फ़िरोज़ाबाद में काँच की भट्ठी के मुँह के सामने का तापमान चालीस से ऊपर रहता है, गरमी में और सर्दी में भी।
गिरधारी वहाँ सोलह बरस से था। उसका काम पिघले काँच को नली पर उठाकर साँचे तक पहुँचाना था, जिसमें आदमी दिन में सैकड़ों बार भट्ठी के मुँह के तीन फ़ुट पास आता है।
छाती में दर्द उसे दो हज़ार तेईस में शुरू हुआ।
पहले उसने उसे गर्मी समझा। भट्ठी पर काम करने वालों में साँस की तकलीफ़ आम है और उसे कोई बीमारी नहीं मानता।
जाँच उसने आठ महीने बाद कराई, और वह भी तब जब सीढ़ी चढ़ते हुए उसे रुकना पड़ा।
आगरा के एक डॉक्टर ने उसे बताया कि फेफड़े में जो हुआ है, वह गर्मी और काँच के महीन कणों दोनों से है, और उसका इलाज दवा है, पर दवा तब चलेगी जब वह काम बंद हो।
उसकी उम्र उन्तालीस थी। दूसरा काम उसे कोई नहीं आता था।
इस मोड़ पर उस शहर में हज़ारों लोग खड़े रहते हैं और उनमें से बहुत काम पर लौट जाते हैं, क्योंकि लौटना ही एक रास्ता दिखता है।
गिरधारी लौटा भी। ग्यारह महीने और।
उन ग्यारह महीनों में उसने दो चीज़ें कीं और दोनों किसी को नहीं दिखीं।
पहली, उसने पैसा जोड़ा। मज़दूरी उसकी चार सौ अस्सी दिन की थी और उसमें से उसने रोज़ के सत्तर रुपए अलग निकाले, जो घर के हिसाब में कहीं दर्ज नहीं थे।
यह उसने कैसे किया, इसका जवाब बीड़ी है। वह दिन में एक बंडल पीता था और उसने वह छोड़ दी।
ग्यारह महीने में उसके तेईस हज़ार बने, और वह रक़म उसने घर में किसी को नहीं दिखाई।
दूसरी, उसने काम सीखा। उसी शहर में काँच की चूड़ियों पर जुड़ाई का काम होता है, जो घर बैठकर होता है और जिसमें एक छोटी लौ के सामने चूड़ी के दोनों सिरे जोड़े जाते हैं।
वह काम भी आग का है। पर लौ छोटी होती है, आदमी उसके सामने चार फ़ुट पर बैठता है, और वहाँ काँच का चूरा नहीं उड़ता।
यह उसने अपने बहनोई से सीखा, जो वही करता था, और जिसने उसे शाम के वक़्त सिखाया।
सीखने में उसे पाँच महीने लगे। पहले महीने में उसने चार सौ में से एक सौ नौ चूड़ियाँ तोड़ीं, जिनका पैसा उसने अपने बहनोई को दिया।
इन ग्यारह महीनों में उसने घर में कुछ नहीं बताया।
यह जान-बूझकर था। उसकी पत्नी को अगर मालूम होता कि फेफड़े का मामला है, तो वह उसे उसी दिन काम छोड़ने को कहती, और उस दिन घर में कमाई कुछ न होती।
उसने यह भी नहीं बताया कि वह चूड़ी का काम सीख रहा है, क्योंकि दोनों बातें एक साथ जुड़ जातीं।
चार सौ इक्यावन दिन उसने यह चुप्पी रखी।
इसकी कीमत उसने चुकाई। उन ग्यारह महीनों में उसका दर्द बढ़ा और तीन बार ऐसा हुआ कि वह काम के बीच में बैठ गया, और तीनों बार उसने कहा कि चक्कर आया है।
उन ग्यारह महीनों में एक चीज़ और थी जिसका हिसाब उसने बाद में लगाया। भट्ठी का काम ठेके पर था और छोड़ने पर कुछ नहीं मिलता, न कोई हिसाब न कोई काग़ज़, क्योंकि हाज़िरी रजिस्टर ठेकेदार का होता है और उसमें उसका नाम पूरे सोलह बरस का नहीं है, वह हर दो-तीन बरस में नए ठेकेदार के नाम पर नया चढ़ा है।
भट्ठी उसने अगस्त में छोड़ी।
उस दिन उसने घर पर सब बताया, पूरा, जाँच के काग़ज़ समेत।
उसकी पत्नी उस पर ग़ुस्सा हुई और वह ग़ुस्सा छिपाने पर नहीं था। वह इस पर था कि उसने अकेले तय किया।
यह बात सही थी और गिरधारी उसे मानता है।
चूड़ी का काम उसने घर के आगे के कमरे में शुरू किया। तेईस हज़ार में लौ का सामान, सिलेंडर की व्यवस्था और चूड़ियों का पहला माल आ गया।
कमाई पहले बरस में भट्ठी से कम रही, लगभग साठ फ़ीसदी, और वह बरस उन्होंने उसी तेईस हज़ार के बचे हिस्से पर काटा।
तीसरे बरस में वह बराबर हो गई और अब उससे थोड़ी ऊपर है, और उसकी वजह उसकी मेहनत नहीं है। वजह यह है कि अब उसकी पत्नी और बड़ी बेटी भी वही काम करती हैं, यानी घर में तीन लोग कमाते हैं।
साँस की दिक़्क़त गई नहीं। जो हो चुका था, वह वैसा ही है, और सीढ़ी चढ़ते हुए वह अब भी दूसरी मंज़िल पर रुकता है।
जो बदला है, वह यह है कि वह आगे नहीं बढ़ रही।
उस कारखाने से उसका आना-जाना बंद नहीं हुआ। वहाँ के दो लड़के महीने में एक-दो बार उसके पास आते हैं और चूड़ी का काम पूछते हैं, और गिरधारी उन्हें बिना पैसा लिए बैठाता है।
जाँच के वे काग़ज़ अब भी उसके पास हैं, उसी लिफ़ाफ़े में, और लिफ़ाफ़ा उस कमरे की उसी दीवार पर टँगा है जहाँ लौ जलती है। उसे वहाँ किसी ने टाँगा नहीं, वह अगस्त की उस शाम वहीं रख दिया गया था और उठाया नहीं गया, और आने वाले लड़के उसे देखते हैं और उसके बारे में पूछते नहीं।