नई नाली बनने के बाद पानी पहले से ज़्यादा भरने लगा।
धनबाद के उस मुहल्ले में बरसात में पानी भरना पुरानी बात थी। जुलाई में दो-तीन बार, हर बार डेढ़ से दो फ़ुट, और दो-तीन दिन में उतर जाता था।
दो हज़ार तेईस में वहाँ नई पक्की नाली बनी। लंबाई तीन सौ मीटर, दोनों तरफ़, और उस पर लगभग नौ लाख का काम हुआ।
उसके बाद वाली बरसात में पानी तीन फ़ुट भरा और सात दिन खड़ा रहा।
मुहल्ले ने इसे शुरू में क़िस्मत माना। उस बरस बारिश ज़्यादा हुई थी, यह सच भी था।
अगले बरस वही हुआ। फिर सात दिन।
नरसिंह उसी मुहल्ले में रहता था और कोलियरी में फ़िटर था, यानी मशीन का काम करने वाला। उसकी पढ़ाई आईटीआई तक थी।
उसने एक चीज़ देखी जो कई लोगों ने देखी होगी और जिस पर किसी ने काम नहीं किया। पानी नाली में जा रहा था और नाली में ही खड़ा रह जाता था।
यानी नाली बह नहीं रही थी। बिल्कुल नहीं।
नाली का काम बहना है और बहने के लिए ढाल चाहिए। तीन सौ मीटर में अगर आधा मीटर का भी ढाल हो तो पानी चला जाता है। ढाल न हो तो नाली एक लंबा गड्ढा है।
यह उसे मालूम था, क्योंकि मशीन में तेल और पानी की लाइनें इसी हिसाब से लगाई जाती हैं।
साबित करना अलग बात थी। और वही असली काम था।
नाप के लिए जो औज़ार होते हैं, वे उसके पास नहीं थे और किराए पर लेने का पता उसे नहीं था। उसने जो किया, वह कोलियरी में सीखा हुआ पुराना तरीक़ा है।
उसने बाज़ार से पारदर्शी प्लास्टिक का पाइप लिया, बारह मीटर, अठारह रुपए मीटर।
इस पाइप में पानी भर दो और दोनों सिरे उठाकर पकड़ो, तो दोनों तरफ़ का पानी बराबर ऊँचाई पर आ जाता है। यह अपने आप होता है और इसमें कोई मशीन नहीं लगती।
इसी से ढाल नापी जाती है। एक सिरा एक जगह रखो, दूसरा बारह मीटर आगे, और दोनों जगह पानी के तल का फ़र्क़ देख लो।
उसने तीन सौ मीटर की नाली पंद्रह टुकड़ों में नापी।
इसमें उसे तीन रविवार लगे और दूसरे रविवार को मुहल्ले के दो लड़के साथ आ गए, क्योंकि पाइप पकड़ने के लिए दो आदमी चाहिए।
नतीजा साफ़ था। और उलटा था।
नाली का ढाल उस तरफ़ था जिस तरफ़ ऊँचाई थी। यानी पानी को उस तरफ़ जाना था जिस तरफ़ चढ़ाई थी, और तीन सौ मीटर में यह फ़र्क़ इकतीस सेंटीमीटर का था।
इसकी वजह बेईमानी नहीं थी। नाली सड़क के किनारे-किनारे बनी थी और सड़क का अपना ढाल है, और बनाने वाले ने नाली को सड़क के बराबर रखा, यह मानकर कि सड़क का ढाल ठीक होगा। सड़क का ढाल दूसरी तरफ़ था, क्योंकि सड़क आगे मुड़ती है।
यह चीज़ काग़ज़ पर नहीं पकड़ी जाती। ज़मीन पर नापने से पकड़ी जाती है।
पाइप वाले तरीक़े की एक कमज़ोरी है और उसे उसने ख़ुद पकड़ा। बारह मीटर के टुकड़ों में नापने पर हर जोड़ पर थोड़ी ग़लती आती है और पंद्रह टुकड़ों में वह जुड़ जाती है। इसलिए उसने पूरी नाली दो बार नापी, एक बार एक सिरे से और एक बार दूसरे सिरे से, और दोनों बार का फ़र्क़ तीन सेंटीमीटर के अंदर रहा।
उसने वह नाप एक काग़ज़ पर लिखी, पंद्रह जगहों के आँकड़े, और उसके साथ एक सादा नक़्शा बनाया।
पहली बार वह वार्ड पार्षद के पास गया और उसने काग़ज़ दिखाया। पार्षद ने ध्यान से देखा और कहा कि यह ठीक लगता है, पर अब बनी हुई नाली तोड़ी नहीं जाएगी।
यह टालना नहीं था। नौ लाख का काम अभी नया था और उसे तोड़ने का मतलब किसी की ज़िम्मेदारी तय होना है।
यहीं नरसिंह ने वह किया जो इस पूरे मामले को आगे बढ़ाया।
उसने पूरी नाली तोड़ने की माँग नहीं की। उसने सिर्फ़ यह माँगा कि एक सौ बीस मीटर के एक हिस्से का फ़र्श तोड़कर दोबारा ढाल के साथ डाला जाए, जिससे पानी उस मोड़ तक पहुँच जाए जहाँ से आगे का ढाल ठीक है।
उसने उसका अंदाज़ा भी दे दिया, और वह डेढ़ लाख के आसपास था।
छोटी माँग पर काम हो जाता है।
काम अगले बरस फरवरी में हुआ। बरसात से पहले।
उस बरस जुलाई में पानी भरा, दस इंच, और उसी शाम उतर गया। रात तक गली सूखी थी।
पूरा हल नहीं हुआ है। दो जगह अब भी पानी रुकता है और उनका कारण नाली नहीं, दो घरों के आगे बना ढाल है, जिसे तोड़ने की बात करने पर झगड़ा होता है और नरसिंह ने वह बात नहीं की।
जुलाई की रातों में पहले वह उठकर बाहर देखता था, दो-तीन बार। अपनी माँ को भी उठा देता था, ताकि सामान ऊपर रखा जा सके। पिछली दो बरसातों में उसने ऐसा एक बार नहीं किया, और यह उसे उस साल अक्टूबर में समझ आया, जब किसी ने पूछा कि इस बार पानी कब भरा था और उसे तारीख़ याद नहीं आई।