डॉक्टर ने उससे कहा कि मुँह खोलो और उसके बाद तीन सेकंड कुछ नहीं कहा।
जोगेंद्र रोहतक में सवारी टेंपो चलाता था। उम्र उन्तालीस, और गुटखा उसने उन्नीस की उम्र से खाया था।
दिन में कितने, यह उसने कभी गिना नहीं था। डॉक्टर ने पूछा तो उसने अंदाज़ा बताया, बारह-तेरह।
असल में सोलह थे। यह उसने बाद में गिना।
गाल के अंदर जो सफ़ेद निशान था, उसका नाम डॉक्टर ने बताया और साथ में यह भी बताया कि यह कैंसर नहीं है। यह उससे पहले वाली चीज़ है, और छोड़ने पर बहुत बार अपने आप चली जाती है।
छोड़ने पर।
यह बात उसे पहले भी दो बार कही गई थी। एक बार उसके ससुर ने, जो इसी से गए थे, और एक बार टेंपो स्टैंड के एक साथी ने।
इस बार जो अलग था, वह डर नहीं था। डर पहले भी था।
जो अलग था, वह यह था कि इस बार उसने यह जानने की कोशिश की कि वह उसे कब-कब खाता है।
यह उसे उसके भतीजे ने सुझाया, जो बारहवीं में था और जिसने कहीं पढ़ा था कि आदत चीज़ की नहीं होती, मौक़े की होती है।
उसने चार दिन बस यही किया। कुछ छोड़ा नहीं, सिर्फ़ यह देखा कि कब उठाता है।
छह मौक़े निकले। सिर्फ़ छह।
सुबह टेंपो निकालने से पहले। पहली सवारी उतारने के बाद। दोपहर के खाने के बाद। स्टैंड पर बैठे हुए, जब बात हो रही हो। लंबे जाम में। और रात को गाड़ी खड़ी करके।
छह में से चार मौक़ों पर साथ में कोई और होता था।
यह उस पूरे काम की सबसे बड़ी दिक़्क़त थी और दवा उसका जवाब नहीं है।
स्टैंड पर पंद्रह-बीस आदमी बैठते हैं और उनमें से बारह खाते हैं। पुड़िया एक निकालता है और तीन-चार को देता है। मना करने का मतलब है हर बार कुछ कहना, और हर बार कहने वाले पर मज़ाक़ होता है।
घर में इस पर बात नहीं हुई। उसकी पत्नी बीस बरस से कहती आई थी और वह बात इतनी बार हो चुकी थी कि उसका असर ख़त्म हो गया था। डॉक्टर के पास से लौटकर उसने उसे बताया नहीं। उसने अपने भतीजे को बताया, जो घर में सबसे छोटा था, और यही चीज़ काम आई, क्योंकि भतीजे ने उस पर तरस नहीं खाया, उसने उससे हिसाब पूछा।
पहली कोशिश उसने फरवरी में की और वह नौ दिन चली।
दसवें दिन उसने खा ली, स्टैंड पर, बात करते हुए, और उसे यह याद भी नहीं रहा कि उसने कब हाथ बढ़ाया।
दूसरी कोशिश अप्रैल में की और वह छब्बीस दिन चली।
इस बार जो टूटा, वह ऊब से टूटा। बैसाखी के बाद के दिनों में सवारी कम रहती है और स्टैंड पर बैठे रहना पड़ता है, और ख़ाली बैठे आदमी के हाथ को कुछ चाहिए होता है।
तीसरी कोशिश में उसने कुछ बदला।
उसने जेब में भुने चने रखने शुरू किए। बस इतना।
यह उतना छोटा उपाय है जितना लगता है और उसने वही काम किया जो चाहिए था। हाथ को कुछ मिल गया, मुँह को कुछ मिल गया, और स्टैंड पर वह देने वाला बन गया, लेने वाला नहीं। जब कोई पुड़िया आगे बढ़ाता, वह चने की मुट्ठी आगे बढ़ा देता।
इस पर मज़ाक़ हुआ, और तीन-चार हफ़्ते हुआ, और फिर बंद हो गया, क्योंकि मज़ाक़ में भी दम चाहिए होता है।
तीसरी कोशिश सात महीने चली और आठवें महीने में एक शादी में टूटी।
चौथी कोशिश उस बरस अक्टूबर में शुरू हुई और वही आख़िरी निकली। पूरा छूटने में चौबीस महीने लगे। दो बरस।
उन चौबीस महीनों में उसका वज़न पाँच किलो बढ़ा और वह अब भी बढ़ा हुआ है।
पैसे का हिसाब उसने एक बार लगाया था। सोलह पुड़िया, पाँच रुपए की एक, यानी अस्सी रुपए रोज़, यानी महीने का चौबीस सौ, यानी बीस बरस में लगभग पाँच लाख। यह गिनती उसने किसी को नहीं बताई, क्योंकि उसे यह ठीक नहीं लगा। जो बीत गया उसका हिसाब लगाने से कुछ मिलता नहीं है और नींद ख़राब होती है।
धब्बा डेढ़ बरस में छोटा हुआ। गया नहीं। डॉक्टर ने साल में एक बार दिखाने को कहा है और वह दिखाता है, हर बार जनवरी में।
एक बात जो उसने नहीं की, वह किसी को समझाना था। स्टैंड पर उसने कभी किसी से नहीं कहा कि तू भी छोड़ दे। उसे यह मालूम था कि बीस बरस पहले कोई उससे यह कहता तो वह भी नहीं सुनता।
स्टैंड पर अब पंद्रह में से दस खाते हैं। दो ने उसके बाद छोड़ी और उनमें से एक ने उसी चने वाली बात से छोड़ी, और यह उसने जोगेंद्र से पूछकर नहीं की, उसने देखकर की।
स्टैंड के बाहर जो दुकान है, वहाँ से जोगेंद्र बीस बरस पुड़िया लेता रहा। अब वह वहीं से चने लेता है, उसी वक़्त, सुबह टेंपो निकालने से पहले, और दुकान वाला उसे बिना पूछे दे देता है, और दोनों के बीच इस बदलाव पर आज तक कोई बात नहीं हुई।