बीनने वाले को भाव नहीं मालूम होता। यहीं से सब शुरू होता है। पूरा खेल यही है।

प्यारेलाल मेरठ में सत्रह बरस बीनता रहा। सुबह पाँच बजे से दोपहर तक, बोरा पीठ पर, और शाम को गोदाम पर तुलवाकर पैसा।

उस काम में पैसा रोज़ मिलता है और यही उसका सबसे बड़ा जाल है। रोज़ का पैसा आदमी को रोज़ पर बाँध देता है।

गोदाम वाला एक ही भाव बोलता था। मिला-जुला कबाड़, आठ रुपए किलो।

मिला-जुला का मतलब यह था कि बोरे में जो कुछ है, सब उसी भाव पर।

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प्यारेलाल के बोरे में रोज़ यह सब होता था। पानी की बोतलें, दूध की थैलियाँ, गत्ता, अख़बार, टूटी चप्पलें, लोहे के टुकड़े, और कभी-कभी ताँबे का तार।

इनमें से हर चीज़ का अपना भाव होता है और वह आठ नहीं होता।

यह उसे सत्रह बरस में किसी ने नहीं बताया, और छिपाया भी किसी ने नहीं। पूछा उसने नहीं था।

पूछने का ख़याल उसे अपनी बेटी की वजह से आया।

वह आठवीं में थी और उसके स्कूल में कचरे पर कोई काम कराया गया था, जिसमें बच्चों को यह बताया गया था कि किस चीज़ का क्या दाम मिलता है। उसने घर आकर बताया कि पापा, बोतल का भाव पच्चीस रुपए किलो है।

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उस रात उसने उससे पूरी सूची लिखवाई।

अगले दिन वह गोदाम पर गया और उसने भाव पूछा। गोदाम वाले ने बता दिया, बिना किसी झिझक के, क्योंकि छिपाने की उसे ज़रूरत नहीं थी।

साफ़ प्लास्टिक की बोतल, अट्ठाईस। दूध की थैली धुली हुई, बारह। बिना धुली, पाँच। गत्ता, नौ। अख़बार, चौदह। पीतल, चार सौ। ताँबा, छह सौ।

मिला-जुला, आठ। सिर्फ़ आठ।

इसके बाद प्यारेलाल ने जो किया, उसमें कोई चतुराई नहीं है। उसने बोरा एक की जगह चार कर दिए।

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यह सुनने में आसान है और करने में नहीं।

एक बोरा पीठ पर चलता है। चार बोरे नहीं चलते। उसके लिए ठेला चाहिए, और ठेला हर गली में नहीं जाता, और ठेले के साथ आदमी की रफ़्तार आधी हो जाती है।

ठेला उसने कहाँ से लिया, यह भी हिसाब में है। नया ठेला उस वक़्त सात हज़ार का था और उसके पास नहीं थे। उसने एक पुराना ठेला लिया, तीन हज़ार दो सौ में, जिसका एक पहिया बैठा हुआ था, और पहिया उसने अपने मुहल्ले के साइकिल वाले से नौ सौ में बदलवाया। पहली बरसात में उसकी लकड़ी फूल गई और दूसरी बरसात से पहले उसने ऊपर टीन की चादर डलवा ली।

पहले महीने में उसकी कमाई घट गई। पूरे तीस फ़ीसदी।

उसने छोड़ा नहीं और इसकी वजह यह थी कि उसने हिसाब लगाकर देख लिया था। जो घटा था वह मात्रा थी, और जो बढ़ा था वह भाव था, और भाव का बढ़ना मात्रा के घटने से बड़ा था। यह हिसाब उसकी बेटी ने काग़ज़ पर किया।

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तीसरे महीने में वह पुरानी कमाई पर आ गया।

सातवें महीने में उसकी कमाई पौने दो गुनी थी।

छाँटने का काम शाम को होता था और वह डेढ़ घंटे का था। उसमें उसकी पत्नी और बेटी दोनों बैठती थीं और यह वह हिस्सा है जो इस पूरे बदलाव में सबसे ज़्यादा भारी था, क्योंकि वह डेढ़ घंटा किसी को नहीं मिला, वह सबसे कट गया।

दिवाली के आसपास के दो हफ़्ते उस काम में सबसे अच्छे रहते हैं। सफ़ाई सब घरों में होती है और गत्ता, काग़ज़ और पुराना लोहा उन दिनों बहुत निकलता है। पहले वह उन दिनों में भी आठ के भाव पर बेचता था। पहले बरस के दिवाली वाले दो हफ़्तों में उसने इकतीस सौ ज़्यादा कमाया, और यही वह रक़म थी जिससे उसे यह भरोसा हुआ कि हिसाब ठीक है।

एक बात उसने ग़लत की और उससे नुक़सान हुआ।

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दूसरे बरस उसने सोचा कि गोदाम वाले को छोड़कर सीधे बड़े व्यापारी को बेचे, जहाँ भाव दो-तीन रुपए ऊपर था। उसने दो महीने वहाँ बेचा और तीसरे महीने में उसका पैसा फँस गया, क्योंकि वहाँ भुगतान हफ़्ते में होता था और एक हफ़्ते नहीं हुआ।

उसमें उसके चार हज़ार गए और वह वापस पुराने गोदाम पर आ गया।

गोदाम वाले ने न ताना दिया न सवाल किया, और भाव भी वही रखा।

आज प्यारेलाल बीनता नहीं है। वह ख़रीदता है।

उसके पास एक कमरा किराए पर है, जिसमें कबाड़ रखा जाता है, और उसके यहाँ छह बीनने वाले माल लाते हैं।

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उनसे वह क्या भाव पर लेता है, यह सवाल असली है और उसका जवाब यह है। वह मिला-जुला नहीं लेता। वह छँटा हुआ लेता है और छाँटने का भाव अलग जोड़ता है, यानी जो बीनने वाला ख़ुद छाँटकर लाता है उसे ज़्यादा मिलता है।

छह में से चार अब छाँटकर लाते हैं।

जो दो नहीं लाते, उनसे उसने कहना छोड़ दिया है। पहले बरस उसने उन्हें कई बार समझाया और फिर उसे समझ आया कि रोज़ के पैसे पर चलने वाला आदमी शाम का डेढ़ घंटा नहीं निकाल सकता, और यह उसे बहुत अच्छी तरह मालूम है, क्योंकि सत्रह बरस वह भी नहीं निकाल पाया था।