टोंटी लग गई थी। तीन महीने पानी आया। फिर बंद हो गया।
कोकिला के टोले में तेईस घर हैं और वह गाँव के मुख्य हिस्से से आठ सौ मीटर हटकर है। पानी की योजना में उस टोले तक पाइप डाला गया, चौकी बनी, और छह जगह टोंटियाँ लगीं।
पानी अगस्त में आना शुरू हुआ और नवंबर में बंद हो गया।
बंद होने की वजह पाइप नहीं थी। पाइप ठीक था।
वजह यह थी कि जो मोटर पानी ऊपर टंकी में चढ़ाती है, वह बिजली से चलती है, और उसका बिल पंचायत के खाते से जाता है, और वह बिल बकाया हो गया।
बिल कितने का था, यह बहुत बाद में मालूम हुआ। बयालीस हज़ार।
पंचायत के पास पैसा नहीं था और उसकी वजह चोरी नहीं थी। योजना में पाइप और टंकी का पैसा आता है और चलाने का ख़र्च गाँव के अपने पैसे से चलना होता है, और वह पैसा पानी के मासिक शुल्क से आना चाहिए।
शुल्क घर के हिसाब से पचास रुपए महीना तय था।
गाँव में उसे लगभग कोई नहीं देता था। कोई भी नहीं।
नल बंद होने की वजह सरकार नहीं थी। ठेकेदार भी नहीं था। वजह यही थी कि गाँव ने पचास रुपए नहीं दिए।
पचास रुपए न देने की भी वजह थी। मुख्य गाँव में हैंडपंप हैं और कुएँ हैं, इसलिए वहाँ नल की ज़रूरत उतनी नहीं है। जिन घरों को सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, वे उस टोले के तेईस घर थे, जहाँ पानी सात सौ मीटर दूर के एक हैंडपंप से आता था।
यानी शुल्क सबसे ज़्यादा उन्हें देना था जिनकी संख्या सबसे कम थी।
कोकिला ने यह हिसाब चार महीने में समझा और उसमें उसे किसी ने मदद नहीं की।
उसने जो किया, उसकी शुरुआत एक बहुत छोटी चीज़ से हुई। वह पंचायत की बैठक में गई और उसने पूछा कि बिल कितने का है।
यह सवाल उस बैठक में पहले किसी ने नहीं पूछा था। लोग यह पूछते थे कि पानी कब आएगा।
बयालीस हज़ार का नंबर सामने आने के बाद बात बदल गई, क्योंकि उसके बाद हिसाब लगाया जा सकता था।
तेईस घरों का पचास रुपए महीना आठ सौ पचास बनता है। पूरे गाँव के एक सौ चौदह घरों का पाँच हज़ार सात सौ।
उसने पहले अपने टोले के तेईस घर पकड़े। पूरे गाँव को छोड़ दिया।
इसमें सात महीने गए। तेईस में से उन्नीस तैयार हुए।
जो चार नहीं हुए, उनमें से दो के घर में कमाने वाला नहीं था और दो ने कहा कि जब पूरा गाँव देगा तब मैं दूँगा।
उन्नीस घरों से महीने के नौ सौ पचास बने। सिर्फ़ इतने।
यह बयालीस हज़ार के मुक़ाबले कुछ नहीं था और यही उसका काम आया।
उसने वे नौ सौ पचास महीने पंचायत में जमा कराने शुरू किए, रसीद लेकर, हर महीने की सात तारीख़ को, और उसकी नक़ल अपने पास रखी।
उन ग्यारह महीनों में दो बार पैसा जमा होने से रह गया। एक बार सचिव गाँव में नहीं था, चार दिन, और दूसरी बार रसीद की कापी ख़त्म हो गई थी। दोनों बार कोकिला ने पैसा घर पर रखा और अगले महीने दोनों महीनों की रसीद अलग-अलग बनवाई, एक ही दिन, क्योंकि उसे यह मालूम हो गया था कि रसीद पर तारीख़ ही काम की चीज़ है।
ग्यारह महीने बाद उसके पास दस हज़ार चार सौ पचास की रसीदें थीं और उन्हीं रसीदों से वह ज़िले तक गई।
वहाँ उसने बिल माफ़ नहीं माँगा।
उसने यह माँगा कि जो टोला अपना शुल्क दे रहा है, उसके लिए मोटर हफ़्ते में दो दिन चलाई जाए, और उसका ख़र्च उसी जमा पैसे से काटा जाए।
यह माँग इतनी छोटी थी कि उसे मना करने की कोई वजह नहीं बनी।
आदेश तीन महीने में आया और उसमें हफ़्ते में दो दिन नहीं, तीन दिन लिखा गया, जो उसने माँगे ही नहीं थे।
पानी उस टोले में अब तीन दिन आता है। सुबह छह से आठ।
बाक़ी गाँव में नल अब भी बंद हैं और मुख्य हिस्से के लोग हैंडपंप से काम चलाते हैं।
इसका असर एक तरफ़ और पड़ा, जो कोकिला ने नहीं सोचा था। मुख्य गाँव के चार घर, जो टोले के पास पड़ते हैं, अब पानी लेने उस टोले में आते हैं, और वे शुल्क भी देने लगे हैं।
जिन दो घरों में कमाने वाला नहीं था, उनका पचास कोकिला ने अपनी जेब से डाला, ग्यारह महीने, और यह उसने किसी को नहीं बताया। बाद में वह बात एक बार खुली और उन दोनों घरों की औरतें उससे नाराज़ हुईं, और उसके बाद उनका पैसा टोले के बाक़ी घरों में बाँटकर निकाला जाने लगा, पाँच-पाँच रुपए।
उन उन्नीस घरों में एक चीज़ हर महीने की सात तारीख़ को होती है। कोकिला हर घर से पचास लेने ख़ुद नहीं जाती, वह अपने आँगन में बैठ जाती है और लोग आकर दे जाते हैं, और जो नहीं आता उसके यहाँ वह जाती भी नहीं, वह अगले महीने दो का हिसाब लिख देती है।