पहले दिन बारह लड़के आए। छठे हफ़्ते तक तीन बचे।
धर्मपाल सूरत के पांडेसरा में रहता था और कपड़े की एक मिल में मशीन पर था। बारह घंटे की पाली, हफ़्ते में छह दिन।
वह ख़ुद बारहवीं पास था, जो उस कमरे में सबसे ज़्यादा थी। उसके कमरे में छह लोग रहते थे और उनमें से चार अनपढ़ थे।
पढ़ाने का ख़याल उसे एक चिट्ठी से आया।
उसके कमरे का एक साथी अपने घर पैसा भेजता था और उसका हिसाब वह धर्मपाल से लिखवाता था। एक बार उसने उसे यह भी लिखवाया कि गाँव में ज़मीन के काग़ज़ पर दस्तख़त किसने किए।
उस चिट्ठी को लिखवाते वक़्त उसने एक बात कही, जो धर्मपाल के मन में रह गई। उसने कहा कि जो लिख नहीं सकता, उसके काग़ज़ पर हमेशा किसी और का हाथ चलता है।
क्लास उसने अपने कमरे में शुरू की, पाली छूटने के बाद, यानी रात ग्यारह से बारह, और उसके लिए किसी से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं थी, कमरा उन्हीं छह लोगों का था।
बारह लड़के आए। ख़बर मुँह से फैली थी और उस बस्ती में ऐसी ख़बर तेज़ फैलती है।
छह हफ़्ते में नौ छूट गए। पूरे नौ।
छूटने की वजह आलस नहीं थी। बारह घंटे मशीन पर खड़े रहने के बाद रात ग्यारह बजे आदमी बैठ नहीं सकता। तीन लड़के पहले हफ़्ते में बैठे-बैठे सो गए और उन्हें शरम आई और वे नहीं आए।
दो की पाली बदल गई और वे रात की पाली में चले गए, यानी उनका वक़्त वही था जो क्लास का था।
चार लड़के गाँव चले गए, जो उस काम में हर तीन-चार महीने में होता है।
धर्मपाल ने दूसरा बैच फ़ौरन नहीं शुरू किया।
उसने पहले यह सोचा कि नौ क्यों गए, और उसमें उसे तीन महीने लगे।
उसने तीन चीज़ें बदलीं।
पहली, वक़्त। उसने क्लास रात ग्यारह से हटाकर सुबह कर दी, यानी दिन की पाली शुरू होने से पहले, सुबह छह से सात। सोकर उठा आदमी बैठ सकता है, थका आदमी नहीं।
इसका ख़र्च उसने ख़ुद उठाया, क्योंकि उसकी नींद का एक घंटा गया और वह घंटा उसे कहीं से नहीं मिला।
उस एक घंटे की नींद का हिसाब तीन बरस में यह बना कि उसने मिल में ओवरटाइम लेना बंद कर दिया। ओवरटाइम में घंटे के अस्सी रुपए मिलते हैं और वह महीने में बीस-पच्चीस घंटे लेता था, यानी दो हज़ार के आसपास। वह पैसा अब नहीं आता और उसने घर में इसका कारण नहीं बताया, उसने कह दिया कि मिल में ओवरटाइम कम मिल रहा है।
दूसरी, पाठ। वर्णमाला उसने छोड़ दी।
यह उसका सबसे काम का बदलाव था। वर्णमाला से शुरू करने पर आदमी को दो महीने तक कोई फ़ायदा नहीं दिखता, और वह छोड़ देता है।
उसने शुरुआत उन चीज़ों से की जो उन्हें रोज़ चाहिए थीं। अपना नाम। गाँव का नाम। अंक, ख़ासकर सौ, पाँच सौ, दो हज़ार। पैसे भेजने वाले परचे पर जो ख़ाने भरे जाते हैं। बस के बोर्ड पर लिखे शहरों के नाम।
इसमें आदमी को पहले हफ़्ते में एक चीज़ मिल जाती है जो वह पहले नहीं कर सकता था, और वही उसे टिकाती है।
तीसरी, हाज़िरी। रजिस्टर उसने बंद कर दिया।
पहले बैच में उसने हाज़िरी लिखी थी और उसका उल्टा असर हुआ, क्योंकि जो दो दिन नहीं आया वह तीसरे दिन शरम से नहीं आया।
दूसरे बैच में उसने कह दिया कि जो जिस दिन आ सके आ जाए, और जो छूट गया उसे वह अलग से दस मिनट में पकड़ा देगा।
दूसरा बैच उसने चौदह लोगों से शुरू किया और उनमें से नौ छह महीने चले।
नौ में से सात अब अपना नाम, गाँव और अंक लिख-पढ़ लेते हैं। दो ने उससे आगे भी पढ़ा और उनमें से एक ने खुले स्कूल से पाँचवीं की परीक्षा दी।
यह बड़ा नंबर नहीं है। उस बस्ती में हज़ारों लोग रहते हैं।
पहले बैच के जो तीन लड़के टिके थे, उनका आगे यह हुआ। एक अब भी उसी मिल में है और उसने आगे कुछ नहीं पढ़ा, पर वह अपना पैसा ख़ुद भेजता है। दूसरा दो बरस बाद गाँव लौट गया और वहाँ खाद-बीज की दुकान पर बैठता है। तीसरा उसी बस्ती में है और वही दो लोगों में से एक है जो अब पढ़ाता है।
धर्मपाल तीन बरस से यह कर रहा है और अब उसके साथ दो और लोग पढ़ाते हैं, जो उसके पहले बैच के नहीं हैं, दूसरे के हैं।
पैसा इसमें कोई नहीं है और उसने लिया भी नहीं। एक बार एक संस्था ने उसे मदद की पेशकश की और उसमें शर्त यह थी कि गिनती और तस्वीरें भेजनी होंगी, और उसने मना कर दिया, क्योंकि हाज़िरी न रखना उसका पूरा तरीक़ा था।
उस कमरे में दीवार से टिका एक छोटा ब्लैकबोर्ड रखा है, जो उसने चार सौ रुपए में बनवाया था। उस पर लिखा-मिटा इतनी बार गया है कि उसका काला रंग बीच से उड़ गया है और वहाँ चाक ठीक से नहीं चलती, इसलिए पढ़ाने वाले अब उसके किनारों पर लिखते हैं।