चार सौ में से एक सौ इकतालीस बचे। बाईस बरस में।
मंगतराम सिंगरौली ज़िले का है। ज़मीन उसके पास नहीं है। वह पत्थर तोड़ने के काम पर जाता था और अब उम्र के कारण मज़दूरी कम लेता है।
जो ज़मीन उसने लगाई, वह गाँव की गोचर थी, यानी चरनोई। उस पर किसी का हक़ नहीं होता और सबका होता है, और उसकी सारी मुश्किल यहीं से आई।
पहला पेड़ उसने दो हज़ार चार में लगाया। वह मर गया।
पहले तीन बरस में उसने अठहत्तर लगाए और उनमें से नौ बचे।
यह हिसाब बहुत बुरा है और उसे यह मालूम था। उसने रुककर सोचा कि गड़बड़ कहाँ है।
पानी में नहीं थी। पानी वह डालता था, दो बाल्टी हर पौधे को, हर तीसरे दिन, और गरमी में रोज़।
पानी का इंतज़ाम कैसे होता रहा, यह भी अपने आप में एक काम है। गाँव का हैंडपंप उस जगह से चार सौ मीटर दूर है और वह दो बाल्टी एक बार में ले जा सकता था। गरमी के दिनों में पंद्रह पौधों के लिए तीस बाल्टी बनती हैं, यानी पंद्रह चक्कर, और वह उसने बरसों किया, सुबह मज़दूरी पर जाने से पहले।
गड़बड़ जानवरों में थी। बकरियों में।
गोचर ज़मीन पर बकरियाँ चरती हैं और बकरी नई कोंपल खा जाती है। पेड़ पानी के बिना कुछ हफ़्ते चल जाता है, ऊपर से कटने के बाद नहीं चलता।
इसके बाद उसने पेड़ लगाना घटा दिया और बाड़ लगाना बढ़ा दिया।
यह उलटा लगता है। चौथे बरस उसने बारह लगाए, बारह ही, और हर एक के चारों तरफ़ काँटों की झाड़ी की बाड़ बाँधी, दो फ़ुट ऊँची, और हर बरसात के बाद उसे दोबारा बाँधा।
बारह में से नौ बचे। पहली बार कुछ बचा।
काँटे वह सात किलोमीटर दूर से लाता था, सिर पर, क्योंकि आसपास की झाड़ियाँ लोग ईंधन के लिए काट ले जाते हैं।
एक बाड़ में डेढ़ घंटा लगता है और वह दो बरस चलती है, उसके बाद दोबारा बाँधनी पड़ती है।
आगे के बरसों में उसने यही किया। साल में दस से पंद्रह, हर एक के साथ बाड़, और जो मरे उनकी जगह अगले बरस भरी।
उसने जो लगाया, उसमें भी उसने सीखा।
शुरू के बरसों में उसने वही लगाया जो उसे अच्छा लगता था, यानी नीम और आम। आम उस ज़मीन पर चला ही नहीं, क्योंकि वहाँ मिट्टी पतली है और नीचे पत्थर है।
बाद में उसने महुआ, करंज, बेल और सागौन लगाया। महुआ उस इलाक़े में अपने आप होता है और वही सबसे ज़्यादा बचा, चौबीस में से बाईस।
गाँव की तरफ़ से जो हुआ, वह यह था।
पहले बरसों में यह मज़ाक़ था। लोग कहते थे कि यह ज़मीन तेरी नहीं है और तू यहाँ किसके लिए मेहनत कर रहा है। दो बार बाड़ें जान-बूझकर खोली गईं और एक बार पाँच पौधे उखाड़े गए।
उखाड़ने वाले का नाम गाँव में सबको मालूम था और मंगतराम ने पंचायत में बात नहीं की। उसने उसी हफ़्ते पाँच नए लगा दिए, उसी जगह।
बीच के बरसों में उसने दो चीज़ें छोड़ीं। एक, उसने गिनना छोड़ दिया। शुरू के आठ बरस उसे हर पेड़ का हिसाब याद था और उसके बाद वह गड़बड़ा गया, और यह हिसाब बाद में उसके बेटे ने दोबारा जोड़ा। दो, उसने बताना छोड़ दिया। पहले वह मज़दूरी पर जाते वक़्त लोगों को कहता था कि आज इतने लगाए, और फिर उसने यह कहना बंद कर दिया।
बदलाव उस बरस आया जब पहले वाले पेड़ छाया देने लायक़ हो गए।
बारहवें-तेरहवें बरस में उन नौ पेड़ों के नीचे बकरियाँ चराने वाले बैठने लगे, और उसके बाद उन्हीं लोगों ने बाड़ें ख़ुद ठीक करनी शुरू कर दीं।
अठारहवें बरस में पंचायत ने उस जगह के लिए एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें उसे सुरक्षित बताया गया।
मंगतराम को उससे कोई हक़ नहीं मिला और उसने माँगा भी नहीं। वह ज़मीन गाँव की है और उसे यह ठीक लगता है।
पैसा उसे इसमें कभी नहीं मिला। एक बार वन विभाग की एक योजना में उसका नाम आया और उसमें बारह हज़ार मिलने थे, और वह चार चक्कर के बाद उसने छोड़ दिया।
छोड़ने की वजह यह थी कि उसमें पौधों की गिनती और ज़मीन का काग़ज़ माँगा गया, और ज़मीन का काग़ज़ उसके पास नहीं है और होगा भी नहीं।
महुए से उसके घर में हर बरस कुछ आता है। फूल बीनकर बेचे जाते हैं और उससे मार्च-अप्रैल में तीन-चार हज़ार बन जाते हैं, और वह बीनने का काम गाँव के कई घर करते हैं, सिर्फ़ उसका नहीं।
अब उसकी उम्र इकसठ है और वह लगाना बंद नहीं किया है। पिछले बरस उसने नौ लगाए।
काँटे वह अब भी सात किलोमीटर से लाता है और वह अब सिर पर नहीं लाता, वह एक लड़के की साइकिल पर बँधवाकर लाता है और उसे बीस रुपए देता है। बाड़ वह ख़ुद बाँधता है, क्योंकि उसका कहना है कि बाँधने में जो चीज़ ज़रूरी है वह ताक़त नहीं, यह देखना है कि नीचे से कहीं खुला न रह जाए।