आग रात के तीन बजे लगी और सुबह छह बजे तक कुछ नहीं बचा था।

कानपुर के उस मुहल्ले में इसरार की रज़ाई-गद्दे की दुकान थी और पीछे कारखाना था। दुकान में तैयार माल, कारखाने में धुनने की मशीन, कच्ची रुई की गाँठें, और सिलाई की चार मशीनें।

रुई जलती नहीं है, वह भड़कती है। बंद कमरे में रखी गाँठ में आग लगे तो वह धुएँ के साथ फैलती है और पानी उस पर ऊपर से गिरकर बेकार जाता है, क्योंकि अंदर की रुई सूखी रहती है।

दमकल पौने चार पर आ गई थी। उसका कोई क़सूर नहीं था।

नुक़सान का हिसाब बीमा वाले ने चार लाख अस्सी हज़ार लगाया। इसरार का अपना अंदाज़ा छह लाख से ऊपर का था।

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बीमा उसका था ही नहीं। यह भी बता देना चाहिए, क्योंकि आगे की बात इसी से जुड़ी है।

आग बिजली के उस तार से लगी थी जो कारखाने की छत के नीचे से गुज़रता था।

उस तार के बारे में उसे दो बरस पहले बताया गया था।

बताने वाला बिजली का मिस्तरी था, जो पंखा ठीक करने आया था और जिसने ऊपर देखकर कहा था कि यह तार बदलवा लो, इसका ऊपरी ग़िलाफ़ जगह-जगह से फट गया है, और नीचे रुई है। उसने ख़र्च भी बताया था। चार हज़ार दो सौ।

इसरार ने उस वक़्त कहा था कि सीज़न के बाद करा लेंगे।

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सीज़न रज़ाई का होता है, यानी अक्टूबर से जनवरी। उसके बाद फरवरी में उसे कुछ और याद रहा और मार्च में कुछ और, और दो बरस निकल गए।

यह वह हिस्सा है जिसे लोग किसी को नहीं बताते।

इसरार ने बताया।

आग के तीसरे दिन मुहल्ले के लोग बैठे थे और कोई कह रहा था कि पुराना इलाक़ा है, तार सब जगह ख़राब हैं, बिजली विभाग की ग़लती है। यह बात आगे बढ़ती और उस पर कहीं शिकायत भी हो जाती, क्योंकि उस गली में और भी लोगों का यही हाल था।

इसरार ने वहीं कह दिया कि तार का मुझे मालूम था।

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उसने पूरी बात कही। मिस्तरी का नाम, चार हज़ार दो सौ की रक़म, और दो बरस।

इसका सीधा नुक़सान हुआ। मुहल्ले की सहानुभूति उसी दिन आधी हो गई। जो लोग चंदा जमा करने की बात कर रहे थे, उनमें से दो पीछे हट गए, और किसी ने यह भी कहा कि जब मालूम था तो अब रो क्यों रहा है।

फ़ायदा एक हुआ, और वह उस वक़्त किसी को दिखा नहीं।

रुई के थोक वाले ने उसे उधार दे दिया।

वह आदमी उसी बैठक में मौजूद था। उसने बाद में इसरार से इतना कहा कि जिसने अपना क़सूर सामने रख दिया, वह हिसाब में भी सीधा रहेगा। यह कोई बड़ा दर्शन नहीं है, यह उस बाज़ार का काम करने का तरीक़ा है।

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उधार तीन लाख का मिला, आठ महीने में लौटाने पर।

बीमा न होने की वजह भी वही थी जो तार की थी। एजेंट दो बार आया और दोनों दफ़े उसे यही लगा कि इस बरस नहीं, अगले बरस।

उस बीच घर कैसे चला, यह अलग हिसाब है। इसरार के दो बेटे थे, बड़ा उन्नीस का और छोटा चौदह का। बड़ा उन पाँच महीनों में एक कपड़े की दुकान पर लग गया, आठ हज़ार महीने पर, और वहीं रह गया। कारखाना दोबारा चलने के बाद भी वह वापस नहीं आया, क्योंकि उसे वह काम पसंद आ गया था, और इसरार ने उसे रोका भी नहीं।

दुकान दोबारा खुलने में पाँच महीने लगे। पहले मलबा हटा, फिर छत डली, और उसमें रमज़ान और ईद के दिन बीच में आ गए, जिनमें मज़दूर नहीं मिलते।

मशीनें उसने पुरानी ख़रीदीं। धुनने की मशीन उन्नाव से आई और सिलाई की तीन मशीनें उसी शहर से।

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काम शुरू हुआ तो पहला सीज़न आधा गया, क्योंकि दुकान अक्टूबर के बीच में खुली और तब तक आधे पुराने ग्राहक कहीं और से बनवा चुके थे।

उधार आठ महीने में नहीं लौटा। तेरह महीने लगे। थोक वाले ने इस पर कुछ कहा नहीं और ब्याज भी नहीं जोड़ा, और इसरार ने आख़िरी क़िस्त के साथ उससे यह पूछा भी नहीं कि जोड़ा या नहीं।

अब वहाँ जो चीज़ नई है, उसे कोई ग्राहक नहीं देखता।

दुकान और कारखाने के बीच अब एक पक्की दीवार है, नौ इंच की, छत तक। पहले वहाँ लकड़ी का पल्ला था, जिससे माल आगे-पीछे करने में आसानी होती थी।

उस दीवार की वजह से अब हर गद्दा और हर रज़ाई दुकान में बाहर के दरवाज़े से लाई जाती है, यानी गली से घूमकर, और इसमें रोज़ का बीस-पच्चीस मिनट ज़्यादा लगता है।

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बिजली का काम उसने सबसे पहले कराया, छत डलने के अगले हफ़्ते, और उसमें ग्यारह हज़ार लगे, क्योंकि इस बार उसने पूरे कारखाने की वायरिंग नई कराई।

मिस्तरी वही था।

वह आदमी अब भी उसी मुहल्ले में काम करता है और साल में दो-तीन बार दुकान पर आ जाता है। इसरार उसे चाय पिलाता है और उसके सामने वह बात कभी नहीं निकालता, और मिस्तरी भी नहीं निकालता, और दोनों को मालूम है कि दोनों को याद है।