सीढ़ियाँ चार थीं और हर सीढ़ी छह इंच की।

चंदेश्वर को बचपन में पोलियो हुआ था और दोनों पैर घुटने से नीचे काम नहीं करते। वह हाथ से चलने वाली तिपहिया कुर्सी इस्तेमाल करता है, जिसके आगे एक चेन और हैंडल लगा होता है।

बेगूसराय में उसकी फ़ोटोस्टेट और लेमिनेशन की दुकान है, बाज़ार के उस हिस्से में जहाँ कचहरी के काम वाले लोग आते हैं। दुकान का फ़र्श सड़क के बराबर है, यह उसने किराए पर लेते वक़्त देखा था।

बैंक उसे हर महीने जाना पड़ता था।

इसकी वजह उसका खाता नहीं था। खाते का काम फ़ोन से हो जाता है। वजह यह थी कि वह दुकान के लिए जो पैसा जमा करता था, वह नक़द होता था, रोज़ के तीन-चार सौ रुपए के छोटे-छोटे नोट, और नक़द जमा करने के लिए आदमी को अंदर जाना पड़ता है।

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उस शाखा में चार सीढ़ियाँ थीं और ढलान नहीं थी।

पहले वह नीचे रुकता था और किसी को आवाज़ देता था। कोई आदमी नीचे आता था, पैसा और परची ले जाता था, और रसीद लेकर लौट आता था।

यह चार बरस चला। पूरे चार बरस।

इसमें दो चीज़ें ग़लत हुईं। एक बार पंद्रह सौ का फ़र्क़ आया और वह फ़र्क़ किसी बेईमानी से नहीं आया, गिनती में आया, और उसका कोई सबूत नहीं था। दूसरी बार एक आदमी परची ग़लत खिड़की पर दे आया और पैसा दस दिन अटका रहा।

इसके बाद उसने लिखकर देना शुरू किया।

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पहला आवेदन उसने शाखा प्रबंधक को दिया, जिसमें उसने लिखा कि प्रवेश पर ढलान बनवाई जाए।

जवाब में उसे यह बताया गया कि इमारत बैंक की नहीं है, किराए की है, और उसमें फेरबदल के लिए मकान मालिक की इजाज़त चाहिए। यह सही बात थी और टालने के लिए नहीं कही गई थी।

मकान मालिक उसी शहर में था। दो गली छोड़कर। चंदेश्वर उससे मिलने गया और उसने कहा कि सीमेंट का ढाल बनेगा तो मेरी सीढ़ी और चौखट पर असर आएगा, और बैंक कल उठकर चला जाएगा और वह ढाल मेरे यहाँ रह जाएगा।

यह भी टालना नहीं था। यह उसका डर था।

चंदेश्वर ने इस पर बहस नहीं की और अदालत की बात भी नहीं की। उसने लोहे की उतारने-चढ़ाने वाली ढलान का पता किया, जो फ़र्श पर पेंच से लगती है और ज़रूरत पड़ने पर उखाड़ी जा सकती है।

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उसका दाम सोलह हज़ार था।

उसने वह अपने पैसे से लगाने की पेशकश की, लिखकर, और उसमें यह भी लिख दिया कि बैंक जाने पर वह उसे अपने ख़र्च पर उखड़वा लेगा।

इस पर बैंक ने कहा कि ग्राहक के पैसे से बैंक के परिसर में कोई निर्माण नहीं हो सकता।

यह भी नियम था। और यह भी सही था।

इस तरह डेढ़ बरस निकला और उसमें उसने चार आवेदन दिए। इनमें उसने ग़ुस्सा नहीं दिखाया, और यह उसकी सज्जनता नहीं थी, यह उसका हिसाब था। ग़ुस्से वाली चिट्ठी को दफ़्तर एक तरह से देखता है और सादी चिट्ठी को दूसरी तरह से।

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इस बीच बरसात के दो मौसम निकल गए। जुलाई में उस सीढ़ी पर काई जम जाती है और नीचे खड़े होकर आवाज़ देना और मुश्किल हो जाता है, क्योंकि बारिश में कोई बाहर आना नहीं चाहता। एक दिन वह चालीस मिनट भीगता रहा और उसके बाद उस महीने का पैसा उसने जमा ही नहीं किया, उसे दुकान की तिजोरी में रख लिया।

रास्ता आख़िर में उस जगह से निकला जिसका उसने सोचा नहीं था।

बैंकों के लिए एक शिकायत अधिकारी होता है और उसके ऊपर लोकपाल, और उनके पास शिकायत ऑनलाइन जाती है। उसने वहाँ शिकायत की और उसमें उसने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम का ज़िक्र किया, जिसमें सेवा देने वाली जगहों की पहुँच की बात है। वह धारा उसे उसकी दुकान पर आने वाले एक मुनीम ने बताई थी।

उस शिकायत के बाद शाखा से कोई नाराज़ नहीं हुआ। प्रबंधक ने उसे बुलाकर यह कहा कि आपने ठीक किया, अब हमारे पास काग़ज़ है।

नीचे बैठे आदमी को ऊपर से आया काग़ज़ चाहिए होता है, वरना वह अपने ख़र्च का हिसाब नहीं दे सकता। यह उसने डेढ़ बरस में समझा।

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ढलान बनी। लोहे की। उखड़ने वाली। ठीक वैसी जैसी उसने डेढ़ बरस पहले बताई थी।

लगने में उसके बाद भी चार महीने लगे, क्योंकि नाप लेने वाला आदमी दो बार नहीं आया।

कुल दो बरस और एक महीना लगा।

उन दो बरसों का ख़र्च उसने कभी नहीं जोड़ा, क्योंकि उसमें पैसा लगा ही नहीं। जो लगा वह वक़्त था, और उसका हिसाब यह है कि दुकान उसने उन दो बरसों में सत्रह दिन बंद रखी।

अब उस ढलान का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल चंदेश्वर नहीं करता। वह महीने में तीन-चार बार जाता है। जो रोज़ जाते हैं, वे बुज़ुर्ग हैं, जो पेंशन के दिनों में लाइन में लगते हैं और जिनके लिए छह इंच की सीढ़ी अपनी तरह की दिक़्क़त है, और एक आदमी है जो पानी की बोतलों की गाड़ी अंदर तक ले जाता है, जो पहले नहीं ले जा सकता था।