मशीन पर नंबर पाँच सेकंड दिखता है और फिर बुझ जाता है।

किशनी छह बरस से रोज़ सुबह और शाम दूध ले जाती थी। अलवर के उस गाँव की समिति सुबह छह बजे खुलती थी। आदमी अपना कैन डालता है, बाबू एक छोटी नली में नमूना भरकर मशीन में लगाता है, पर्दे पर फैट का नंबर आता है, और वह उसे रजिस्टर में नाम के आगे लिख देता है। हिसाब दस दिन में होता है और पैसा फैट के हिसाब से बनता है।

किशनी का फैट हमेशा चार दशमलव एक और चार दशमलव तीन के बीच आता था।

उसकी बग़ल वाली धापूबाई का चार दशमलव छह और चार दशमलव आठ आता था।

दोनों की भैंसें एक ही तरह की थीं। चारा एक जैसा, खल एक जैसी, और दोनों के बाड़े एक ही दीवार के दो तरफ़ थे।

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यह उसे खटकता था। पर खटकने और साबित करने में बहुत फ़र्क़ है।

किशनी पढ़ी नहीं थी। वह अपना नाम नहीं लिख सकती थी और गिनती बोल सकती थी, यानी एक से सौ तक गिन सकती थी, पर लिखा हुआ अंक देखकर पहचान नहीं सकती थी।

यह दो अलग चीज़ें हैं और अक्सर एक समझ ली जाती हैं।

इसलिए मशीन के पर्दे पर जो पाँच सेकंड आता था, वह उसके लिए रोशनी थी और कुछ नहीं। रजिस्टर में जो चढ़ता था, वह भी उसके लिए कुछ नहीं था। दस दिन बाद जो पैसा मिलता था, उसे वह गिन सकती थी, और वही उसके पास पूरी जानकारी थी।

एक शाम उसने अपनी पोती से कहा कि मुझे अंक पढ़ना सिखा दे।

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ज्योति छठी में थी। उसने पहले हँसा और फिर पूछा कि क्यों।

किशनी ने वजह नहीं बताई। उसने कहा कि सिखा दे।

इसमें तीन हफ़्ते लगे और तीन हफ़्ते बहुत हैं, क्योंकि सीखने वाली चीज़ दस अंक थी। इसकी इसका कारण यह था कि दस अंक पहचानना आसान है और दो अंकों को साथ में पढ़ना मुश्किल है। चार और छह अलग-अलग वह चार दिन में पहचानने लगी। चार दशमलव छह को एक साथ, एक झलक में पढ़ना, इसमें बाक़ी दिन गए।

ज्योति ने उसे यह अभ्यास घर की चीज़ों पर कराया। दवा के पत्ते, गैस के सिलेंडर पर लिखा नंबर, टीवी का रिमोट, और सबसे ज़्यादा काम बिजली के मीटर से चला, जिसका अंक बदलता रहता है।

गंगौर के आसपास वह पढ़ने लगी।

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उसके बाद उसने समिति पर एक काम शुरू किया, जो देखने में कुछ भी नहीं था।

वह मशीन के सामने खड़ी होने लगी।

पहले वह कैन डालकर पीछे हट जाती थी, जैसे सब हटते हैं। अब वह वहीं खड़ी रहती और पर्दे की तरफ़ देखती रहती। नंबर आता, वह उसे पढ़ती, और ऊँची आवाज़ में बोल देती। चार दशमलव छह।

पहले दिन बाबू ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। रजिस्टर में उस दिन चार दशमलव छह चढ़ा।

यह उसने रोज़ किया। बोलने में उसे कोई शरम नहीं आती थी, क्योंकि वह बोल ही रही थी, किसी पर इलज़ाम नहीं लगा रही थी।

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दो महीने में उसका औसत फैट चार दशमलव एक से चार दशमलव छह पर आ गया। दस दिन के हिसाब में यह तीन सौ चालीस से चार सौ रुपए का फ़र्क़ है, और महीने का बारह सौ के आसपास।

एक हफ़्ता ऐसा भी आया जब उसे लगा कि यह सब बेकार गया। जुलाई में हरा चारा आ गया और उसका फैट अपने आप गिरकर तीन दशमलव नौ पर आ गया। वह चार दिन यही मानती रही कि नंबर ग़लत लिखा जा रहा है। पाँचवें दिन धापूबाई ने उसे बताया कि बरसात में सबका गिरता है, यह मशीन का दोष नहीं है, भैंस का पेट है।

बाबू चोर था या मशीन का नंबर पढ़ने में जल्दबाज़ी करता था, यह किसी ने साबित नहीं किया, और यह सवाल भी किसी ने नहीं उठाया। किशनी ने भी नहीं। उसने शिकायत कहीं नहीं की।

उसे शिकायत नहीं करनी थी। उसे अपना नंबर मालूम होना था।

तीसरे महीने में धापूबाई ने उससे पूछा कि तू क्या बोलती है वहाँ खड़े होकर। किशनी ने उसे बता दिया। धापूबाई पढ़ी हुई थी, पाँचवीं तक, और वह अगले दिन से ख़ुद पढ़ने लगी।

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अब वहाँ चार औरतें ऐसा करती हैं और एक आदमी भी।

छह महीने तक वह बारह सौ अलग नहीं रखा गया, घर के ख़र्च में मिल गया और दिखा भी नहीं। सातवें महीने से किशनी ने उसमें से हर महीने पाँच सौ अलग निकालने शुरू किए, और डेढ़ बरस में उससे एक भैंस का आधा दाम बन गया, बाक़ी आधा उसने अपने बेटे से लिया।

ज्योति अब आठवीं में है और उसे यह मालूम है कि उसने जो सिखाया उसका नतीजा क्या निकला, क्योंकि किशनी ने उसे बता दिया था, उसी बरस, जब पहली बार पैसा ज़्यादा आया।

किशनी अब भी अपना नाम नहीं लिख सकती। उसने आगे पढ़ने की कोशिश नहीं की और उसे इसकी ज़रूरत भी नहीं लगी। सुबह छह बजे वह कैन डालती है, मशीन के सामने खड़ी रहती है, पाँच सेकंड में नंबर पढ़ती है, और उसे ऊँची आवाज़ में बोल देती है, चाहे पीछे कोई खड़ा हो या न हो।