छब्बीस बरस उसने हाथ से लिखा और उसकी लिखावट उस बाज़ार में पहचानी जाती थी।

गोरधन जयपुर की एक थोक किराना दुकान पर मुनीम था। बही में रोज़ का हिसाब, उधार के खाते, और महीने की जोड़।

उसकी उम्र छियालीस थी। पढ़ाई नौवीं तक।

दो हज़ार पच्चीस में उस दुकान ने बिलिंग मशीन में करने का फ़ैसला किया। इसकी वजह मालिक की मर्ज़ी नहीं थी। कर के हिसाब में हर बिल का ब्योरा अलग तरह से देना पड़ता है और वह हाथ से लिखी बही से नहीं बनता।

मालिक ने उसे छह महीने दिए और यह उसने अच्छी नीयत से दिया था। उसने साफ़ कहा कि सीख लो, नहीं सीखे तो लड़का रखना पड़ेगा।

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कीबोर्ड उसने चौबीस दिन बाद छुआ।

उन चौबीस दिनों में उसने वह किया जो बहुत लोग करते हैं। उसने सोचा कि यह उससे नहीं होगा।

यह डर बेवजह नहीं था। उसे अंग्रेज़ी के अक्षर पढ़ने आते थे और लिखना उतना ही आता था जितना पते पर लिखा जाता है। कीबोर्ड पर अक्षर क्रम में नहीं होते और यह बात उसे बहुत अजीब लगी।

टूटा वह अपने ही औज़ार से। बही से।

एक शाम उसने बही में एक पन्ना खोला और उस पर कीबोर्ड की तस्वीर बनाई, हाथ से, जैसी वह दिखती है, तीन कतारें और अक्षर उसी जगह पर।

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यह उसे किसी ने सुझाया नहीं था। उसने वह इसलिए किया कि काग़ज़ पर उसे चीज़ें समझ आती थीं और पर्दे पर नहीं।

उस पन्ने को वह घर ले गया और रात में देखता रहा।

तीसरे हफ़्ते तक उसे यह याद हो गया कि कौन सा अक्षर कहाँ है। उँगलियाँ चलाना अलग बात है और वह बाद में आया।

दूसरी दिक़्क़त बड़ी थी। बिलिंग का काम अक्षर लिखने का नहीं है, वह चीज़ ढूँढ़ने का है।

उस दुकान में लगभग ग्यारह सौ चीज़ें थीं। मशीन में हर चीज़ का एक कोड होता है और बिल बनाते वक़्त कोड डालना पड़ता है या नाम टाइप करके ढूँढ़ना पड़ता है।

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गोरधन को ग्यारह सौ चीज़ों के दाम पहले से याद थे। कोड याद नहीं थे।

यहाँ उसने दूसरी बार अपना ही तरीक़ा निकाला।

उसने कोड याद करना छोड़ दिया। उसने मालिक के लड़के से कहलवाकर मशीन में हर चीज़ का नाम वैसा लिखवाया जैसा उस बाज़ार में बोला जाता है, यानी कंपनी का नाम नहीं, दुकान का नाम।

उसमें दो दिन लगे। उसके बाद वह नाम टाइप करके ढूँढ़ने लगा, और नाम उसे मालूम थे।

यह छोटा बदलाव उसकी रफ़्तार का आधा काम कर गया, और मालिक के लड़के को यह अंदाज़ा नहीं था कि उसने क्या करवा दिया है।

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घर पर उसने जो किया, वही असल में सब कुछ था। उसके बेटे का पुराना लैपटॉप घर में था, जो चलता था और जिसे कोई इस्तेमाल नहीं करता था। रोज़ रात दस से बारह वह उस पर वही काम करता था जो दिन में दुकान पर करता था, यानी उसी दिन के बिल दोबारा बनाता था, जिनका कोई मतलब नहीं था। दो महीने में उसने ऐसे एक हज़ार से ऊपर बेकार बिल बनाए। उसकी पत्नी ने एक बार पूछा कि यह क्या कर रहे हो, और उसने कहा कि हाथ को रास्ता याद कराना है।

पहले महीने में एक बिल बनाने में उसे चार से छह मिनट लगते थे। हाथ से वह चालीस सेकंड में बना लेता था।

यह फ़र्क़ इतना बड़ा था कि उन महीनों में दुकान पर लाइन लग जाती थी और दो ग्राहकों ने मालिक से शिकायत भी की।

मालिक ने उससे कुछ नहीं कहा, और वह चुप रहना गोरधन को उन छह महीनों में सबसे भारी पड़ा। कहा जाता तो जवाब दिया जा सकता था।

तीसरे महीने में समय दो मिनट पर आया। पाँचवें में एक मिनट के नीचे। छठे में और नीचे।

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आज वह पचास सेकंड में बना लेता है, यानी हाथ से लिखने के बराबर, और दुकान पर अब लाइन नहीं लगती।

एक चीज़ मशीन से बेहतर हुई और उसका ज़िक्र वह ख़ुद करता है। उधार का हिसाब अब गड़बड़ नहीं होता। बही में जोड़ की ग़लती हो सकती है और होती भी थी, और अब नहीं होती।

एक चीज़ ख़राब भी हुई। मशीन में उधार वाले के नाम के आगे कोई टिप्पणी नहीं लिखी जा सकती।

बही में वह लिखता था। किसी के आगे लिखा होता था कि लड़की की शादी है, किसी के आगे कि फ़सल आने पर देगा। यह उसके काम की चीज़ थी, क्योंकि तक़ाज़ा किससे करना है और किससे नहीं, वह इसी से तय होता था।

मशीन में उसने इसका हल यह निकाला कि वह ग्राहक के नाम के आगे ही एक-दो शब्द जोड़ देता है, नाम के हिस्से की तरह, जो छपने पर बिल में नहीं जाता।

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बही उसने बंद नहीं की। दुकान के गल्ले के नीचे वह अब भी रखी है और उसमें वह हर शाम एक ही चीज़ लिखता है, दिन की कुल बिक्री, अपने हाथ से, और मालिक ने उससे इसका कारण कभी नहीं पूछा।