बैंक में बेटे से कहा गया कि आपके पिता का नाम सूची में है।

बाबूराव लातूर ज़िले में रहता है और उसके पास चार एकड़ है। दो हज़ार तेरह में उसने ट्रैक्टर के लिए क़र्ज़ लिया था, पाँच लाख साठ हज़ार।

दो हज़ार सोलह में सोयाबीन बैठ गई और उसके बाद दो बरस लगातार बैठी।

क़र्ज़ की किश्तें रुक गईं और उसके बाद जो होता है वही हुआ। खाता ख़राब घोषित हुआ, नोटिस आए, और एक दिन ट्रैक्टर ले जाया गया।

ट्रैक्टर की नीलामी से दो लाख दस हज़ार आया। बाक़ी बचा तीन लाख से ऊपर, और उस पर ब्याज चलता रहा।

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दो हज़ार बीस में एक समाधान योजना आई और उसमें उसने एक लाख अस्सी हज़ार देकर मामला बंद कराया।

पैसा उसने कहाँ से दिया। डेढ़ एकड़ बेचा।

उसके बाद वह छह बरस चैन से रहा और उसे यह लगता था कि बात ख़त्म हो गई है।

बात ख़त्म नहीं हुई थी। काग़ज़ पर नहीं।

दो हज़ार छब्बीस में उसका बेटा बारहवीं के बाद एक तकनीकी कोर्स में चुना गया, नागपुर में, और उसकी फ़ीस चार साल की मिलाकर लगभग नौ लाख थी। शिक्षा ऋण के लिए वे बैंक गए।

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वहाँ उन्हें बताया गया कि पिता के नाम पर पुराना चूक का रिकॉर्ड चढ़ा हुआ है और उस वजह से यह ऋण नहीं बनेगा।

बाबूराव ने कहा कि मैंने समाधान में पैसा दे दिया था।

उससे कहा गया कि हाँ, पर समाधान का मतलब पूरा भुगतान नहीं होता, और रिकॉर्ड में वह अलग तरह से चढ़ता है।

यह बात सही थी। बैंक ने ग़लत नहीं कहा था।

ऋण का हिसाब रखने वाली संस्थाएँ हर खाते के बंद होने का तरीक़ा दर्ज करती हैं। पूरा चुकाया गया, या समझौते में बंद किया गया, ये दो अलग चीज़ें हैं। दूसरी चीज़ सात बरस तक रिकॉर्ड में रहती है।

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छह बरस बीत चुके थे। एक बरस बाक़ी था। बस एक।

एक बरस में बेटे का दाख़िला निकल जाता। सीट किसी और को चली जाती, और वह कोर्स हर बरस नहीं मिलता।

उन छह बरसों में घर कैसे चला, यह अलग बात है। ट्रैक्टर जाने के बाद उसने बटाई पर जोतना शुरू किया, यानी दूसरों का खेत, और अपनी ढाई एकड़ में सोयाबीन की जगह तूर और ज्वार लगाई, जिनमें पैसा कम है और डूबने का ख़तरा भी कम है। उसकी पत्नी ने उन बरसों में मनरेगा के काम पर जाना शुरू किया, जो उसने शादी के बाद कभी नहीं किया था।

यहाँ बाबूराव ने वह नहीं किया जो उस गाँव में आम है, यानी किसी दलाल के पास जाना, जो पाँच-दस हज़ार लेकर रिकॉर्ड ठीक करा देने का दावा करता है।

उसने वह इसलिए नहीं किया कि उसका बेटा साथ था और बेटे ने उसे यह पढ़कर बताया कि रिकॉर्ड में शिकायत का अपना रास्ता है और वह मुफ़्त है।

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उसने वे दो काम किए जो असल में करने के थे।

पहला, उसने बैंक से समाधान का पत्र निकलवाया, जिसमें लिखा था कि खाता बंद है और कोई बकाया नहीं है। वह पत्र दो हज़ार बीस में उसे मिला भी था और खो गया था।

उसकी दूसरी प्रति निकलवाने में उसे पाँच चक्कर और चार महीने लगे, क्योंकि जिस शाखा में खाता था वह अब दूसरी शाखा में मिल गई थी और पुराना रिकॉर्ड कहीं और चला गया था।

दूसरा, उसने ऋण-सूचना संस्था के पास अपनी रिपोर्ट निकाली और उसमें देखा कि क्या-क्या लिखा है।

उसमें एक चीज़ ग़लत भी निकली, और यह उसकी क़िस्मत थी।

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उसमें एक दूसरा क़र्ज़ भी चढ़ा हुआ था, एक सोने के ऋण का, जो उसने कभी नहीं लिया था और जो नाम मिलते-जुलते होने से चढ़ गया था।

यह ग़लती पकड़ में आ गई। उससे शिकायत में दम आया।

उसने ऑनलाइन शिकायत दी, दोनों बातों के साथ, और उसमें समाधान का पत्र लगाया।

इकतालीस दिन में सोने के ऋण वाली गड़बड़ी हट गई। दूसरी बात नहीं हटी और वह हट भी नहीं सकती थी, क्योंकि वह सही थी।

पर रिपोर्ट साफ़ हुई और उसका अंक बयालीस अंक ऊपर गया।

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उस रिपोर्ट के साथ वे दूसरे बैंक गए और वहाँ ऋण हो गया। ज़मानत में उन्हें बची हुई ढाई एकड़ रखनी पड़ी।

बेटा नागपुर चला गया। अब दूसरे बरस में है।

फ़ीस के बाक़ी इंतज़ाम में एक चीज़ और हुई। ऋण नौ लाख का नहीं मिला, सात लाख का मिला, और बाक़ी दो लाख उसे अपने बड़े भाई से लेने पड़े। वह पैसा अब भी लौटाना है और उस पर कोई काग़ज़ नहीं है, और यह बाबूराव को रात में सबसे ज़्यादा खटकता है, बैंक का ऋण नहीं।

बाबूराव ने अपने गाँव में यह बात दो जगह बताई और दोनों जगह उसने वही एक चीज़ कही, जो उसे सबसे देर से समझ आई थी। समाधान में पैसा देकर मामला बंद कराने और पूरा क़र्ज़ चुकाने में काग़ज़ पर फ़र्क़ रहता है, और वह फ़र्क़ सात बरस चलता है, इसलिए जो चुका सकता है वह समाधान में मत जाए।