स्कूल के दफ़्तर में पहली बार यही कहा गया कि सीट भर गई है।
उमादेवी देहरादून में लोगों के घरों में काम करती थी। चार घर, सुबह सात से दोपहर एक। उसका आदमी राजपुर की तरफ़ एक होटल में झाड़ू-पोंछे पर था।
उनके बेटे का नाम कमज़ोर वर्ग की मुफ़्त सीट की सूची में आया था। शिक्षा का अधिकार क़ानून के तहत हर निजी स्कूल में पहली कक्षा की एक चौथाई सीटें उस वर्ग के लिए रखी जाती हैं, और आवेदन ऑनलाइन होते हैं, और चुनाव लॉटरी से होता है।
लॉटरी में नाम आना आसान नहीं है। उस स्कूल में उस बरस उस श्रेणी की चौदह सीटें थीं और आवेदन दो सौ से ज़्यादा।
नाम आ गया।
यह चार महीने चला, अप्रैल से अगस्त के दूसरे हफ़्ते तक।
पहली बार वह अप्रैल में गई। दफ़्तर में एक महिला बैठी थीं। उन्होंने सूची देखी, नाम मिला, और फिर कहा कि इस बार सीटें पहले ही भर गई हैं, आप अगले सत्र में आइए।
उमादेवी उस दिन लौट आई।
दूसरी बार वह दस दिन बाद गई। इस बार काग़ज़ का सवाल आया। आय प्रमाण पत्र चाहिए, निवास प्रमाण चाहिए, जन्म प्रमाण चाहिए, और बच्चे का आधार चाहिए।
उसके पास तीन थे। निवास प्रमाण नहीं था, क्योंकि वह किराए के कमरे में रहती थी और मकान मालिक ने काग़ज़ पर दस्तख़त करने से मना कर दिया।
यह असली रुकावट थी और यही सबसे बड़ी थी।
इसमें दो महीने गए। रास्ता आख़िर में राशन कार्ड से निकला, जिस पर उसका पता उसी मुहल्ले का चढ़ा हुआ था, और तहसील से जारी प्रमाण पत्र में वही पता मान लिया गया।
तीसरी बार वह जून में गई। काग़ज़ पूरे थे।
इस बार उससे कहा गया कि फ़ीस जमा करनी होगी। किताबें, वर्दी, और सत्र शुरू होने का शुल्क, कुल सात हज़ार दो सौ।
मुफ़्त सीट पर यह नहीं लिया जा सकता। यह उसे मालूम नहीं था।
उसने वह पैसा जोड़ने की कोशिश भी की। उसने अपने दो घरों से पेशगी माँगी और एक जगह से तीन हज़ार मिल भी गया।
जो बात उसे मालूम हुई, वह उसी मुहल्ले से मालूम हुई। बग़ल के कमरे में रहने वाला लड़का एक कोचिंग में पढ़ाता था और उसने उसे बताया कि मुफ़्त सीट पर स्कूल कुछ नहीं ले सकता, किताब और वर्दी भी नहीं, और यह शिकायत खंड शिक्षा अधिकारी के दफ़्तर में होती है।
उसने उससे शिकायत लिखवाई और चौथी बार स्कूल गई, शिकायत की नक़ल लेकर।
इस बार उससे कोई फ़ीस नहीं माँगी गई। इस बार कहा गया कि सत्र शुरू हो चुका है, अब बीच में दाख़िला नहीं होता।
उमादेवी उस दिन दफ़्तर से बाहर आकर बरामदे में बैठ गई और डेढ़ घंटा वहीं बैठी रही।
यह उसका सबसे कमज़ोर दिन था और उसमें उसने कुछ नहीं किया। वह बैठी रही और फिर काम पर चली गई। दो घर बाक़ी थे।
इन चार महीनों में उसका एक घर छूट गया। जिस दिन वह तीसरी बार स्कूल गई, उस दिन वह एक घर में नहीं पहुँची और वहाँ ख़बर भी नहीं भेज पाई। दस दिन बाद वहाँ दूसरी बाई रख ली गई। वह घर उसकी महीने की कमाई का चौथाई था।
शिकायत जुलाई में जमा हुई।
खंड शिक्षा अधिकारी के दफ़्तर में उसे तीन चक्कर लगाने पड़े और तीसरे चक्कर में एक क्लर्क ने उसे बताया कि आपकी शिकायत में स्कूल का पूरा नाम और मान्यता संख्या नहीं लिखी है, इसलिए वह आगे नहीं बढ़ी। वह संख्या स्कूल की दीवार पर लिखी होती है और बोर्ड पर भी लिखी होती है।
जुलाई में देहरादून की बारिश शुरू हो चुकी थी और उस दफ़्तर के बाहर खड़े होने की जगह पर छाँव नहीं है। तीन में से दो चक्कर उसने भीगकर किए।
उसने वह जाकर देखी, उतारी, और शिकायत दोबारा दी।
उसके बाद दफ़्तर से स्कूल को नोटिस गया। बस इतना हुआ।
दाख़िला अगस्त के दूसरे हफ़्ते में हुआ, यानी सत्र शुरू होने के साढ़े तीन महीने बाद। उस दिन वह स्कूल के दफ़्तर में सत्रह मिनट रुकी और किसी से कुछ नहीं कहा।
इसका नुक़सान हुआ, और उसे लिख देना चाहिए। लड़का साढ़े तीन महीने पीछे था और पहली कक्षा में साढ़े तीन महीने बहुत होते हैं। पहले छह महीने वह सबसे पीछे रहा और उसे गिनती में दिक़्क़त हुई।
उमादेवी ने उसे घर पर नहीं पढ़ाया, क्योंकि उसे नहीं आता। उसने उसी कोचिंग वाले लड़के से कहा और उसने शाम को आधा घंटा देना शुरू किया, और उसका दो सौ रुपए महीना लिया।
वर्दी वाली बात एक बरस बाद तक चलती रही और स्कूल ने वर्दी नहीं दी। उमादेवी ने वह ख़ुद ख़रीदी। इस पर दोबारा लड़ने का वक़्त नहीं था।
स्कूल के जूते उसने एक नंबर बड़े लिए थे, इस हिसाब से कि दो बरस चलेंगे। वे दो बरस चले भी, और उनकी एड़ी के अंदर की तरफ़ अख़बार का एक मुड़ा हुआ टुकड़ा पहले साल भर पड़ा रहा, ताकि पैर घूमे नहीं, और उमादेवी उसे हर महीने बदल देती थी।