ऑर्डर में लिखा था तीन हज़ार रोज़।
मुनेश्वर हाथ के चाक पर दिन के चार सौ बनाता था, और वह भी उस दिन जब सब ठीक चले।
इटारसी से दस किलोमीटर दूर उसका गाँव है और उसके घर में चार पीढ़ियों से यही काम होता आया। उसके पिता के वक़्त तक घड़े, सुराही, दीये, और शादियों के लिए कलश बनते थे।
उसके वक़्त तक तीन में से दो चीज़ें बंद हो गईं। घड़ा अब कोई नहीं ख़रीदता, क्योंकि फ़्रिज है। सुराही साल में बीस बिकती हैं। दीये दिवाली पर बिकते हैं और वे अब चीन के बने बिजली वाले दीयों से लड़ते हैं।
बचा था गमला, जो नर्सरी वाले लेते हैं और सस्ते में लेते हैं, और शादी का कलश।
दो हज़ार चौबीस में उसकी सालाना कमाई सत्तासी हज़ार थी। यह उसने ख़ुद नहीं गिना था, उसकी बहू ने गिना था, जो बारहवीं पास है।
उसी बरस उसने अपने बेटे से कह दिया था कि यह काम छोड़ दे और भोपाल चला जाए।
बेटा गया भी। भोपाल।
कुल्हड़ का ऑर्डर उसके बाद आया।
रेलवे के स्टेशनों पर चाय मिट्टी के कुल्हड़ में देने की बात बरसों से चलती है और कुछ स्टेशनों पर वह असल में होने लगी। इटारसी बड़ा जंक्शन है और वहाँ रोज़ की खपत बहुत है। ठेका एक आदमी के पास था जो चाय के स्टॉल चलाता था और उसे कुल्हड़ चाहिए थे, हर दिन, बिना नाग़ा।
वह आदमी दो कुम्हारों के पास पहले जा चुका था और दोनों ने मना कर दिया था।
मना करने की वजह साफ़ थी। रोज़ तीन हज़ार का मतलब है मिट्टी, चाक, भट्ठी और आदमी, चारों को सात गुना करना।
मुनेश्वर ने चौदह दिन माँगे। सोचने के लिए।
उन चौदह दिनों में उसने चार चीज़ें पता कीं, और यह उसका असली काम था।
पहली, बिजली से चलने वाला चाक। उसकी कीमत उस वक़्त सत्रह हज़ार थी और उस पर एक आदमी दिन के बारह सौ कुल्हड़ बना लेता है, यानी हाथ के चाक से तीन गुना।
दूसरी, कुल्हड़ का साँचा। यह वह चीज़ है जिसने असल में काम किया। साँचे में मिट्टी दबाकर एक ही नाप का कुल्हड़ बनता है और यह चाक पर हुनर से बनाने की तुलना में कच्चा काम है, पर स्टेशन पर हुनर नहीं चाहिए, नाप चाहिए।
तीसरी, भट्ठी। उसकी पुरानी भट्ठी में एक बार में आठ सौ कुल्हड़ पकते थे और उसे बड़ा कराना पड़ा।
चौथी, आदमी। यही सबसे मुश्किल निकली।
उसने अपने ही गाँव और बग़ल के दो गाँवों में चार औरतों को रखा। कुम्हार के काम में औरतें पहले भी लगती रही हैं, पर वे घर की औरतें होती हैं और उन्हें मज़दूरी नहीं मिलती। उसने मज़दूरी पर रखा, दिन के दो सौ चालीस।
पैसा उसने दो जगह से लिया। मिट्टी कला बोर्ड की एक योजना है जिसमें चाक और साँचा मिलता है, और उसके लिए उसने आवेदन किया और वह चार महीने में मिला। भट्ठी और मज़दूरी का इंतज़ाम उसने अपनी बहन की ज़मीन गिरवी रखकर किया, जो उसने आज तक किसी को नहीं बताया।
पहला महीना ख़राब गया। बहुत ख़राब।
साँचे से बने कुल्हड़ की दीवार बराबर मोटी नहीं आ रही थी और पकने पर उनमें से बहुत फूट रहे थे। पहले महीने में उसका नुक़सान इकतीस फ़ीसदी रहा, यानी सौ में इकतीस फूटे।
यह ठीक होने में उसे तीन बात समझनी पड़ीं। मिट्टी में बालू का अनुपात, गूँधने का वक़्त, और सबसे ज़रूरी, कच्चे कुल्हड़ को छाँव में सुखाना, धूप में नहीं।
गरमी में एक और बात निकली। मई-जून में कच्चा कुल्हड़ जल्दी सूखता है और ऊपर से सूखकर अंदर से गीला रह जाता है, और वैसा कुल्हड़ भट्ठी में चटकता है। बरसात में उल्टी दिक़्क़त होती है, वह सूखता ही नहीं। साल के बारह महीने एक ही तरीक़े से काम नहीं चलता।
तीसरे महीने में नुक़सान नौ फ़ीसदी पर आ गया। आज वह छह पर रहता है। इससे नीचे नहीं जाता।
ठेके की एक शर्त उसे बाद में समझ आई। भुगतान महीने के आख़िर में होता है और माल रोज़ देना पड़ता है, इसलिए पहले तीन महीने उसे मिट्टी, कोयला और मज़दूरी अपनी जेब से चलानी पड़ी। एक बार दो हफ़्ते का भुगतान अटका और उन दो हफ़्तों में उसने औरतों की मज़दूरी अपनी बहू के गहने बेचकर दी। वे गहने डेढ़ बरस बाद वापस बने।
अब वहाँ रोज़ के साढ़े तीन हज़ार कुल्हड़ बनते हैं और छह औरतें काम करती हैं।
उसका बेटा भोपाल से लौट आया, दूसरे बरस, और अब वही हिसाब और गाड़ी का काम देखता है।
जो चीज़ मुनेश्वर ने नहीं छोड़ी, वह हाथ का चाक है। वह उसी कमरे के कोने में लगा है और बिजली के दो चाक उसके सामने चलते हैं। उस पर अब कुल्हड़ नहीं बनते। उस पर वह शादियों के कलश बनाता है, साल में सत्तर-अस्सी, जिनका ऑर्डर उसी गाँव और आसपास से आता है, और उन पर वह अपने पिता का सिखाया वह गोल निशान अब भी लगाता है जो अँगूठे से बनता है।