मुनीश को 'क' और 'ट' पर अटकाव आता था। बाक़ी अक्षरों पर आमतौर पर नहीं आता था, और यह भी तय नहीं था। जिस दिन कोई उसे ध्यान से देख रहा होता, उस दिन हर अक्षर पर आ सकता था।
इसका कोई इलाज उसने नहीं छोड़ा था। बचपन में हज़ारीबाग़ में एक डॉक्टर के पास ले जाया गया, बाद में राँची में एक चिकित्सक ने अभ्यास बताए, और वे अभ्यास उसने बरसों किए। उससे थोड़ा फ़र्क़ पड़ा। अटकाव गया नहीं।
झारखंड की शिक्षक पात्रता परीक्षा उसने दो हज़ार चौबीस में पास की, और वह लिखित होती है।
उसके बाद चयन की प्रक्रिया में पंद्रह मिनट की एक कक्षा लेनी होती है। समिति बैठती है, बच्चे बुलाए जाते हैं, और आपको पढ़ाना होता है। यही उसका असली पर्चा था और यही उसके बस में नहीं था।
उसके पास सवा साल था।
उस सवा साल में उसने जो किया, उसकी शुरुआत एक बात मान लेने से हुई। अटकाव जाएगा नहीं। तो पढ़ाने का वह तरीक़ा निकालना है जो अटकाव के साथ चले।
वह अपनी बहन के घर रोज़ शाम जाता था। कल्पना के दो बच्चे थे, एक चौथी में और एक छठी में, और मुहल्ले के चार बच्चे और आ जाते थे। छह बच्चों की एक कक्षा उसे रोज़ मुफ़्त में मिलती थी।
उस पूरे अरसे में उसने कमाया कुछ नहीं। घर में इस पर बात हुई और उसके पिता ने एक बार यह भी कहा कि इतना पढ़ लिया, अब किसी दुकान पर बैठ जा, वहाँ बोलना नहीं पड़ता। यह उन्होंने ताना मारकर नहीं कहा था, उन्हें सचमुच यही ठीक लगता था, और इसके पीछे यह डर भी था कि बेटा हर बार वहीं जाकर हारेगा जहाँ बोलना पड़ता है।
पहला महीना ख़राब गया। वह बोलकर पढ़ाने की कोशिश करता रहा और बच्चे इंतज़ार करते रहे, और बच्चे इंतज़ार में हँसते नहीं हैं, बस बाहर देखने लगते हैं।
दूसरे महीने में उसने क्रम बदला।
उसने पहले पूरा सवाल बोर्ड पर लिखना शुरू किया। पूरा, एक भी शब्द बोलने से पहले। लिखने में उसे बीस-पच्चीस सेकंड लगते थे और उन बीस सेकंड में बच्चों के पास देखने के लिए कुछ होता था।
इससे दो चीज़ें हुईं। पहली, उसे बोलने के लिए बहुत कम बचता था, क्योंकि आधी बात लिखी हुई सामने थी। दूसरी, जो बोलना बचता था वह छोटा होता था, और छोटे वाक्यों में अटकाव कम आता है।
तीसरे महीने उसने एक और चीज़ जोड़ी। वह बच्चों से पढ़वाने लगा। सवाल कोई बच्चा पढ़ेगा, हल कोई बच्चा बोलेगा, और वह लिखेगा और रोकेगा और ठीक कराएगा।
यह चतुराई नहीं थी। बाद में किसी ने उसे यह भी बताया कि यह पढ़ाने का बेहतर तरीक़ा है और किताबों में इसी को अच्छा कहा जाता है। तब उसे मालूम नहीं था। वह इसलिए कर रहा था कि दूसरा रास्ता उसके पास नहीं था।
चयन की तारीख़ अप्रैल में आई। सत्र उन्हीं दिनों शुरू होता है।
कमरे में तीन लोग थे और छठी के अठारह बच्चे। विषय गणित, अध्याय बहुपद, पंद्रह मिनट।
पहला वाक्य उसने बोलना चाहा और उस पर अटक गया। पूरे छह सेकंड। कमरे में बैठे तीनों लोगों ने ऊपर देखा।
उसने बोलना छोड़ दिया और मुड़कर बोर्ड पर लिखना शुरू कर दिया।
उसने पूरा सवाल लिखा, नीचे दिया हुआ अलग लिखा, और पूछा हुआ अलग। फिर उसने चॉक नीचे रखा, एक लड़के की तरफ़ इशारा किया, और उसने कहा, पढ़ो।
यह अकेला शब्द था जिस पर उसे कभी अटकाव नहीं आता था, और यह उसने सवा साल में पता किया था।
उसके बाद के तेरह मिनट चले। लड़के ने पढ़ा, एक लड़की ने पहला चरण बोला, मुनीश ने लिखा और एक जगह रोका और पूछा कि क्या यह ठीक है, जिस पर दो बच्चों ने कहा नहीं। उसने वहीं मिटाया और दोबारा लिखा।
पंद्रह मिनट पर उसने घड़ी देखी और रुक गया।
समिति में बैठे एक आदमी ने कहा कि आपके उच्चारण में अवरोध है। उसने कहा कि है। उसने यह सफ़ाई के साथ नहीं कहा।
उसका चयन हो गया।
पर उसे जो स्कूल मिला वह ज़िले का सबसे दूर वाला था, चालीस किलोमीटर अंदर, जहाँ पिछले तीन बरस में दो मास्टर आए और दोनों तबादला करा गए। पर्चे पर यह लिखा नहीं गया कि उसे वह स्कूल क्यों मिला और लिखा जाता भी नहीं।
उसने वह ले लिया और जुलाई में वहाँ पहुँच गया।
प्रधानाध्यापक रघुनंदन थे, रिटायरमेंट से दो बरस दूर, और उन्होंने पहले हफ़्ते में सिर्फ़ इतना कहा कि आपके पीरियड में शोर नहीं होता, यह अच्छी बात है।
अंबेडकर जयंती पर हर स्कूल में भाषण होते हैं। अगले बरस चौदह अप्रैल को उसे बुलाया गया और उसने भाषण नहीं दिया। उसने बोर्ड पर तारीख़ें लिखीं, बच्चों से एक-एक वाक्य पढ़वाया, और आधे घंटे में सत्रह बच्चों ने बोला। उस दिन के बाद यह वहाँ हर बरस इसी तरह होता है।
मुनीश आज भी हकलाता है। कक्षा में वह पूरा सवाल पहले लिखता है और तब बोलता है, और अपने बाएँ हाथ में चॉक का एक टुकड़ा पूरे पीरियड पकड़े रहता है, तब भी जब लिख नहीं रहा होता, क्योंकि वह हाथ में हो तो किसी भी सेकंड बोर्ड की तरफ़ मुड़ा जा सकता है, और शाम तक उसकी बाईं हथेली सफ़ेद रहती है।