दुकान का शटर चार बरस से नहीं उठा था और नीचे से उसे उठाने में उस दिन दोनों हाथ लगे।

अंदर साइकिल के पुर्ज़े थे। तीलियाँ, चेन, ब्रेक शू, पैडल, और तीन पहिए जिनकी रिम पर जंग बैठ चुकी थी। सिकंदर के बाप की दुकान थी और तेईस बरस चली थी और बाईस के अगस्त में बंद हो गई, क्योंकि वे बीमार पड़े और क्योंकि साइकिलें कम हो गई थीं।

मुज़फ़्फ़रपुर की उस सड़क पर उन चार बरसों में जो बढ़ा, वह ई-रिक्शा था।

गिनती किसी ने रखी नहीं, पर उस चौक से रोज़ गुज़रने वाले को दिख जाता था। सुबह की सवारी अब साइकिल पर नहीं, ई-रिक्शा पर जाती थी।

हर ई-रिक्शा में चार बैटरियाँ लगती हैं। उनकी उम्र डेढ़ से दो बरस होती है और गरमी में कम होती है। नई चारों का सेट अट्ठाईस से बत्तीस हज़ार का पड़ता है, जो उस काम में लगे आदमी की तीन महीने की कमाई है।

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और उस पूरे इलाक़े में उन्हें खोलकर देखने वाला कोई नहीं था। ख़राब होने पर एक ही रास्ता था। नई ले लो।

सिकंदर छब्बीस का था। उसने आईटीआई नहीं की थी, कोई डिप्लोमा नहीं था, और बारहवीं दूसरी बार में निकली थी।

जो उसके पास था, वह बचपन था। तेईस बरस की उस दुकान में वह बाप के पास बैठा रहा था और उसे हाथ से चीज़ें खोलना आता था।

उसने बैटरी का काम एक तरीक़े से सीखा जो किसी को बताने लायक़ नहीं लगता। उसने मरी हुई बैटरियाँ जमा कीं।

कबाड़ी उन्हें बत्तीस रुपए किलो लेता था। सिकंदर ने उससे कहकर चार सेट रख लिए, यानी सोलह बैटरियाँ, जिनका कोई मोल नहीं था क्योंकि वे मर चुकी थीं।

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उन सोलह को उसने आठ महीने में खोला।

इसमें उसका हाथ दो जगह जला और एक कमीज़ ख़त्म हुई, क्योंकि तेज़ाब कपड़े पर गिरे तो कपड़ा वहीं ख़त्म होता है। तीन महीने बाद उसने दस्ताने और चश्मा ख़रीदा, जिसका ग्यारह सौ लगा, और यह उसे पहले महीने में ख़रीद लेना चाहिए था।

फ़ोन पर देखकर सीखा। दुकान पर बिजली का कनेक्शन चालू कराया और एक पुराना चार्जर लिया।

पैसे का इंतज़ाम इस तरह हुआ। उसकी माँ के पास चाँदी की एक पायल थी। पायल बिकी। उससे सात हज़ार आए, और बाक़ी उसने साइकिल के वे पुराने पुर्ज़े बेचकर जुटाए जो दुकान में पड़े थे और जिनका उस बाज़ार में अब कोई ख़रीदार नहीं था, इसलिए वे कबाड़ के भाव गए। कुल जमा चौदह हज़ार।

आठ महीने में उसे तीन चीज़ें समझ आईं। पहली, हर मरी बैटरी एक ही वजह से नहीं मरती। दूसरी, चार में से अक्सर एक ख़राब होती है और बाक़ी तीन ठीक होती हैं, और लोग चारों बदल देते हैं। तीसरी, जो प्लेट गल चुकी है वह किसी तरीक़े से वापस नहीं आती।

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यह तीसरी बात उसकी दुकान की जड़ बन गई।

बैसाखी के आसपास उसने शटर उठाया। पुराना बोर्ड उसने उतारा नहीं, उसके नीचे एक टीन की पट्टी और लगा दी।

पहले ग्यारह दिन कोई नहीं आया।

बारहवें दिन एक चालक आया, जिसका नाम मालूम नहीं, और उसने चारों बैटरियाँ उतरवाकर रख दीं और कहा कि देख लो।

सिकंदर ने चारों जाँची। तीन में जान थी और चौथी की एक प्लेट गल चुकी थी।

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उसने चालक से कहा कि यह चौथी नहीं बनेगी, इसमें पैसा मत लगाओ, और बाक़ी तीन में कुछ ख़राबी नहीं है, इन्हें छह-आठ महीने और चलना चाहिए।

चालक ने पूछा कि तो मैं क्या करूँ। उसने कहा कि एक बैटरी नई लो, तीन ये रखो।

यह उस चालक के लिए अट्ठाईस हज़ार की जगह सात हज़ार का ख़र्च था।

उसने कोई पैसा नहीं लिया, क्योंकि बनाया कुछ नहीं था। यह उसने चतुराई में नहीं किया। उस वक़्त उसे यह सूझा भी नहीं था कि इसका कोई फ़ायदा होगा।

फ़ायदा हुआ, और ठीक इसी बात से हुआ। ई-रिक्शा वाले दिन भर सड़क पर एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं और बात एक ही चीज़ की करते हैं, ख़र्च की। तीन हफ़्ते में उसके पास सात लोग आ चुके थे।

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छठे महीने में उसने एक बैटरी ऐसी बनाई जो पंद्रह दिन चलकर बैठ गई। वह ग्राहक दुकान पर आकर चिल्लाया और सड़क पर चार लोग खड़े हो गए। सिकंदर ने पैसे लौटा दिए। पूरे तीन सौ बीस रुपए। उसी दिन उसने यह नियम बना लिया कि जिस बैटरी पर उसे ख़ुद शक हो, उस पर हाथ नहीं लगाएगा, चाहे ग्राहक कहता रहे।

पहले बरस में उसने चौवन बैटरियों पर काम किया। उनमें से इकतीस उसने बनाई, तेरह में उसने साफ़ मना कर दिया, और दस में उसने चालक से कहा कि इसे और चार महीने चलाओ, तब लाओ।

जो मना किए गए तेरह थे, उन्हीं से बात फैली।

दुकान अब चलती है। बाप उसी दुकान में शाम को कुर्सी डालकर बैठते हैं, बोल नहीं पाते, और आने वालों को देखते रहते हैं।

उस पहली चौथी बैटरी को सिकंदर ने वापस नहीं दिया। चालक ने कहा था कि कबाड़ में डाल दो, और उसने वह अंदर वाले खाने के ऊपर रख दी, जहाँ वह अब भी रखी है, गली हुई प्लेट के साथ, और नए ग्राहक जब बहस करते हैं कि एक बार कोशिश तो कर लो, तब वह उतारकर उन्हें दिखाई जाती है।