पेटी पर दो ताले थे और खाते पर दो दस्तख़त, और भावना अध्यक्ष थी।

गोंदिया ज़िले के उस गाँव में समूह दो हज़ार अठारह में बना। बारह औरतें, महीने का सौ रुपए, और तीन बरस में उनके खाते में एक लाख से ऊपर हो गया।

नियम के हिसाब से पैसा निकालने के लिए तीन में से दो लोगों के दस्तख़त चाहिए होते हैं। वे तीन अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष होते हैं।

उस समूह में अध्यक्ष भावना थी और बाक़ी दो पद गाँव के एक ही घर की दो औरतों के पास थे।

यानी दो दस्तख़त एक घर में हो जाते थे। खाता उसी घर का था।

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इसमें कोई चोरी नहीं हुई।

पैसा उन कामों में गया जो उस घर ने तय किए, और यही सब कुछ था।

क़र्ज़ समूह से लिए जाते हैं और उन पर ब्याज कम होता है। तीन बरस में उस समूह ने चौदह क़र्ज़ दिए और उनमें से नौ उन दो औरतों के नाते-रिश्ते में गए।

बाक़ी दस औरतों में से चार को एक बार भी नहीं मिला।

इन चार में भावना भी थी। अध्यक्ष।

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यह उन्हें खटकता था और वे इस पर बोलती भी थीं, बैठक में, और उसका जवाब यह मिलता था कि जिसका काग़ज़ पूरा होता है उसी को मिलता है।

यह जवाब झूठ नहीं था। काग़ज़ उन्हीं को बनाना आता था।

भावना ने तीन बरस में जो किया, उसमें झगड़ा एक बार भी नहीं हुआ।

उसने पहली चीज़ यह की कि हिसाब की कापी अपने पास रखनी शुरू की।

यह अध्यक्ष का हक़ था और उसने वह कभी माँगा नहीं था। कापी सचिव के घर रहती थी, यानी उसी घर में।

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कापी माँगने पर दे दी गई। मना करने की वजह नहीं थी।

कापी अपने पास आने के बाद उसे पहली बार यह दिखा कि कुल जमा कितना है, किसका बकाया है, और ब्याज का हिसाब कैसे लगा है।

उसमें उसे एक गड़बड़ भी मिली और वह चोरी की नहीं थी, जोड़ की थी। ब्याज सात महीने का जुड़ा था जहाँ नौ महीने का बनता था, और वह एक क़र्ज़ में दो सौ अस्सी रुपए का फ़र्क़ था।

उसने वह बैठक में रखा। ठीक करा दिया।

इस एक चीज़ का असर उसने सोचा नहीं था। बाक़ी औरतों को यह लगा कि कापी देखने से कुछ निकलता है।

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दूसरी चीज़ उसने बैंक की तरफ़ की।

उसने खाते में तीसरा दस्तख़त जुड़वाया। अपना।

यह नियम में पहले से था और उस समूह में किसी ने कराया नहीं था। तीन में से कोई दो, इसका मतलब यह भी है कि तीसरा भी दो में आ सकता है, और उसके लिए तीनों के नमूने बैंक में होने चाहिए।

उसका नमूना बैंक में नहीं था। तीन बरस से नहीं था।

यह कराने में उसे सात महीने और पाँच चक्कर लगे और उसकी वजह किसी का विरोध नहीं था। वजह यह थी कि समूह का प्रस्ताव, बैठक की नक़ल और बैंक का फ़ॉर्म, तीनों एक साथ चाहिए थे, और हर बार उनमें से एक कम रह जाता था।

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तीसरा दस्तख़त जुड़ने का असल असर तुरंत नहीं दिखा और उसे यह मालूम भी था। जब तक दो लोग एक ही घर के हैं, तब तक कोई भी दो मिलकर पैसा निकाल सकते हैं और तीसरे की ज़रूरत नहीं पड़ती। फ़र्क़ यह पड़ा कि बैंक के काग़ज़ में अब उसका नाम था, और बैंक से आने वाला हर परचा तीनों के नाम से आता था।

तीसरी चीज़ सबसे छोटी थी।

पेटी पर उसने तीसरा ताला लगवाया। अपना।

पेटी में नक़द रहता है, थोड़ा-सा, महीने की वसूली का, और उस पर दो ताले थे, दोनों उस घर के।

तीसरा ताला उसने अपने पैसे से ख़रीदा, एक सौ दस रुपए में, और उसकी चाबी अपने पास रखी। उसने यह बैठक में बताया और किसी ने विरोध नहीं किया, क्योंकि विरोध करने के लिए कोई वजह बतानी पड़ती।

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उन तीन बरसों में एक बार ऐसा हुआ जब उसे लगा कि वह हार जाएगी। दूसरे बरस समूह की बैठक में यह बात उठाई गई कि अध्यक्ष बदल दिया जाए, और उसका कारण यह बताया गया कि भावना बैठक में हिसाब पर बहुत वक़्त लेती है। बात वोट तक गई और वह छह-छह पर अटकी, और दो औरतें उस दिन बैठक में नहीं आई थीं। अगली बैठक में वह बात दोबारा नहीं उठाई गई।

आज उस समूह में अठारह औरतें हैं और खाते में तीन लाख से ऊपर है।

पिछले दो बरस में जो नौ क़र्ज़ दिए गए, उनमें से पाँच उन औरतों को गए जिन्हें पहले तीन बरस में एक बार भी नहीं मिला था।

वे दोनों औरतें अब भी समूह में हैं और उनमें से एक अब भी सचिव है।

पेटी अब भी वही है और उस पर तीनों ताले लगे रहते हैं। खोलने में इससे वक़्त ज़्यादा लगता है और बैठक में यह बात कही भी जाती है, हर बार, और भावना उस पर कुछ नहीं कहती और चाबी अपनी जेब से निकालती रहती है।