वर्दियाँ नौ थीं और उनमें से चार में चूहों ने छेद कर दिए थे।
वे एक टीन के बक्से में सात बरस पड़ी रहीं। लाल कोट, सुनहरे फ़ीते, और कंधे पर लगने वाले वे गोल छल्ले जो असल में गत्ते के होते हैं और ऊपर से चमकीले काग़ज़ चढ़ा दिया जाता है।
ग्वालियर में कन्हैया के पिता की बैंड पार्टी अठाईस बरस चली।
नौ आदमी। दो क्लैरिनेट, एक ट्रंपेट, दो झाल, एक बड़ा ढोल, दो साइड ड्रम, और एक आदमी जो बत्ती वाला डंडा लेकर आगे चलता था और जिसे बजाना नहीं पड़ता था।
पिता क्लैरिनेट पर थे और पार्टी का नाम उनके नाम पर था।
दो हज़ार उन्नीस में उन्हें दौरा पड़ा और साल भर बाद वे नहीं रहे। पार्टी उसी साल टूट गई, और उसकी वजह झगड़ा नहीं थी। शादी का ऑर्डर पार्टी के नाम पर आता है और नाम के पीछे एक आदमी होता है, और वह आदमी नहीं रहा तो ऑर्डर आना बंद हो गया।
नौ आदमी दूसरी पार्टियों में चले गए। दो शहर छोड़ गए। एक ने बजाना छोड़ दिया और सब्ज़ी की दुकान खोल ली।
कन्हैया उस वक़्त बाईस का था और वह बैंड में कभी नहीं रहा था।
उसके पिता ने उसे इसमें डाला नहीं था। यह उस काम में आम है। बैंड का काम शादी के मौसम का है, चार महीने चलता है, रात-रात भर खड़े रहना पड़ता है, और सड़क पर बजाने वाले को कोई इज़्ज़त से नहीं देखता। पिता चाहते थे कि लड़का कुछ और करे।
उसने कुछ और किया भी। वह पाँच बरस एक मोबाइल कंपनी के लिए घर-घर सिम बेचता रहा।
बाजा उठाने की बात उसके मन में सात बरस बाद आई, और वह किसी याद की वजह से नहीं आई। उसका काम बंद हो गया था, कंपनी ने वह पूरा ढाँचा ख़त्म कर दिया, और उसके पास दो चीज़ें बची थीं। ग्वालियर में बीस बरस पुरानी पहचान, और वह टीन का बक्सा।
उसने पहले हिसाब लगाया।
बैंड शुरू करने में सबसे बड़ा ख़र्च बाजे का होता है और वे उसके पास थे। पीतल के साज़ पड़े-पड़े ख़राब नहीं होते, उनमें बस पैड और कॉर्क बदलने पड़ते हैं। ढोल की खाल फट जाती है और वह नई चढ़ जाती है। वर्दियाँ चार नई सिलनी थीं।
कुल जमा उसने बत्तीस हज़ार का अंदाज़ा लगाया और आख़िर में इकतालीस हज़ार लगे।
आदमी ढूँढ़ने में उसे ज़्यादा वक़्त लगा।
पिता के नौ में से चार उसी शहर में थे। उनमें से दो ने पहली बार में हाँ कह दी, क्योंकि जहाँ वे थे वहाँ उन्हें आख़िरी क़तार में खड़ा किया जाता था। एक ने मना कर दिया। चौथा गयादीन था, जो बड़ा ढोल बजाता था और जिसकी उम्र अब उनसठ थी। उसने इतना कहा कि बजा तो लूँगा, पर रात भर खड़ा नहीं रह सकता।
कन्हैया ने उसके लिए एक चीज़ का इंतज़ाम किया, जो उस शहर की किसी पार्टी में नहीं थी। उसने एक रेहड़ी बनवाया, जिस पर बड़ा ढोल रखा जा सके और जिसे एक लड़का खींचे।
इससे दो फ़ायदे हुए। गयादीन बैठकर बजा सकता था, और ढोल की आवाज़ ऊपर उठकर बेहतर जाती थी।
पाँच आदमी उसने नए लिए। तीन लड़के मुहल्ले के थे जिन्हें बजाना नहीं आता था, और उन्हें सिखाने का काम गयादीन ने लिया।
कन्हैया ख़ुद कोई साज़ नहीं बजाता। आज भी नहीं।
वह जो करता है, वह बाक़ी सब है। ऑर्डर लेना, मंडप वाले से बात, रास्ते का हिसाब, बिजली वाली गाड़ी, और सबसे ज़रूरी, बारात के आगे चलते हुए यह तय करना कि कौन सा गाना कहाँ बजेगा।
पहला ऑर्डर देवउठनी के बाद वाली शादी का मिला और वह छोटा था, दस हज़ार का।
पहले सीज़न की एक रात जनवरी में पड़ी। मुरार की तरफ़ एक बारात थी और उस रात पारा तीन डिग्री पर था। लाल कोट के नीचे स्वेटर नहीं पहना जा सकता, क्योंकि कोट तंग बनता है। तीन घंटे बजाने के बाद दो लड़कों की उँगलियाँ इतनी अकड़ गईं कि क्लैरिनेट के छेद बंद नहीं हो रहे थे। कन्हैया ने उस रात उनसे बजवाना बंद कराया और आगे का रास्ता ढोल और झाल पर निकाला, जो ठंड में चलते रहते हैं।
पहले सीज़न में उन्हें चौदह ऑर्डर मिले। दूसरे सीज़न में इकतीस।
इसमें एक चीज़ काम आई जो कन्हैया की मेहनत नहीं थी। ग्वालियर में उस नाम को लोग जानते थे और कई घरों में यह याद था कि उनकी शादी में वही पार्टी बजी थी। दो जगह उसे ऑर्डर सिर्फ़ इसलिए मिला।
उसने नाम बदला नहीं। पार्टी आज भी उसके पिता के नाम से चलती है।
पैसा अब भी बहुत नहीं है। चार महीने का काम है और बाक़ी आठ महीने वह एक जगह हिसाब लिखने का काम करता है।
गयादीन दो बरस पहले नहीं रहे। ढोल अब उनका सिखाया लड़का बजाता है, और वह खड़े होकर बजाता है, क्योंकि वह छब्बीस का है।
रेहड़ी हटाया नहीं गया। वह हर बारात में साथ चलता है और उस पर पानी की बोतलें, वर्दियों के फ़ालतू फ़ीते और मरहम की डिबिया रखी रहती है, और नए लड़कों को यह मालूम नहीं है कि वह किसी और चीज़ के लिए बनाया गया था।