पहली शादी की तस्वीरों में दूल्हे के बड़े भाई का सिर नहीं था।
बाक़ी सब था। कंधे। कोट। हाथ में गिलास। सिर फ़्रेम से बाहर रह गया था, और यह सत्रह तस्वीरों में हुआ।
सुखविंदर होशियारपुर के एक गाँव का है और उसने वह कैमरा जालंधर से ख़रीदा था, पुराना, इकतीस हज़ार का।
उससे पहले वह छह बरस एक मोबाइल टावर की कंपनी में तार का काम करता था और वह काम बंद हो गया।
कैमरा उसने क्यों ख़रीदा, इसका कोई अच्छा जवाब नहीं है। उसे तस्वीरें अच्छी लगती थीं और उसके फ़ोन में वह ठीक तस्वीरें खींच लेता था और लोग तारीफ़ करते थे।
फ़ोन और कैमरा दो अलग चीज़ें हैं। यह उसे पहले हफ़्ते में समझ आ गया।
फ़ोन में मशीन सब तय कर लेती है। कैमरे में तीन चीज़ें आदमी तय करता है और वे तीनों एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं, और तीनों में से एक भी ग़लत हो तो तस्वीर जाती है।
उसने सीखा वीडियो देखकर। और कोई रास्ता नहीं था।
इसमें एक दिक़्क़त थी जो उसने बाद में समझी। वीडियो अंग्रेज़ी में थे और उसकी अंग्रेज़ी दसवीं तक की थी। उसने वे वीडियो चलाकर हिंदी वाले लिखे शब्द नीचे पढ़े और आधा उससे चला।
पहला काम उसे उसके ही रिश्तेदार से मिला और पैसा नहीं लिया।
वहीं सत्रह तस्वीरों में सिर कट गया। उसी शादी में।
उसकी वजह डर था। मंडप में उसे यह डर लगता था कि वह किसी के सामने आ जाएगा, इसलिए वह पीछे खड़ा रहता था और कैमरा ऊपर से नीचे की तरफ़ कर देता था, और उसमें ऊपर वाला हिस्सा कट जाता है।
दूसरी शादी में यह ठीक हो गया और दूसरी चीज़ ख़राब हुई।
उसने रोशनी की एक चीज़ ग़लत लगा दी और शाम के फेरों की सारी तस्वीरें पीली आईं। पीली इतनी कि दुल्हन का लाल जोड़ा नारंगी दिख रहा था।
उस बार उसने पैसा लिया था, चार हज़ार, और उसने वह वापस कर दिया।
तीसरी में आवाज़ गई। वीडियो में तीन घंटे बैंड की आवाज़ आती रही और फेरों के वक़्त पंडित की आवाज़ नहीं आई, क्योंकि माइक उसने दूल्हे के कोट पर लगाया था और पंडित उससे छह फ़ुट दूर बैठे थे।
चौथी में कार्ड भर गया और आख़िरी चालीस मिनट का कुछ नहीं है, जिसमें विदाई थी।
पाँचवीं और छठी में छोटी-छोटी बातें रहीं।
इन छह में से चार में उसने पैसा नहीं लिया और दो में लौटा दिया। कुल हिसाब में उस पहले सीज़न में उसने बीस हज़ार गँवाए, जिसमें कैमरा जोड़ा नहीं है।
गाँव में उसका नाम पड़ गया। लोग उसे उस भाई के कटे सिर से चिढ़ाते थे और यह दो बरस चला।
बीच के उन दो बरसों में उसने पैसा कहाँ से चलाया, इसका जवाब उसकी पत्नी है। वह उसी गाँव के एक स्कूल में आँगन का काम करती थी और उन दो बरसों में घर उसकी तनख़्वाह से चला, जो छह हज़ार आठ सौ थी। सुखविंदर यह बात लोगों को बताता है और उसे इसमें कोई शरम नहीं आती, और यह उस इलाक़े में आम नहीं है।
बीच में उसने एक चीज़ की, जो उसकी सबसे काम की चीज़ निकली। उसने अपनी हर ख़राब तस्वीर रखी और हर शादी के बाद बैठकर यह लिखा कि क्या ग़लत हुआ और उसका कारण क्या था। वह छह शादियों की सूची बाईस बातों की बनी। उसमें से नौ बातें एक ही वजह की थीं, जल्दबाज़ी।
सातवीं शादी उसे इसलिए मिली कि लड़की के घर वालों के पास पैसा नहीं था और वह सबसे सस्ता था।
उसमें कुछ ख़राब नहीं हुआ। पहली बार।
आठवीं में भी नहीं हुआ। नौवीं में एक बात हुई जो ख़राब नहीं थी, फ़ायदे की थी। बिजली गई और उसने अँधेरे में वह कर लिया जो उसने वीडियो में देखा था, यानी दो मोबाइल की रोशनी दोनों तरफ़ लगवाकर काम चलाया, और वे तस्वीरें उस पूरे सीज़न की सबसे अच्छी निकलीं।
आज उसके पास दो कैमरे हैं और सीज़न में वह अट्ठाईस से बत्तीस शादियाँ करता है। दो लड़के उसके साथ रहते हैं।
कमाई उस टावर वाली नौकरी से लगभग दोगुनी है, और वह चार महीने की कमाई है, बाक़ी आठ महीने वह पासपोर्ट और फ़ॉर्म की तस्वीरें खींचता है और मरम्मत का काम भी लेता है।
जो चीज़ उसने बदली, वह हुनर से पहले की है। वह अब मंडप में सबसे आगे खड़ा होता है, बीच में, जहाँ खड़े होने पर लोग टोकते हैं, और टोकने पर वह हट जाता है और फिर वापस उसी जगह आ जाता है।
उस पहली शादी वाले परिवार से उसका आना-जाना अब भी है और वह उन्हें अपने रिश्तेदार में गिनता है।
उस घर की बैठक में एक तस्वीर फ़्रेम में लगी है और वह उसी शादी की है। उसमें दूल्हे के बड़े भाई का सिर नहीं है, सिर्फ़ कंधे और कोट है और हाथ में गिलास है, और वह तस्वीर उन्होंने ही चुनकर लगवाई थी, और अब जो आता है उसे यही बताया जाता है कि यह सुखविंदर की पहली तस्वीर है।