पहले बरस उसकी सात पेटियों की रानियाँ मर गईं और तीन बचीं।
दलेल सत्तावन का था। कुरुक्षेत्र के उस गाँव में उसकी अपनी ज़मीन डेढ़ एकड़ थी, जो कुछ नहीं होती, और वह दस बरस से पाँच एकड़ बटाई पर लेता था।
बटाई उसी बरस छूटी, क्योंकि ज़मीन के मालिक के बेटे बाहर से लौट आए और उन्होंने ख़ुद ट्रैक्टर ले लिया।
इस उम्र में मज़दूरी पर जाना उस गाँव में मुश्किल है और अनहोनी भी नहीं है। दलेल ने दो महीने वही किया, धान की रोपनी में, और उसके बाद उसकी कमर ने जवाब दे दिया।
मधुमक्खी की बात उसे कृषि विज्ञान केंद्र में मालूम हुई। वह वहाँ किसी और काम से गया था। मई की गरमी थी और वह छाँव में बैठा था, और बग़ल वाले बरामदे में यही बात चल रही थी।
वहाँ पाँच दिन का एक प्रशिक्षण था और उसमें उसने भाग लिया। उसकी उम्र वहाँ सबसे ज़्यादा थी और बाक़ी अठारह लोग तीस के नीचे थे।
यह काम इस इलाक़े के लिए बनाया हुआ लगता है। सरसों अक्टूबर में बोई जाती है और दिसंबर से फूल आते हैं, और सरसों के फूल में शहद बहुत होता है। उसके बाद फरवरी में बरसीम, और मार्च में सफ़ेदा और शीशम, और अप्रैल-मई में सूरजमुखी। साल में तीन-चार बार पेटियाँ जगह बदलती हैं और उन्हें ट्रक पर रखकर ले जाया जाता है।
दस पेटियों से शुरू करने का ख़र्च उस बरस अड़तालीस हज़ार का था। पेटी, रानी, औज़ार, और चीनी।
पैसा उसने दो जगह से जोड़ा। बीस हज़ार उसके पास थे और अट्ठाईस उसने अपनी बहन से लिए, जो उसी ज़िले में थी।
फिर पहला बरस आया। वह ख़राब गया।
सात रानियाँ मरीं। पेटियाँ ख़ाली हो गईं। इसमें उसकी लापरवाही नहीं थी और यह सिर्फ़ बदक़िस्मती भी नहीं थी। बात इतनी थी कि उसे यह पता ही नहीं था कि पेटी में एक बीमारी लगती है जिसे वरोआ कहते हैं, और वह मक्खी के शरीर पर एक छोटा कीड़ा है जिसे देखने के लिए ध्यान से देखना पड़ता है।
प्रशिक्षण में यह बताया गया था। उसने सुना भी था। पाँच दिन में बताई गई तीस चीज़ों में से यह एक थी और उसे यह याद नहीं रहा।
यह सीखने का अपना तरीक़ा है और इसकी क़ीमत उस बरस चौंतीस हज़ार बैठी।
दूसरे बरस उसने तीन पेटियों से दोबारा शुरू किया और पेटियाँ नहीं ख़रीदीं, क्योंकि पैसा नहीं था।
तीन से उसने अपने आप बढ़ाईं। मधुमक्खी का छत्ता बड़ा होने पर उसे बाँटा जा सकता है और नई रानी दी जा सकती है, और यह काम आदमी अपने हाथ से करता है। दूसरे बरस के आख़िर में उसकी नौ पेटियाँ थीं। तीसरे बरस के आख़िर में इक्कीस। पैसा तब भी नहीं बचा।
इसमें उसे एक चीज़ बहुत काम आई, जो उसकी उम्र थी।
मधुमक्खी के साथ काम करने में जल्दबाज़ी सबसे बड़ी ग़लती है। पेटी खोलने में हाथ धीरे चलाना पड़ता है और मक्खियों को अपने आप हटने का वक़्त देना पड़ता है। प्रशिक्षण में उसके साथ के जो लड़के थे, उनमें से चार ने पहले बरस में यह काम छोड़ दिया, और तीन ने इसलिए छोड़ा कि उन्हें बहुत डंक लगे।
दलेल को भी लगे। पहले बरस में सैकड़ों। उसने गिने नहीं। उसकी बाईं कलाई पर उसका असर अब भी दिखता है, जहाँ चमड़ी का रंग बदल गया है।
उसने दस्ताने और जाली वाली टोपी दूसरे बरस ख़रीदी, पहले बरस नहीं, और यह उसकी बचत नहीं थी, यह मूर्खता थी।
शहद निकालने की मशीन उसके पास आज भी नहीं है। वह किराए पर लेता है, दिन का दो सौ, और साल में उसे छह-सात दिन चाहिए होते हैं।
बेचने का सवाल पहले बरस में ही आ गया था और उसका जवाब उसे तीसरे बरस मिला।
पहले दो बरस उसने पूरा शहद एक बड़े ख़रीदार को दिया, जो सौ रुपए किलो देता था और गाड़ी लेकर आता था। तीसरे बरस उसने आधा शहद बोतलों में भरकर बेचना शुरू किया, कुरुक्षेत्र में, दो दुकानों पर और मेले के दिनों में ख़ुद बैठकर। उसमें उसे दो सौ बीस मिलता है।
आधा वह अब भी थोक में देता है, क्योंकि बोतल में सब नहीं बिकता और शहद रखा रहे तो जम जाता है।
आज उसकी छत्तीस पेटियाँ हैं। इक्कीस से छत्तीस तक पहुँचने में चार बरस लगे और यह बढ़ना धीमा है, और इसकी वजह यह है कि वह अपनी बहन का पैसा लौटाता रहा।
वह अट्ठाईस हज़ार पाँचवें बरस में पूरा हुआ। उसने किश्तों में दिया। बहन ने कभी माँगा नहीं।
जिस चीज़ पर वह अब सबसे ज़्यादा वक़्त देता है, वह शहद नहीं है। वह रानियाँ बनाना है, जो एक अलग हुनर है और जिसमें उसे अब भी हर बार डर लगता है।
पहले बरस की उन सात मरी पेटियों की लकड़ी उसने फेंकी नहीं। दो को उसने जला दिया, क्योंकि बीमारी वाली लकड़ी जलानी पड़ती है। पाँच धूप में डालकर, माँजकर, दोबारा काम में लाई गईं, और वे पाँच आज भी उसके छत्तीस में हैं, और उन पर बाहर की तरफ़ पहले बरस का लिखा नंबर अब भी पढ़ा जा सकता है।