आदेश में लिखा था कि जिन विद्यालयों में नामांकन दस से कम है, उनका निकटवर्ती विद्यालय में विलय किया जाए।
उस स्कूल में सात थे। सात बच्चे।
पिथौरागढ़ से आगे उस गाँव में साठ के आसपास घर हैं और उनमें से इक्कीस पर ताला लगा है। यह वहाँ आम है और उसे कोई बुरा भी नहीं मानता। नौकरी नीचे है, पढ़ाई नीचे है, और जिसके पास साधन आ जाता है वह हल्द्वानी या दिल्ली की तरफ़ चला जाता है।
जो सात बच्चे बचे थे, वे उन घरों के थे जो जा नहीं सके।
निकटवर्ती विद्यालय चार किलोमीटर दूर था, और चार किलोमीटर वहाँ नक़्शे की दूरी है। रास्ता एक गाड़ नाले को पार करता है और बरसात में वह पार नहीं होता। सर्दियों में सुबह सात बजे उस रास्ते पर पाला रहता है।
यानी विलय का मतलब यह नहीं था कि बच्चे दूसरे स्कूल चले जाएँगे। मतलब यह था कि तीन-चार बच्चे पढ़ना छोड़ देंगे।
यह बात गाँव को मालूम थी और अफ़सरों को भी मालूम थी। आदेश में इसकी जगह नहीं होती।
गाँव के पास एक ही रास्ता था। गिनती बढ़ाना।
बैठक अप्रैल में हुई, सत्र शुरू होने से पहले, और उसमें ग्यारह लोग थे। इसमें कोई नेता नहीं था। जो बात सबसे पहले उठाई, वह त्रिलोक ने उठाई, जो खच्चर से सामान ढोता था और जिसके दो बच्चे उन सात में थे।
उन ग्यारह ने चार काम बाँटे।
पहला काम गाँव के भीतर था। उस गाँव में पाँच बच्चे ऐसे थे जो स्कूल जाने की उम्र के हो चुके थे और जिनका नाम कहीं नहीं लिखा गया था। तीन इसलिए कि माँ-बाप को यह लगता था कि स्कूल बंद ही होने वाला है, तो क्या फ़ायदा। दो इसलिए कि उनके पास आधार नहीं था।
आधार बनवाने के लिए किसी को तहसील जाना पड़ता है, और वह पूरे दिन का काम है, और उस दिन की मज़दूरी जाती है। यह वह जगह है जहाँ ऐसी बातें रुक जाती हैं।
दयावती वहाँ आँगन के काम करती थी और उसने कहा कि मैं ले जाऊँगी।
वह दो बार गई। पहली बार काग़ज़ पूरे नहीं थे। दूसरी बार में काम हुआ। दो दिन की मज़दूरी उसकी गई और किसी ने उसे लौटाई नहीं, और उसने माँगी भी नहीं।
दूसरा काम बग़ल के तोक में था, जहाँ चार घर हैं और वे इस स्कूल से पौना किलोमीटर दूर हैं और दूसरे स्कूल से पौने चार। उनके तीन बच्चे उस दूसरे स्कूल में लिखे हुए थे, काग़ज़ पर, और असल में वे किसी स्कूल नहीं जाते थे, क्योंकि रास्ता लंबा था।
उन तीन का नाम इधर करवाने में तीन हफ़्ते और चार चक्कर लगे।
तीसरा काम अफ़सर की तरफ़ था। खंड शिक्षा अधिकारी को यह लिखकर देना था कि नामांकन बढ़ गया है और इसका सत्यापन होता है।
सत्यापन का मतलब यह है कि कोई आकर बच्चों को गिनता है, किसी एक दिन, बिना बताए।
चौथा काम वह था जिसकी किसी ने बैठक में गिनती नहीं की। स्कूल में उस बरस से पहले पीने के पानी की टंकी नहीं थी और बच्चे नीचे धारे से पानी लाते थे। गाँव ने चंदा करके एक टंकी रखवाई, जिसमें सात हज़ार लगे, और इसका कारण नेकनीयती नहीं थी। सत्यापन करने वाला अफ़सर स्कूल की हालत भी देखता है, और गाँव को यह मालूम था।
यही गिनती के दिन थे।
इन दिनों में गाँव ने जो किया, वह चतुराई थी और उसे चतुराई ही कहना चाहिए। जिस भी दिन कोई गाड़ी नीचे से ऊपर आती दिखती, उस दिन बच्चों को स्कूल भेजा जाता था, चाहे बुख़ार हो, चाहे घर में कोई काम हो। गाड़ी दो किलोमीटर पहले से दिख जाती है, क्योंकि मोड़ खुला है।
सत्यापन जून में हुआ। उस दिन पंद्रह बच्चे मौजूद थे।
कुल नामांकन पंद्रह हुआ, यानी सात पुराने, पाँच गाँव के अंदर से, और तीन तोक से।
विलय का आदेश उस बरस के लिए वापस हुआ। स्कूल खुला रहा।
उस बरस के लिए। यह पूरा जवाब नहीं है और गाँव को यह मालूम है। नामांकन दस से नीचे गया तो आदेश दोबारा आएगा, और वह किसी भी बरस जा सकता है, क्योंकि पंद्रह में से चार अगले बरस छठी में जाएँगे और छठी वहाँ नहीं है।
मास्टर एक ही हैं। पाँचों कक्षाएँ वही पढ़ाते हैं, एक कमरे में, अलग-अलग कतारों में बिठाकर।
दूसरा कमरा बंद रहता है। उसमें मिड-डे मील का सामान रखा जाता है और छत टपकती है, और उसकी मरम्मत का प्रस्ताव तीन बरस से भेजा जा रहा है।
बाहर लोहे की घंटी लटकी है, जो असल में ट्रक का पुराना पत्ती-स्प्रिंग है, और उसे बजाने के लिए एक कील बाँधकर रखी गई है। सुबह वह ठीक दस बजे बजती है और उसे बजाने का काम बारी-बारी से बच्चों को मिलता है, और यह इनाम माना जाता है। पंद्रह बच्चों में हर बच्चे की बारी तीन हफ़्ते में एक बार आती है, और त्रिलोक ने वह क्रम एक काग़ज़ पर लिखकर दीवार पर चिपका दिया है, ताकि झगड़ा न हो।