पहली बार वह पाँच मिनट अड़तालीस सेकंड पर आया और चाहिए पाँच तीस थे। अठारह सेकंड।

तेजबहादुर मंडी ज़िले के एक गाँव का था और उसे राज्य पुलिस में जाना था। लिखित परीक्षा उसने पहली बार में निकाल ली थी, और यह उस भर्ती में आसान हिस्सा नहीं माना जाता।

शारीरिक जाँच में सोलह सौ मीटर की दौड़ होती है और उसका समय तय होता है। ऊँचाई ठीक थी। छाती ठीक थी। कूद भी ठीक थी।

दौड़ में वह बाहर हो गया।

दूसरी बार अगले बरस वह पाँच मिनट इकतालीस पर आया। ग्यारह सेकंड रह गए। दो बरस में सात सेकंड।

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लोग यहीं छोड़ देते हैं, और छोड़ने की वजह हिम्मत नहीं होती। वजह यह होती है कि आदमी को समझ नहीं आता कि वह क्या ग़लत कर रहा है। वह रोज़ दौड़ रहा था, वह थक रहा था, और उसका समय नहीं सुधर रहा था।

उन दो बरसों का हिसाब घर में किसी ने नहीं लगाया, पर वह था। तेजबहादुर बारहवीं के बाद से कुछ कमा नहीं रहा था और तैयारी के नाम पर घर में बैठा था, जो पहाड़ के उस गाँव में आम है और जिसे लोग बुरा नहीं मानते, पर उससे घर एक आदमी कम पर चलता है। उसके पिता सेब की पेटियाँ ढोने का काम करते थे, जो सीज़न का है, और दो बरस उन्होंने अक्टूबर के बाद भी नीचे जाकर मज़दूरी की।

तीसरे बरस के लिए उसके पास चौदह महीने थे और यह उसका आख़िरी मौक़ा था, क्योंकि उसकी उम्र सत्ताईस हो रही थी।

उस बरस उसने एक चीज़ बदली और सिर्फ़ एक। उसने रोज़ दौड़ना बंद कर दिया।

यह उसे उस लड़के ने बताया जो उसी गाँव से सेना में गया था और छुट्टी पर आया हुआ था। उसने पूछा कि तू रोज़ कितना दौड़ता है। तेजबहादुर ने कहा कि रोज़ चार किलोमीटर।

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उस लड़के ने कहा कि यही ग़लती है। रोज़ एक ही रफ़्तार पर एक ही दूरी दौड़ने से शरीर उसी रफ़्तार का आदी हो जाता है और उससे तेज़ चलना सीखता ही नहीं।

उसने उसे तीन तरह के दिन बताए।

पहला, तेज़ दिन। चार सौ मीटर तेज़, फिर दो मिनट चलना, और यह छह बार। इसमें कुल दौड़ सिर्फ़ ढाई किलोमीटर बनती है और थकान चार किलोमीटर से ज़्यादा होती है।

दूसरा, लंबा दिन। सात-आठ किलोमीटर, धीरे, बात करते हुए चला जाए इतनी धीरे।

तीसरा, आराम का दिन। कुछ नहीं। तीसरा दिन उसे सबसे मुश्किल लगा।

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यह सुनने में उलटा लगता है, और है नहीं। दो बरस उसने रोज़ दौड़ने को मेहनत माना था, और अब उसे बताया जा रहा था कि हफ़्ते में दो दिन कुछ नहीं करना है।

पहाड़ का एक फ़ायदा उसे मिला और एक नुक़सान।

फ़ायदा यह कि चढ़ाई पर दौड़ने से टाँगों की ताक़त अपने आप बनती है। नुक़सान यह कि भर्ती की दौड़ समतल मैदान पर होती है और उसकी रफ़्तार का हिसाब चढ़ाई पर नहीं बनता।

इसलिए वह हफ़्ते में एक दिन नीचे जाता था, बीस किलोमीटर, बस से, जहाँ एक स्कूल का समतल मैदान था।

किराया छियालीस रुपए था और वह चौदह महीने में लगभग पचास बार गया।

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समय उसने घड़ी से नापा। फ़ोन की घड़ी से, हर बार, और वह हिसाब उसे याद रहता था क्योंकि वह एक ही नंबर था जिसका उसे इंतज़ार था।

छठे महीने में वह पाँच मिनट छत्तीस पर आया। नौवें महीने में पाँच इकतीस पर।

उसके बाद चार महीने वह वहीं अटका रहा। पाँच इकतीस, पाँच बत्तीस, पाँच तीस-तीस।

इसके बाद जो चीज़ काम आई, वह दौड़ नहीं थी। जनवरी में उसका वज़न तीन किलो कम हुआ, और वह उसने जानबूझकर किया नहीं था। घर में उन दिनों तेल कम हो गया था और खाने में बदलाव आया, और उसका असर उसकी रफ़्तार पर पड़ा।

यह उसे बाद में समझ में आया, और उसने उसे संभालकर रखा, यानी उसने आगे भी वज़न वहीं रखा।

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उस आख़िरी महीने में एक चीज़ हुई जिसका उसने अंदाज़ा नहीं लगाया था। फरवरी में उसका पैर मुड़ गया, बर्फ़ पर, घर के बाहर, और दौड़ना नौ दिन बंद रहा। इन नौ दिनों में उसे यह डर लगा रहा कि जो बना है वह बैठ जाएगा। दसवें दिन उसने दौड़कर देखा और समय पाँच मिनट अट्ठाईस निकला, यानी बिगड़ा नहीं था, और उस लड़के ने फ़ोन पर कहा कि नौ दिन के आराम से कुछ नहीं जाता, नौ हफ़्ते के आराम से जाता है।

भर्ती की दौड़ मार्च में हुई। उसका समय पाँच मिनट छब्बीस सेकंड रहा। वह चुन लिया गया।

उसकी तैनाती उसी बरस उस ज़िले में नहीं हुई, वह पाँच सौ किलोमीटर दूर मिली, और उसकी माँ अकेली रह गई, क्योंकि उसका भाई पहले से बाहर था।

गाँव में अब चार लड़के तैयारी करते हैं और तीनों तरह के दिन वे भी करते हैं। तेजबहादुर ने उन्हें बताया नहीं, उस सेना वाले लड़के ने बताया।

जो चीज़ तेजबहादुर ने उन्हें बताई, वह सिर्फ़ एक है, और वह हर बार फ़ोन पर वही कहता है। आराम के दिन आराम करना, वरना बाक़ी दोनों दिन बेकार जाते हैं।