दो बरस की उम्र में वह छह किलो का था और उस उम्र में ग्यारह के आसपास होना चाहिए।
फुलेश्वरी शिवपुरी ज़िले के एक गाँव में रहती है। उसके तीन बच्चे हैं और यह दूसरा है।
उसका पहला बच्चा ठीक बढ़ा था और तीसरा भी ठीक बढ़ा। इसी बात ने उसे सबसे ज़्यादा उलझाया, क्योंकि खाना घर में एक ही बनता है।
आँगनबाड़ी की कार्यकर्ता ने उसे नापा और लाल घेरे में बताया।
उस नाप का एक तरीक़ा है, जो हाथ की बाँह का घेरा है। एक फ़ीते से बाँह नापी जाती है और उस पर रंग बने होते हैं। हरा, पीला, लाल।
उसका लाल था। बिल्कुल लाल।
उसे पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा गया, जो ज़िला अस्पताल में है और जहाँ बच्चा भर्ती होता है, माँ के साथ।
भर्ती चौदह दिन की होती है। कम नहीं।
पहली असली दिक़्क़त यहीं आई। दवा की नहीं थी।
चौदह दिन का मतलब यह था कि फुलेश्वरी चौदह दिन घर से बाहर रहेगी। घर में दो और बच्चे थे, एक नौ बरस का और एक सात महीने का।
उसके पति सूरत में थे। छुट्टी नहीं मिलती।
यह वह बिंदु है जहाँ बहुत मामले रुक जाते हैं। केंद्र में जगह होती है, दवा मुफ़्त होती है, खाना मुफ़्त होता है, और माँ जा नहीं सकती।
जो रास्ता उसके पास था, उसने वही लिया। सात महीने के बच्चे को साथ ले लिया और नौ बरस के को अपनी सास के पास छोड़ा, जो उसी गाँव में अलग रहती थीं और जिनसे उसकी बोलचाल कम थी।
सास ने रखने को हाँ कह दी और उसमें एक बात ऐसी हुई जिसका फुलेश्वरी को अंदाज़ा नहीं था। सास ने पैसा नहीं माँगा और ताना भी नहीं दिया। उसने बस यह पूछा कि पहले क्यों नहीं बताया, बच्चा दो महीने से सूख रहा था। यह सुनकर फुलेश्वरी कुछ बोल नहीं पाई, क्योंकि उसे भी दो महीने से दिख रहा था।
केंद्र में जो हुआ, वह उसने वैसा नहीं सोचा था।
उसे यह लगता था कि वहाँ कोई इंजेक्शन या दवा दी जाएगी। वहाँ जो दिया गया, वह खाना था। सिर्फ़ खाना।
उसे दिन में आठ बार खिलाया गया। थोड़ा-थोड़ा, हर दो-ढाई घंटे में, और उसमें दूध, तेल और चीनी मिलाकर बना एक घोल था।
यह बात उसे अजीब लगी और उसने पूछा भी। जो जवाब मिला, वही उस पूरे इलाज की जड़ है। भूखे बच्चे का पेट एक बार में ज़्यादा नहीं ले सकता, और तेल में ताक़त सबसे ज़्यादा होती है, इसलिए कम मात्रा में ज़्यादा देना पड़ता है।
चौदह दिन में वह छह से साढ़े सात किलो हो गया। डेढ़ किलो।
छुट्टी के वक़्त उसे यह बताया गया कि यह आधा काम है।
आधा भी नहीं था। उससे कम।
केंद्र से लौटे बच्चों में बहुत से दोबारा वहीं पहुँच जाते हैं, और उसकी वजह लापरवाही नहीं होती। वजह यह है कि घर पर दिन में आठ बार खिलाना, तेल डालकर खिलाना, और अलग खिलाना, तीनों काम मज़दूरी करने वाली औरत के दिन में नहीं बैठते।
मज़दूरी उसकी मनरेगा के काम पर थी, जो उस बरस गाँव के तालाब की खुदाई का था। हाज़िरी सुबह आठ बजे लगती है और शाम पाँच बजे छूटती है, और बीच में एक घंटा मिलता है। घर काम की जगह से आठ सौ मीटर था, यानी वह दोपहर के उस एक घंटे में घर आ सकती थी, और चौदह महीने वह रोज़ आई।
फुलेश्वरी ने चौदह महीने वह किया।
उसका तरीक़ा तीन चीज़ों का था और तीनों उसने ख़ुद निकाला।
पहला, उसने बच्चे का खाना अलग नहीं बनाया। वही दाल-चावल, पर उसके हिस्से में दो चम्मच तेल ज़्यादा और गुड़। अलग बनाना उसके बस में नहीं था और उसने कोशिश भी नहीं की।
दूसरा, उसने आठ बार को पाँच बार किया, क्योंकि आठ नहीं हो सकते थे, और उन पाँच में तीन उसने अपने काम के वक़्त के हिसाब से तय किए।
तीसरा, और यही सबसे काम आया, उसने खिलाने का काम अपने नौ बरस के बेटे को दे दिया।
दोपहर की दो ख़ुराक वह देता था। उसे यह गिनना सिखाया गया, चम्मच से, और वह गिनकर देता था और फुलेश्वरी लौटकर उससे पूछती थी।
चौदह महीनों में वह बच्चा साढ़े सात से दस किलो नौ सौ पर आया।
यह उस उम्र के लिए अब भी कम है। वह पूरा नहीं पकड़ पाया और डॉक्टरों ने बताया था कि पहले दो बरस में जो छूट जाता है, उसमें से कुछ लौटता नहीं।
आज वह लड़का सात बरस का है, स्कूल जाता है, और अपनी कक्षा में सबसे छोटे कद का है, जिसका उसे पता है।
फुलेश्वरी को यह मालूम है। वह इसका ज़िक्र नहीं करती।
आँगनबाड़ी में हर महीने वज़न होता है और फ़ीता बाँह पर बाँधा जाता है। उस केंद्र से लौटने के बाद उस बच्चे का रंग एक बार भी लाल में नहीं गया, और यह पूरी जीत नहीं है, यही जीत है, और फुलेश्वरी हर महीने उस दिन काम पर देर से जाती है।