बक्सा तीन बरस छप्पर के ऊपर पड़ा रहा और उसमें कबूतर बैठते थे।

उपेंद्र ग्यारह बरस बाहर रहा। पहले दो बरस सऊदी में और उसके बाद नौ बरस क़तर में, और दोनों जगह एक ही काम, इमारतों में पानी की लाइन डालना।

वह लौटा तो उसके पास छह लाख दस हज़ार थे। ग्यारह बरस की कमाई।

गोपालगंज में उसने उस पैसे से क्या किया, यह उस इलाक़े में हज़ारों लोग कर चुके हैं। उसने सड़क पर एक दुकान किराए पर ली और मोबाइल, कवर, चार्जर और रीचार्ज का काम शुरू किया।

यह उसका सोचा हुआ फ़ैसला नहीं था। वह जो सबसे साफ़ चीज़ दिखी, वह थी। दुकान वाला काम इज़्ज़त का माना जाता है, बैठकर होता है, और लौटे हुए आदमी से सब यही पूछते हैं कि दुकान कब खोलोगे।

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दुकान चौदह महीने चली। उसके बाद बंद।

बंद होने की वजह चोरी या क़िस्मत नहीं थी। उसी सड़क पर उसके बाद तीन और दुकानें खुलीं, कंपनी वाला माल ऑनलाइन सस्ता मिलने लगा, और रीचार्ज का काम लोगों के अपने फ़ोन में चला गया।

चौदह महीने में चार लाख अस्सी हज़ार निकल गया।

ऐसे मोड़ पर बहुत लोग दोबारा बाहर चले जाते हैं। उपेंद्र की उम्र उस वक़्त उन्तालीस थी और उसका वीज़ा वाला ठेकेदार अब भी उसे बुला रहा था।

उसने अपनी पत्नी से कहा कि दो महीने रुककर देखता हूँ।

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उन दो महीनों में उसने कोई योजना नहीं बनाई। जो हुआ वह एक शादी में हुआ।

उसके चचेरे भाई के घर शादी थी और उससे दो दिन पहले नल का काम अटक गया। नया बाथरूम बना था और उसमें गीज़र की लाइन ग़लत जुड़ गई थी, और जो मिस्तरी उसे बना रहा था वह किसी और शादी में लगा था।

उपेंद्र ने वह डेढ़ घंटे में ठीक कर दिया। बिना किसी से पूछे।

वहाँ खड़े लोगों में एक ठेकेदार था, जो उस क़स्बे में मकान बनवाता था। उसने उससे पूछा कि तुमने यह कहाँ सीखा।

उसने कहा कि बाहर यही करता था। ग्यारह बरस।

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उस आदमी ने अगले हफ़्ते उसे एक मकान का पूरा प्लंबिंग का काम दे दिया।

जो चीज़ इसमें देखने लायक़ है, वह यह है कि उपेंद्र ने ग्यारह बरस यह काम किया था और उसे यह हुनर मानता ही नहीं था। उसके लिए वह मज़दूरी थी। बाहर वह ठेके पर तीन सौ आदमियों में एक था और उसे कोई अपने नाम से नहीं जानता था, और वहाँ यह इज़्ज़त का काम नहीं था।

अपने क़स्बे में वही काम अलग चीज़ था।

गोपालगंज में उन बरसों में मकान बहुत बन रहे थे और उनमें से आधे बाहर से आए पैसे से बन रहे थे। जो लोग मकान बनवा रहे थे, उन्हें दो-तीन मंज़िल की लाइन, प्रेशर और गीज़र का काम आने वाला आदमी चाहिए था, और वह उस क़स्बे में कम था।

बक्सा उसने छप्पर से उतारा। जुलाई की एक सुबह।

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उसमें पाना, चूड़ी काटने का औज़ार, पाइप कटर, और वे दो चीज़ें थीं जो उस वक़्त उस बाज़ार में मिलती भी नहीं थीं। वह सब वह ग्यारह बरस में जोड़ता रहा था और लौटते वक़्त साथ ले आया था, बिना यह सोचे कि इनका क्या करेगा।

शुरू में उसके पास गाड़ी नहीं थी और औज़ार का बक्सा भारी होता है। पहले सात महीने वह किराए के ऑटो से जाता था और दिन के डेढ़ सौ उसी में जाते थे। सेकंड हैंड मोटरसाइकिल उसने आठवें महीने ली, अड़तीस हज़ार की, और उसके पीछे लोहे की एक टोकरी वेल्ड करा ली, जिसमें पाइप खड़े रखे जा सकें। वह टोकरी उस क़स्बे में अब चार और लड़कों की गाड़ी पर दिखती है।

पहले बरस उसने चौदह मकान किए। तीसरे बरस चालीस से ऊपर।

आज उसके साथ पाँच लड़के काम करते हैं और तीन को उसने सिखाया है। सिखाने में वह एक बात पहले दिन कह देता है, कि यह मज़दूरी नहीं है, इसे हुनर मानो, वरना तुम भी ग्यारह बरस बर्बाद करोगे।

पैसा दुकान से ज़्यादा है और उससे भी ज़्यादा वह चीज़ बदली है जिसका ज़िक्र वह नहीं करता। सड़क पर लोग उसे उसके काम के नाम से बुलाते हैं और यह बाहर ग्यारह बरस में कभी नहीं हुआ था।

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जो चार लाख अस्सी हज़ार दुकान में गए, वे वापस नहीं आए और आएँगे भी नहीं। उपेंद्र इसे अपनी सबसे बड़ी ग़लती मानता है और वह यह भी कहता है कि उसे यह ग़लती किए बिना समझ में नहीं आता।

दुकान का शटर आज भी उसी सड़क पर है और अब उस पर किसी और का बोर्ड लगा है।

बक्सा अब घर के अंदर रहता है, दरवाज़े के पास, और उसमें अब वे औज़ार नहीं हैं जो रोज़ काम आते हैं, क्योंकि रोज़ के औज़ार गाड़ी में रहते हैं। उसमें वही चार-पाँच चीज़ें पड़ी हैं जो वह क़तर से लाया था, और उनमें से एक पाने पर उस कंपनी का नाम लिखा है जहाँ वह नौ बरस रहा, और वह पाना वह किसी लड़के को नहीं देता।