कोई बड़ी रक़म नहीं है।
जो बड़ी बात है, वह अलग है। दिवाली के ठीक पहले के हफ़्ते में गाँव पैसा भेजने के लिए किसी को दुकान के खुलने का इंतज़ार नहीं करना पड़ा।
उन तीन औरतों का पैसा हेमलता ही भेजती है, आज भी, और उनसे बीस रुपए नहीं लेती। यह उसके अपने कहे के उलट है और वह इसे जानती है। जब कोई इसकी तरफ़ इशारा करता है तो वह इतना कहती है कि सत्तर बरस के बाद सीख लो, यह कहना आसान होता है, और उसके बाद वह बात वहीं छोड़ देती है।