किताबें इकतालीस किलो निकलीं और उनका बारह रुपए किलो के हिसाब से चार सौ बानवे रुपए बना।
रद्दी वाले ने पाँच सौ दे दिए, क्योंकि आठ रुपए के लिए वह खुले नहीं तोड़ता।
उन किताबों को जमा करने में आठ बरस लगे।
रामसहाय छपरा का था। दो हज़ार सत्रह में उसने बीए किया और उसी बरस तैयारी शुरू की।
जिस चीज़ की तैयारी थी, वह एक ही चीज़ नहीं थी। रेलवे, बैंक, कर्मचारी चयन आयोग, राज्य पुलिस, और बीच में एक बार शिक्षक की भी। जो भी विज्ञापन निकलता, वह फ़ॉर्म भर देता था।
यह उस इलाक़े में तैयारी करने का आम तरीक़ा है और सबसे कमज़ोर तरीक़ा भी है। यह उसे तीसरे बरस समझ आया।
चौथे बरस से उसने सिर्फ़ दो पर ध्यान दिया।
आठ बरस में वह तीन बार असली मौक़े के क़रीब पहुँचा।
पहली बार दो हज़ार बीस में। लिखित निकल गई और शारीरिक जाँच में उसका सीना आधा इंच कम निकला। इसमें उसका कोई क़सूर नहीं था और इसे ठीक भी नहीं किया जा सकता था।
दूसरी बार दो हज़ार बाईस में। मुख्य परीक्षा में वह मेरिट से चार नंबर नीचे रहा।
चार नंबर का मतलब क्या होता है, यह उसने उस बरस गिनकर देखा। मुख्य परीक्षा में दो सौ सवाल थे, हर सही जवाब पर दो नंबर, और हर ग़लत पर आधा कटता था। चार नंबर यानी दो सवाल। उसने उस पर्चे में सत्रह सवाल छोड़े थे, क्योंकि ग़लत करने का डर था। बाद में उत्तर-कुंजी में उसने वे सत्रह जाँचे। उनमें से नौ के जवाब उसे आते थे।
तीसरी बार दो हज़ार चौबीस में। वह भर्ती अदालत में चली गई और तीन बरस से वहीं है, और उसका नतीजा अब तक नहीं आया।
दो हज़ार पच्चीस में उसकी उम्र सैंतीस हो गई और जिन पदों की वह तैयारी कर रहा था, उनमें से आख़िरी की भी ऊपरी सीमा निकल गई। उम्र निकल गई।
इसके बाद कुछ नहीं होता। कोई घोषणा नहीं होती। कोई चिट्ठी नहीं आती। कोई बताता भी नहीं। बस अगला विज्ञापन आता है और उसमें आपकी उम्र नहीं बैठती।
उन आठ बरसों में उसने जो पैसा ख़र्च किया, उसका हिसाब उसने बाद में लगाया। फ़ॉर्म की फ़ीस, चौंतीस बार। परीक्षा के लिए बाहर जाना, इक्कीस बार। कोचिंग, दो बरस। किताबें और पत्रिकाएँ। कुल मिलाकर उसका अंदाज़ा एक लाख छियासी हज़ार का था और वह पैसा उसके पिता की खेती और उसके बड़े भाई की सूरत की कमाई से गया।
उन आठ बरसों में उसने कमाया कुछ नहीं। उस रास्ते की सबसे भारी बात यही है।
आठवें बरस के उन महीनों में घर पर उससे कोई कुछ नहीं कहता था, और यह सबसे बुरा हिस्सा था। पहले तीन बरस तक पिता पूछते थे कि कब नतीजा आएगा। पाँचवें बरस से उन्होंने पूछना बंद कर दिया। सातवें बरस से खाना खाते वक़्त उसकी तरफ़ देखना भी बंद हो गया, और यह नाराज़गी नहीं थी, उन्हें समझ नहीं आता था कि क्या पूछें।
किताबें उसने पच्चीस के अक्टूबर में बेचीं, दिवाली की सफ़ाई में।
यह उसने ग़ुस्से में नहीं किया। कमरे में जगह चाहिए थी और वे किताबें अब किसी काम की नहीं थीं, क्योंकि आधे पाठ्यक्रम बदल चुके थे।
पाँच सौ रुपए से उसने एक चीज़ ख़रीदी। एक पुराना छपाई का ठप्पा नहीं, कोई औज़ार नहीं। उसने अपनी माँ के लिए चश्मा बनवाया।
उसकी माँ को दो बरस से पास का दिखना कम हो गया था और चश्मे की बात हर बार टल जाती थी, क्योंकि घर का पैसा एक ही जगह जा रहा था।
चश्मे का पाँच सौ बीस लगा। बीस उसने जेब से दिए।
आज रामसहाय छपरा में ही है और एक निजी विद्यालय में पढ़ाता है, आठवीं तक, सामाजिक विज्ञान। तनख़्वाह नौ हज़ार दो सौ है।
यह वह नौकरी नहीं है जिसकी उसने तैयारी की थी और वह इसे लेकर ख़ुश भी नहीं है। सुबह सात से दोपहर एक, छह पीरियड, और महीने में दो रविवार भी स्कूल जाना पड़ता है, क्योंकि निजी स्कूल में यही चलता है।
जो चीज़ काम आई, वह अजीब है। आठ बरस में उसने भारत का संविधान, भूगोल और आधुनिक इतिहास इतनी बार पढ़ा था कि वह उन्हें किताब देखे बिना पढ़ा सकता है, और आठवीं के बच्चों के लिए यह बहुत ज़्यादा है।
उसके पढ़ाए बच्चों में से चार पिछले बरस ज़िले की छात्रवृत्ति परीक्षा में चुने गए, जो उस स्कूल में पहले कभी नहीं हुआ था।
इसका मतलब यह नहीं है कि आठ बरस ठीक थे। रामसहाय ख़ुद ऐसा नहीं मानता। वह अपने छोटे भाई को यही कहता है कि तैयारी करो, पर साथ में कुछ कमाओ भी, और तीन बरस से ज़्यादा एक ही चीज़ पर मत लगाओ।
छोटे भाई ने यह नहीं माना। वह भी तैयारी कर रहा है।
उसकी माँ को आज तक यह नहीं मालूम कि वह चश्मा किस पैसे का बना है। उन्होंने एक बार पूछा था और रामसहाय ने कहा था कि स्कूल से पेशगी ली थी, और वह झूठ था। चश्मा वे रसोई की एक कील पर टाँगकर रखती हैं और उसे पढ़ने के लिए नहीं लगातीं, दाल बीनने के लिए लगाती हैं।