घर में यह बात पच्चीस बरस चली। जब भी कोई बहस लंबी होती और देवंती अपनी बात पर टिक जाती, उसकी जेठानी वह वाक्य निकाल देती। आठवीं फेल से क्या बहस करें।
बात यहाँ ख़त्म हो जाती थी। हर बार।
वह वाक्य सही भी नहीं था। यही चुभता था। वह आठवीं फेल नहीं थी। वह आठवीं पास थी, बयालीस नंबर से, और नौवीं में उसका दाख़िला भी हो गया था। उसकी शादी उसी जुलाई में तय हो गई और वह स्कूल तीन हफ़्ते चली, फिर छूट गया। फेल वह कभी नहीं हुई।
यह उसने कई बार बताया भी। कोई इसे सुनता नहीं था, क्योंकि सुनने वालों के लिए आठवीं और आठवीं फेल में कोई फ़र्क़ नहीं था।
दो हज़ार पच्चीस के दिसंबर में पूजा ने बताया कि उसका दसवीं का फ़ॉर्म भर गया है।
पूजा उसकी बेटी है। उसी शाम, खाना बनाते वक़्त, देवंती ने उससे पूछा कि खुले स्कूल से भी दसवीं होती है क्या।
पूजा ने कहा कि होती है। उसने अपनी सहेली की मौसी का नाम बताया, जिन्होंने अड़तीस की उम्र में बारहवीं की थी। फिर उसने फ़ोन पर वेबसाइट खोलकर दिखाई और यह भी बता दिया कि फ़ॉर्म भरने की तारीख़ निकल चुकी है और अगला सत्र अप्रैल में है।
देवंती ने उससे इतना कहा कि किसी को मत बताना।
उसने यह डर से नहीं कहा। घर में बताने का मतलब यह होता कि पूरे तीन महीने इस पर बात होती रहती, और बात होने से काम रुकता है।
फ़ॉर्म भरने में पहली दिक़्क़त पुराने काग़ज़ की थी। खुले स्कूल में दसवीं के लिए आठवीं का प्रमाण चाहिए। उसकी आठवीं की अंकसूची घर में कहीं थी और नहीं मिली। जो स्कूल उसने पढ़ा था, वह दो हज़ार नौ में बंद हो गया और उसका रिकॉर्ड कटनी के संकुल केंद्र में चला गया।
वहाँ रजिस्टर मिल गया, पर उसमें उसका नाम देवंती बाई लिखा था और आधार में देवंती।
इस एक अक्षर के फ़र्क़ में उन्नीस दिन गए। सुधार के लिए दो जगह जाना पड़ा और एक शपथपत्र बनवाना पड़ा, जिसका दो सौ रुपए लगा।
फ़ॉर्म अप्रैल में जमा हुआ।
उसके बाद जो हुआ वह पढ़ाई थी, और उसमें कोई नाटक नहीं है। रोज़ रात नौ बजे, बरतन निपटाने के बाद, वह पूजा की किताबें लेकर आँगन में बैठती थी। बिजली अक्सर जाती थी, इसलिए एक इमरजेंसी लाइट ख़रीदी गई, जिसका चार सौ बीस रुपए लगा और जो अभी भी चल रही है।
सामाजिक विज्ञान उसे आसान लगा। हिंदी में उसे कोई परेशानी ही नहीं हुई। अंग्रेज़ी उसने रटकर की, जो सही तरीक़ा नहीं है और उस वक़्त उसके पास और तरीक़ा नहीं था।
गणित में वह अटकी।
पच्चीस बरस पहले उसने जो गणित छोड़ा था, उसमें बहुपद नहीं थे। दसवीं में हैं। पूजा ने उसे तीन हफ़्ते समझाया और दोनों की आवाज़ें दो बार ऊँची हुईं, और एक रात पूजा ने कहा कि आपको सवाल नहीं आता, आपको सवाल पढ़ना नहीं आता, आप बीच से पढ़ना शुरू कर देती हैं।
यह बात सही थी और उसी से रास्ता निकला। उसके बाद देवंती हर सवाल पहले पूरा पढ़ती, फिर जो दिया है उसे अलग लिखती, फिर जो पूछा है उसे अलग।
परीक्षा केंद्र तीस किलोमीटर दूर था। बस साढ़े छह बजे की थी और पर्चा साढ़े नौ बजे।
पहले दिन उसे एक चीज़ का अंदाज़ा नहीं था। कमरे में बाक़ी सब सोलह-सत्रह बरस के थे और वह उनके बीच बैठी थी। दो लड़कियों ने उसे आंटी कहकर बुलाया और एक ने पूछा कि आप कौन सा विषय पढ़ाती हैं। उसने कहा कि वह पढ़ाती नहीं, पर्चा दे रही है।
इसके बाद उस कमरे में यह कोई बात नहीं रही। बच्चों को अपने पर्चे की चिंता थी।
नतीजा जून में आया। वह चार विषयों में पास हुई और गणित में सत्ताईस नंबर पर रह गई। पास के लिए तैंतीस चाहिए।
पूजा उसी नतीजे में पूरी पास हुई, और उसके गणित में इक्यासी थे।
उस शाम घर में मिठाई आई और वह पूजा के लिए आई। देवंती ने भी खाई। उसने उस दिन अपने नतीजे का ज़िक्र नहीं किया और किसी ने पूछा भी नहीं, क्योंकि किसी को मालूम ही नहीं था।
गणित का दूसरा मौक़ा सितंबर में था। उसने वे तीन महीने सिर्फ़ गणित पढ़ा और इस बार पूजा ने उसे पुराने पाँच बरसों के पर्चे निकालकर दिए। सितंबर में उसने वह पर्चा दिया और उनचास नंबर से पास हुई।
अंकसूची अक्टूबर में आई। उसने वह किसी को नहीं दिखाई। जेठानी को आज तक नहीं मालूम।
इसकी वजह वह नहीं है जो लगती है। उसे उस वाक्य का जवाब नहीं देना था, उसे वह वाक्य ग़लत कराना था, और वह अब ग़लत है, चाहे किसी को पता हो या न हो।
नवंबर में पूजा के स्कूल की बैठक थी और वहाँ अभिभावक के दस्तख़त लेने होते हैं। बाबू के मेज़ पर स्याही का पैड रखा रहता है, क्योंकि आधे से ज़्यादा लोग अँगूठा लगाते हैं, और पिछले चार बरस देवंती भी अँगूठा लगाती आई थी। उस दिन बाबू ने पैड उसकी तरफ़ बढ़ाया। उसने वह वापस उसकी तरफ़ खिसका दिया और पूरा नाम लिखा, देवंती, और उसमें उसे ग्यारह सेकंड लगे, और उसके बाद हर बार वह इतना ही वक़्त लेती है और अँगूठे वाला पैड उसकी तरफ़ अब बढ़ाया नहीं जाता।