ऑटो सत्रह महीने घर के बाहर खड़ा रहा और उसके दोनों पिछले टायर बैठ गए।
भगवानदास बिलासपुर में सवारी ऑटो चलाता था। सुबह सात से रात नौ, तिफ़रा से रेलवे स्टेशन और वापस, दिन में औसतन ग्यारह चक्कर। दो हज़ार तेईस के नवंबर में एक ट्रक ने उसे पीछे से मारा। ऑटो पलटा नहीं, बग़ल की नाली में उतर गया, और उसका दायाँ पैर घुटने के नीचे से दो जगह टूटा।
जोड़ा गया। छह महीने बाद वह चलने लगा। लाठी के सहारे।
पर उस पैर में जान आधी रह गई। ज़ोर लगाने पर वह जवाब नहीं देता था, और ऑटो का ब्रेक और एक्सिलरेटर उसी पैर से चलते हैं।
यह उन कामों में से है जिसमें आधा नहीं चलता। गाड़ी चलानी है तो पूरी चलानी है।
उन सत्रह महीनों में घर तीन चीज़ों से चला। बीमे का पैसा, जो उसे मिला और जो सत्रह महीने में ख़त्म हो गया। उसकी पत्नी की सिलाई, जो पहले शौक़ थी और अब आमदनी बन गई। और तीसरी चीज़ यह कि उसका बेटा दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़कर एक होटल में लग गया।
तीसरी चीज़ उसे सबसे भारी पड़ी।
उसे लोगों ने बहुत बार समझाया कि ऑटो बेच दो। एक बार ख़रीदार आ भी गया। भगवानदास ने कहा कि दो दिन में बताता हूँ और दो दिन बाद उसने मना कर दिया।
इसकी वजह ज़िद नहीं थी। वजह यह थी कि उसे और कोई काम आता नहीं था।
रास्ता उसे एक जगह से मिला जहाँ वह किसी और काम से गया था। पैर के इलाज का एक काग़ज़ बनवाने के लिए वह ज़िला अस्पताल गया और वहाँ बरामदे में एक आदमी बैठा था जिसकी अपनी गाड़ी में हाथ का लीवर लगा था।
यह चीज़ नई नहीं है। दिव्यांग चालकों के लिए गाड़ियों में हाथ से चलने वाले नियंत्रण लगाए जाते हैं और इसकी क़ानूनी इजाज़त है। ऑटो में यह कम होता है, क्योंकि ऑटो का ढाँचा छोटा होता है।
उस आदमी ने उसे दो बातें बताईं। पहली, लीवर लगवाना पड़ेगा और वह किसी अच्छे वेल्डर से ही करवाना। दूसरी, उसके बाद लाइसेंस पर नई श्रेणी चढ़वानी पड़ेगी, वरना गाड़ी पकड़ी जाएगी।
दूसरी बात ज़्यादा मुश्किल थी।
लाइसेंस पर संशोधन के लिए दिव्यांगता का प्रमाण पत्र चाहिए, और उसके लिए मेडिकल बोर्ड बैठता है, और वह महीने में एक बार बैठता है। पहली बार वह गया तो नंबर नहीं आया, क्योंकि उस दिन सैंतालीस लोग थे और बोर्ड ने तीस देखे।
दूसरे महीने उसका नंबर आया। प्रमाण पत्र बना, बासठ फ़ीसदी।
अब गाड़ी की बारी थी। लीवर लगाने वाला वेल्डर उसे तिफ़रा में ही मिल गया, पर पहले जो बनाया गया वह काम नहीं आया।
पहला लीवर ऐसा था कि उससे एक्सिलरेटर चलता था और ब्रेक नहीं। यानी वह चला सकता था और रोक नहीं सकता था। यह उसे तीसरे दिन समझ आया, ख़ाली मैदान में, और उस दिन वह बहुत डरा।
दूसरी बार वेल्डर के साथ बैठकर उसने ख़ुद बताया कि उसे क्या चाहिए। एक ही लीवर, दो तरफ़ चलने वाला। आगे धकेलो तो गति, अपनी तरफ़ खींचो तो ब्रेक। इसमें अठारह सौ रुपए और लगे और चार दिन लगे।
उसके बाद ढाई महीने अभ्यास चला।
इसमें देखने लायक़ कुछ नहीं था। रोज़ सुबह वह तिफ़रा के उस मैदान में जाता था जहाँ शाम को बच्चे क्रिकेट खेलते हैं, और सुबह वह ख़ाली रहता है। पहले हफ़्ते उसने सिर्फ़ रोकना सीखा। बाईं तरफ़ मुड़ने में उसे दिक़्क़त नहीं थी और दाईं तरफ़ मुड़ते वक़्त हाथ का काम बढ़ जाता है, इसलिए उसने वह अलग से किया।
फिर एक चीज़ बची, जिसका उसने पहले सोचा नहीं था।
सवारी।
अभ्यास ख़ाली ऑटो का था। भरे ऑटो का वज़न अलग होता है और ढलान पर वह अलग तरह से खिंचता है। यह उसने अपनी पत्नी और बेटे को पीछे बिठाकर सीखा, और फिर तीन बोरी रेत रखकर, क्योंकि रेत हिलती नहीं।
इस पूरे अरसे का ख़र्च उसने गिना नहीं, पर मोटा-मोटा जोड़ने पर लीवर, प्रमाण पत्र, लाइसेंस का संशोधन और दोनों नए टायर मिलाकर नौ हज़ार के आसपास बैठता है, और वह पैसा उसकी पत्नी की सिलाई से निकला।
लाइसेंस पर श्रेणी अगस्त में चढ़ी। उसमें आरटीओ में एक बार फ़िटनेस जाँच हुई, जिसमें उसे मैदान में गाड़ी चलाकर दिखानी पड़ी, और वह उसने बीस मिनट में निपटा दी।
वह सड़क पर सितंबर में उतरा। सत्रह महीने बाद।
पहले दो महीने उसकी कमाई पुरानी कमाई की आधी रही। दिन में ग्यारह चक्कर की जगह छह होते थे, क्योंकि वह धीरे चलाता था और चौराहों पर ज़्यादा रुकता था।
आज वह नौ चक्कर लगाता है। ग्यारह अब भी नहीं होते।
उसका बेटा होटल से लौटकर दोबारा पढ़ने नहीं गया, और यह उन सत्रह महीनों का वह हिसाब है जो बराबर नहीं हुआ और अब होगा भी नहीं।
लीवर हैंडल के दाईं तरफ़ वेल्ड किया हुआ है और उस पर काली रबर चढ़ी है, जो साइकिल के हैंडल की रबर है। सवारियाँ उस पर ध्यान नहीं देती हैं। जो देती हैं वे कुछ पूछती नहीं, और भगवानदास बताता भी नहीं, क्योंकि उन्हें स्टेशन तक जाना होता है और इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है।