तीसरी में वह दो बार बैठी और तीनों बरस उसे आख़िरी बेंच पर बिठाया गया।

रामकुँवर बाड़मेर ज़िले के एक क़स्बे में रहती है। वह घरों में बरतन-कपड़े का काम करती है और पढ़ी नहीं है।

उसकी बेटी का नाम स्कूल में दो बार फेल के साथ दर्ज है।

स्कूल में उसके बारे में यही कहा जाता था कि लड़की का दिमाग़ इस काम का नहीं है। मास्टर ने यह बुरी नीयत से नहीं कहा। लड़की ब्लैकबोर्ड से उतारती नहीं थी, सवाल का जवाब नहीं देती थी, और आधा वक़्त बाहर देखती रहती थी।

आख़िरी बेंच पर बिठाना उस स्कूल में सज़ा नहीं थी, वह इंतज़ाम था। जो बच्चे पढ़ते नहीं, उन्हें पीछे कर दिया जाता है ताकि बाक़ी का काम चले।

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रामकुँवर ने तीन बरस यह मान लिया। पूरे तीन बरस।

उसकी वजह यह थी कि उसे भी वही लगता था। घर में पढ़ा हुआ कोई नहीं था और मास्टर की बात के आगे उसके पास कुछ नहीं था।

जो चीज़ बदली, वह घर की एक मामूली बात से बदली।

एक शाम उसने बेटी को चूल्हे के पास बिठाकर दाल बीनने को कहा और लड़की ने उसमें से कंकड़ बहुत अच्छे निकाले, इतने अच्छे कि रामकुँवर ने ध्यान दिया।

फिर उसे यह भी दिखा कि लड़की सुई में धागा पहली बार में डाल लेती है।

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यानी पास का दिखना ठीक था। बिल्कुल ठीक।

यह बात उसके मन में अटकी रही और तीन-चार दिन बाद उसने एक चीज़ की। उसने बेटी को आँगन के दूसरे सिरे पर खड़ा किया और अपने हाथ से लिखा एक अंक दिखाकर पूछा।

लड़की ने ग़लत बताया। दो बार ग़लत।

उसने दो क़दम पास बुलाया। फिर दो और। सात-आठ क़दम पर आकर उसने सही बताया।

आँगन का वह फ़ासला लगभग बारह फ़ुट का था, और कक्षा में आख़िरी बेंच से ब्लैकबोर्ड बीस फ़ुट से ज़्यादा दूर था।

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उन तीन बरसों में लड़की ने घर पर यह कभी नहीं कहा कि उसे दिखता नहीं है। यह बात रामकुँवर को बाद में सबसे ज़्यादा चुभी और उसने बेटी से इसका कारण पूछा भी। लड़की ने कहा कि उसे यह मालूम ही नहीं था कि बाक़ी बच्चों को साफ़ दिखता है। उसे यही लगता था कि ब्लैकबोर्ड सबको ऐसा ही दिखता है और बाक़ी बच्चे किसी और तरीक़े से उतार लेते हैं।

अगले दिन वह स्कूल गई और मास्टर से यह बात कही।

मास्टर ने ध्यान से सुना और उसे आगे की बेंच पर बिठा दिया, उसी दिन, दूसरी क़तार में।

किसी लड़ाई की ज़रूरत नहीं पड़ी, और यह रामकुँवर ने सोचा भी नहीं था, वह झगड़े की तैयारी करके गई थी।

पर आगे बिठाने से काम आधा हुआ, पूरा नहीं।

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जाँच में लड़की के दोनों आँखों में नंबर निकला, बाएँ में ज़्यादा। चश्मा बनवाना था और उसका ख़र्च साढ़े चार सौ रुपए था।

रामकुँवर की महीने की कमाई उन दिनों चार हज़ार दो सौ थी और उसमें से घर का किराया नौ सौ जाता था।

साढ़े चार सौ उसके पास नहीं थे।

उसने वह पैसा तीन जगह से जोड़ा। एक घर से पेशगी, एक जगह उधार, और अपनी दो चूड़ियाँ, जो उसने चार महीने बाद वापस बनवाईं।

चश्मा दिसंबर में बना। साढ़े चार सौ का।

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चश्मा लगने के बाद कोई चमत्कार नहीं हुआ।

लड़की तीन बरस पीछे थी। चश्मा लगने से नज़र ठीक हुई, तीन बरस वापस नहीं आए।

उसे तीसरी फिर करनी पड़ी। तीसरी बार। उस बरस वह पास हुई।

चश्मा पहनकर स्कूल जाने में उसे पहले दो महीने दिक़्क़त हुई और वह दिक़्क़त देखने की नहीं थी। कक्षा में उसे चश्मे वाली कहकर चिढ़ाया गया, और एक दिन वह उसे उतारकर बस्ते में रखकर बैठी रही। रामकुँवर को यह उस दिन मालूम हुआ जब उसने शाम को चश्मा बस्ते में पड़ा देखा। उसने लड़की से कुछ नहीं कहा। अगले दिन वह ख़ुद स्कूल तक साथ गई और उसे कक्षा के दरवाज़े तक छोड़ा, और यह उसने ग्यारह दिन किया।

आज वह आठवीं में है और उसकी उम्र उस कक्षा के बाक़ी बच्चों से दो बरस ज़्यादा है। कक्षा में उसका नंबर बीच में आता है, न ऊपर न नीचे।

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चश्मा उसका दूसरा है। पहला ढाई बरस चला और उसकी एक डंडी टूटने पर धागे से बाँधी गई थी, और वह पहला अब भी घर में रखा है।

रामकुँवर उन घरों में अब भी काम करती है और उनमें से एक घर में दो बच्चे हैं। उस घर की मालकिन ने उससे एक बार पूछा था कि तेरी लड़की को चश्मा कैसे लगा, और उसने पूरी बात बता दी थी।

उस घर के छोटे बच्चे की आँखें उसी बरस जँचवाई गईं और उसका भी नंबर निकला।

रामकुँवर उन दोनों घरों के बीच रोज़ गुज़रती है। स्कूल उसी रास्ते में पड़ता है और उसकी दीवार से कक्षाएँ दिखती हैं। वह अब भी वहाँ से गुज़रते हुए एक बार अंदर देख लेती है, यह जानने के लिए कि लड़की किस बेंच पर बैठी है, और यह वह उसे बताती नहीं।