टोली में अठारह आदमी थे और उनमें से एक भी वहाँ की भाषा नहीं जानता था।

रामखेलावन कटिहार के एक गाँव से था और दो हज़ार बीस में एर्नाकुलम गया। काम मकानों की पुताई और प्लास्टर का था और ठेकेदार बिहार का ही था, जो वहाँ बीस बरस से रह रहा था।

यह ढाँचा वहाँ आम है। मालिक मलयाली, ठेकेदार बिहार या बंगाल का, और मज़दूर पूरे उत्तर से।

इस ढाँचे में एक बात छिपी होती है। बात करने वाला एक ही आदमी होता है।

मज़दूरी उस वक़्त छह सौ दिन की थी और ठेकेदार उसमें से अपना काटता था, जो सबको मालूम था और जिस पर कोई नहीं बोलता था, क्योंकि उसके बिना काम नहीं मिलता।

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रामखेलावन ने पहले बरस में एक चीज़ देखी। जिस दिन मालिक ख़ुद आता था, उस दिन बात ठेकेदार से होती थी और मज़दूर पीछे खड़े रहते थे। मालिक जो कह रहा होता था, वह किसी को समझ नहीं आता था।

एक बार ऐसा हुआ कि मालिक ने कोई बात कही और ठेकेदार ने उन्हें कुछ और बताया। यह उसे बहुत बाद में मालूम हुआ।

उसने भाषा सीखने का फ़ैसला किसी योजना के तहत नहीं किया। उसने सिर्फ़ यह किया कि सुनना शुरू कर दिया।

इसमें तीन बरस लगे। पूरे तीन।

तरीक़ा यह था। साइट पर मलयाली लोग भी काम करते थे, बिजली और टाइल वाले, और वे आपस में बोलते थे। रामखेलावन उनके पास बैठकर खाना खाने लगा।

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पहला बरस बेकार गया। कुछ नहीं हुआ। उसे कुछ समझ नहीं आया और वह यह भी नहीं पकड़ पाता था कि एक शब्द कहाँ ख़त्म होता है और दूसरा कहाँ शुरू।

दूसरे बरस में वह टूटना शुरू हुआ।

जो पहले पकड़ में आया, वह काम के शब्द थे। सीमेंट, बालू, पानी, ऊपर, नीचे, कल, आज, कितना, कहाँ। ये शब्द दिन में सौ बार आते हैं और वहीं से पकड़ बनती है।

अंक उसने अलग से सीखे, क्योंकि पैसे की बात अंकों में होती है और उसमें ग़लती नहीं होनी चाहिए।

तीसरे बरस में वह पूछ सकता था और जवाब समझ सकता था।

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दूसरे और तीसरे बरस में उसने जो किया, उसका ख़र्च भी था। खाना वह अलग बैठकर खाता था, यानी अपनी टोली से अलग, और परदेस में अपनी भाषा वाले लोगों के साथ बैठना वही चीज़ है जो आदमी को टिकाए रखती है। छह-सात महीने उसकी टोली में उसका मज़ाक़ बना और दो लोगों ने यह भी कहा कि यह ठेकेदार का आदमी बन गया है।

एक चीज़ उसने आज तक नहीं सीखी। वह लिपि है। मलयालम लिखा हुआ वह नहीं पढ़ सकता और उसने सीखने की कोशिश भी नहीं की, क्योंकि बोलने से काम चल जाता है।

इसका असर पहले दिन नहीं पड़ा।

असर उस दिन पड़ा जब एक मालिक ने साइट पर आकर कुछ पूछा और ठेकेदार वहाँ नहीं था, और रामखेलावन ने जवाब दे दिया।

मालिक रुक गया। वहीं खड़ा रहा। उसने दोबारा पूछा और उसने दोबारा जवाब दिया।

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उस आदमी ने उसका नंबर लिया। ठेकेदार का नहीं।

अगले चार महीनों में उसे तीन काम सीधे मिले, बिना ठेकेदार के।

उसने ठेकेदार को छोड़ा नहीं। उसने उससे झगड़ा भी नहीं किया।

वजह हिसाब की थी। ठेकेदार के पास साल भर का काम था और सीधे काम में महीने-दो महीने का अंतर पड़ जाता है, और परदेस में ख़ाली महीना सबसे भारी चीज़ है।

उसने जो किया वह यह था कि वह ठेकेदार के साथ रहा और अपनी जगह बदल ली।

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ठेकेदार की तरफ़ से इसमें रोक नहीं आई, और इसकी वजह भी हिसाब थी। ठेकेदार को अपना काम बढ़ाने के लिए ऐसा आदमी चाहिए था जो साइट पर मालिक से बात कर सके, क्योंकि वह ख़ुद एक ही जगह रह सकता है और उसकी चार साइटें चलती थीं।

टोली में अब वही बात करता है। मालिक से नाप, माल और तारीख़ की बात रामखेलावन करता है और ठेकेदार पैसे की करता है।

इसका पैसा उसे मिलता है। उसकी मज़दूरी अब आठ सौ पचास है, बाक़ी की सात सौ है, और यह डेढ़ सौ का फ़र्क़ उसके बोलने का है।

उसके साथ के दो आदमियों ने भी सीखना शुरू किया और एक ने छोड़ दिया।

जिसने छोड़ा, उसने कहा कि हम यहाँ चार महीने में लौट जाएँगे, इसमें क्या रखा है। वह अब भी हर बरस आता है और अब भी सात सौ पर है, और यह ताना नहीं है, यह इतना ही है कि उसका हिसाब अलग था।

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घर पर रामखेलावन ने यह नहीं बताया कि वह भाषा जानता है। उसकी पत्नी को यह चार बरस बाद पता चला, फ़ोन पर, जब उसने पीछे किसी से बात करते हुए सुना।

ओणम के दिनों में साइट बंद रहती है और मालिक लोग मज़दूरों को खाना भेजते हैं। पहले वह खाना आता था और रख दिया जाता था। अब उस पर जो बात होती है, वह रामखेलावन करता है, और वह यह भी बता देता है कि किसे प्याज़ नहीं खाना है और किसे तेज़ मिर्च नहीं, और यह पूछने के लिए कोई उससे कहता नहीं, वह अपने आप पूछ लेता है।