बीज नौ हज़ार दो सौ का था और उसमें से एक तिहाई जमा।

शिवकुमारी धमतरी के एक गाँव में दो एकड़ पर धान करती थी। उसका आदमी भिलाई में एक ठेके पर था और महीने में दो बार आता था, इसलिए खेत का काम वही देखती थी।

बीज उसने जून के पहले हफ़्ते में लिया, गाँव से सात किलोमीटर दूर एक दुकान से, जहाँ से वह छह बरस से लेती आ रही थी।

क्यारी दस दिन में दिख जाती है। उसी में पता चल जाता है।

इस बार क्यारी में जगह-जगह ख़ाली रह गया। एक तिहाई से थोड़ा ऊपर जमा और बाक़ी नहीं।

📚 यह भी पढ़ें गेहूँ की बोरी
गेहूँ की बोरी

वह दुकान पर गई। दुकानदार ने जो कहा, वह उसी तरह का जवाब था जो हर जगह मिलता है। बीज ठीक था, तुम्हारे खेत में पानी ज़्यादा भर गया, या मिट्टी ने असर किया, या तुमने गहरा बो दिया।

इसमें से कोई बात साबित नहीं की जा सकती और यही उस जवाब की ताक़त है।

शिवकुमारी ने बहस नहीं की। वह लौट आई।

आगे जो हुआ, उसकी जड़ एक चीज़ में थी। उसने बोरा फेंका नहीं था।

यह बरसों की आदत थी और उसका खेती से कोई लेना-देना नहीं था। ख़ाली बोरे में वह सूखी मिर्च रखती थी, इसलिए बोरे उसके घर में बचे रहते थे।

📚 यह भी पढ़ें तैरना
तैरना

उस बोरे पर तीन चीज़ें छपी थीं। कंपनी का नाम, बीज का लॉट नंबर, और अंकुरण की वह दर जिसकी कंपनी गारंटी देती है।

बिल भी उसके पास था, क्योंकि वह उसी बिल पर उधार का हिसाब चलाती थी।

अब उसे तीसरी चीज़ चाहिए थी, और वह उसे किसी ने बताई नहीं। वह उसे उसी दुकानदार की बात से समझ आई।

दुकानदार का पूरा जवाब यह था कि खेत में गड़बड़ हुई है। यानी लड़ाई इस पर होगी कि खेत में क्या हुआ। और खेत में क्या हुआ, यह पंद्रह दिन बाद कोई नहीं देख सकता, क्योंकि क्यारी तब तक बदल जाती है।

इसलिए उसे उस वक़्त, उसी हालत में, किसी ऐसे आदमी से देखवाना था जिसकी बात मानी जाए।

📚 यह भी पढ़ें लाइसेंस
लाइसेंस

वह कृषि विभाग के गाँव वाले कर्मचारी के पास गई और उससे कहा कि आकर देख लो और लिखकर दे दो।

वह आया। क्यारी देखी। गिना। और लिखकर दे दिया कि अंकुरण पैंतीस फ़ीसदी के आसपास है और खेत में पानी या बुवाई की गड़बड़ी नहीं दिखती।

उस काग़ज़ पर गाँव के तीन आदमियों के दस्तख़त भी हुए। दो पड़ोसी और एक वह आदमी जिसका खेत उसी मेंड़ के दूसरी तरफ़ है और जिसका बीज उसी दुकान से नहीं आया था।

वहाँ इसे पंचनामा कहा जाता है और असल में इसकी क़ानूनी शक्ल कुछ और होती है, पर उस काग़ज़ ने वही काम किया।

इसके बाद उसने दुकानदार को एक चिट्ठी दी, जिसमें उसने पैसा वापस माँगा। जवाब नहीं आया। कोई नहीं।

📚 यह भी पढ़ें गेहूँ की बोरी
गेहूँ की बोरी

उपभोक्ता आयोग की बात उसे उसी कर्मचारी ने बताई। उसने यह भी बताया कि उसमें वकील ज़रूरी नहीं है।

यह बात बहुत लोगों को नहीं मालूम होती। ज़िले के उपभोक्ता आयोग में आदमी अपना मुक़दमा ख़ुद लड़ सकता है और शिकायत का शुल्क बहुत कम होता है।

उसने ख़ुद लड़ा। बिना वकील।

इसमें उसे इक्कीस महीने लगे और नौ तारीख़ें पड़ीं। धमतरी आना-जाना पूरे दिन का काम है।

पहली तारीख़ पर वह अकेली गई और उसे वहाँ की भाषा समझ नहीं आई। दूसरी तारीख़ पर वह अपनी बड़ी बेटी को साथ ले गई, जो कॉलेज में थी।

📚 यह भी पढ़ें तैरना
तैरना

पाँचवीं तारीख़ पर कंपनी का वकील आया और उसने दो बातें कहीं। एक, बोरा खुला हुआ है इसलिए उसे सबूत नहीं माना जा सकता। दो, अंकुरण की दर मौसम पर भी निर्भर करती है।

पहली बात का जवाब उसके पास था। बोरा खुला होगा ही, क्योंकि बीज बोया गया है, और लॉट नंबर बोरे पर छपा है, चिपकाया हुआ नहीं है।

दूसरी बात का जवाब उस पंचनामे में था।

उन इक्कीस महीनों का ख़र्च उसने जोड़ा था। शिकायत का शुल्क दो सौ। धमतरी नौ बार आना-जाना, दो लोगों का, यानी लगभग तीन हज़ार दो सौ। और नौ दिन की मज़दूरी, जो उसकी नहीं, उसकी बेटी की कॉलेज की हाज़िरी थी। बेटी की एक परीक्षा में उपस्थिति कम पड़ गई और उस पर उसे बाद में अलग से दौड़ना पड़ा।

आदेश इक्कीसवें महीने में आया। दुकानदार और कंपनी को नौ हज़ार दो सौ लौटाने को कहा गया, साथ में आठ हज़ार हर्जाना और दो हज़ार ख़र्च।

📚 यह भी पढ़ें लाइसेंस
लाइसेंस

पैसा उसे तेरह महीने बाद मिला, क्योंकि कंपनी अपील में गई और वहाँ भी वही आदेश रहा।

उन इक्कीस महीनों में उसकी दो फ़सलें उसी दुकान के बग़ैर हुईं। वह बीज अब मंडी के पास वाली एक बड़ी दुकान से लेती है, जो दो किलोमीटर दूर है और जहाँ भाव थोड़ा ऊपर है।

उस पुरानी दुकान पर अब हर बिल के पीछे अंकुरण दर लिखकर दी जाती है, हर ग्राहक को, बिना माँगे। यह उसने ख़ुद शुरू किया और शिवकुमारी से उसने इसका ज़िक्र कभी नहीं किया, और उस गाँव में हर आदमी जानता है कि उसने ऐसा क्यों शुरू किया।