सोनवती अड़तीस बरस उस गाँव में रही और नदी में घुटने से ऊपर कभी नहीं गई।
मुंगेर से आगे वह गाँव गंगा के किनारे है। किनारा वहाँ हर बरस बदलता है और गाँव उससे लगभग आठ सौ मीटर दूर है, और बरसात में वह दूरी कम हो जाती है।
उस गाँव के लगभग सब लोग तैरना जानते हैं। लड़के छह-सात बरस में सीख जाते हैं और लड़कियाँ भी बहुत सी सीख जाती हैं।
सोनवती नहीं सीखी और इसकी वजह कोई हादसा नहीं था। वजह इतनी थी कि उसकी माँ ने उसे कभी जाने नहीं दिया और उस डर के लिए कोई कारण चाहिए भी नहीं होता।
सीखने का ख़याल उसे अड़तीस की उम्र में आया और वह किसी हिम्मत से नहीं आया।
वजह उसका काम था।
वह जीविका के एक समूह में थी और उस समूह का काम दो गाँवों में फैला था। दूसरा गाँव नदी के उस पार है और वहाँ जाने के लिए नाव है, जो दिन में चार बार चलती है।
नाव में बैठना उसके लिए हर बार का काम था और वह बैठती भी थी।
जो चीज़ खटकती थी, वह अलग है। नाव में जब भीड़ होती है और पानी तेज़ होता है, तब वह किनारे की तरफ़ बैठती थी और उसका हाथ लकड़ी पर कसा रहता था, और उसे मालूम था कि नाव पलटे तो वह कुछ नहीं कर सकती।
एक बार, जुलाई में, नाव तेज़ धार में आ गई और उसमें बैठी दो औरतें खड़ी हो गईं और नाव झुकी।
कुछ हुआ नहीं। नाविक ने संभाल लिया। पर वह काँप गई।
उस रात उसने तय किया।
सिखाने वाली उसकी देवरानी थी, जो उसी गाँव की थी और जो नौ बरस की उम्र से तैरती थी।
पहली दिक़्क़त जगह की थी। गंगा में सीखा नहीं जाता, क्योंकि उसमें धार होती है और तल का पता नहीं चलता। सीखने के लिए वहाँ लोग एक पुराने ताल में जाते हैं, जो गाँव से दो किलोमीटर दूर है और जिसमें गरमी में छाती भर पानी रहता है।
दूसरी दिक़्क़त कपड़े की थी।
यह सबसे बड़ी अड़चन थी और इस पर बहुत लोग रुक जाते हैं। साड़ी में तैरा नहीं जाता। साड़ी पानी में भारी हो जाती है और पैरों में लिपटती है, और यही डूबने की असली वजह बनती है।
उन्होंने इसका हल यह निकाला कि वे तड़के जाती थीं, चार बजे, जब वहाँ कोई नहीं होता, और सोनवती अपने बेटे का पुराना पजामा और कुर्ता पहनकर उतरती थी।
यह तीन महीने चला और गाँव में किसी को नहीं मालूम हुआ। दोनों साढ़े पाँच बजे तक घर लौट आती थीं, यानी उस वक़्त तक जब चूल्हा जलना होता है।
सीखने में उसे बाईस दिन लगे, जो सामान्य से ज़्यादा है।
पहले नौ दिन में उसने सिर्फ़ एक चीज़ की। पानी में मुँह डालकर साँस छोड़ना।
उसकी देवरानी ने उसे यह समझाया कि डूबने का डर पानी से नहीं आता, साँस रुक जाने के डर से आता है, और जब तक मुँह पानी में करके साँस छोड़ना आसान न लगे, तब तक हाथ-पैर चलाना सीखने का कोई मतलब नहीं।
दसवें दिन से उसने पीठ के बल तैरना शुरू किया, जो सबसे आसान है, क्योंकि उसमें मुँह ऊपर रहता है।
पेट के बल वह सोलहवें दिन तैरी।
इन बाईस दिनों में एक चीज़ ऐसी हुई जो उसने किसी को नहीं बताई। तेरहवें दिन उसका पैर तल की एक जड़ में फँसा और वह लगभग चार सेकंड नीचे रही, और उसकी देवरानी ने उसे बाँह से खींचा। उसके बाद वह दो दिन नहीं गई। तीसरे दिन गई, और यह उन बाईस दिनों में उसका सबसे बड़ा काम था, तैरना नहीं।
बाईसवें दिन उसने उस ताल की चौड़ाई पार की, जो लगभग अट्ठाईस मीटर है, और उसमें उसे तीन बार पैर टिकाना पड़ा।
गंगा में वह उसके बाद भी नहीं उतरी और आज भी नहीं उतरती।
वह तैराक नहीं बनी। वह उतना सीखी जितना उसे चाहिए था, यानी अगर नाव पलटे तो वह ख़ुद को किनारे तक ले जा सके।
बदलाव नाव में दिखा।
वह अब बीच में बैठती है और उसका हाथ लकड़ी पर नहीं रहता। यह छोटी बात लगती है और उस आधे घंटे में यही सब कुछ है।
उसकी देवरानी ने उसके बाद उस ताल पर चार और औरतों को सिखाया, और उनमें से दो की उम्र चालीस से ऊपर थी। वे भी तड़के जाती हैं।
घर में यह बात चार महीने बाद खुली, और उसके पति ने कोई हंगामा नहीं किया। उसने सिर्फ़ इतना पूछा कि पहले क्यों नहीं बताया। सोनवती ने कहा कि तुम रोक देते। उसने कहा कि हाँ, रोक देता, और उसके बाद यह बात वहीं ख़त्म हो गई।
एक चीज़ जो अब उस गाँव में बदली है, वह कपड़ा है। समूह ने अपने पैसे से छह पुराने सलवार-कुर्ते ख़रीदकर एक बोरे में रख दिए हैं, जो उस ताल के पास एक घर में रहता है, ताकि जिसे सीखना हो उसे यह न सोचना पड़े कि पहनकर क्या जाएगी।