बोरा उठाकर वह बता देता था कि उसमें कितना है, और चालीस बरस उसका अंदाज़ा दो किलो से नहीं चूका।

हुकमीचंद बीकानेर की अनाज मंडी में तोल का काम करता था। पल्लेदार बोरा लाता, वह देखता, हाथ में तोलता, और नंबर बोल देता। बाद में काँटे पर तुलने से वह नंबर मिल जाता।

जगह उसकी इसी हुनर से बनी थी। मंडी में जब सौदा तय होता है तो पहले अंदाज़ा लगता है और अंदाज़े पर भाव तय होता है, इसलिए जिसका अंदाज़ा पक्का हो, उसकी बात मानी जाती है।

इलेक्ट्रॉनिक काँटा उस मंडी में बाईस में आया।

पुराने तराज़ू में बाट रखे जाते थे और उसमें दो किलो का फ़र्क़ पकड़ में नहीं आता था। नए काँटे में सौ ग्राम तक आता है।

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पहले महीने में उसका अंदाज़ा ठीक निकला।

दूसरे महीने से वह चूकने लगा। हर बार।

यह उसे किसी ने बताया नहीं, उसने ख़ुद पकड़ा। उसका नंबर हमेशा एक ही तरफ़ ग़लत होता था। वह हमेशा ज़्यादा बताता था, तीन से पाँच किलो ज़्यादा।

उसकी उम्र तिरसठ थी। हाथ पुराना था।

हुआ यह था। हाथ की पकड़ उम्र के साथ कमज़ोर होती है और वज़न का अंदाज़ा हाथ की ताक़त से जुड़ा होता है। जो बोरा उसे पहले साठ किलो का लगता था, वह अब पैंसठ का लगने लगा, क्योंकि उठाने में ज़्यादा ज़ोर लगता था।

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समझ आने पर उसके पास तीन रास्ते थे। सिर्फ़ तीन।

पहला, चुप रहना। अंदाज़ा बोलते रहना। इसमें दो-तीन महीने चल जाते और उसके बाद मंडी में यह बात फैल जाती।

दूसरा, काम छोड़ देना।

तीसरा वही था जो उसने किया।

उसने अपने अंदाज़े में सुधार जोड़ लिया।

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यह जितना सीधा है, उतना ही उसने किया। उसने चार महीने अपने अंदाज़े और काँटे के नंबर, दोनों एक कापी में लिखे। हर बोरा, हर दिन।

उसमें से एक हिसाब निकला। गेहूँ में फ़र्क़ चार किलो का था। सरसों में तीन का। ग्वार में पाँच का, क्योंकि ग्वार का बोरा दबता ज़्यादा है।

कापी लिखवाने में उसे मदद लेनी पड़ी, क्योंकि उसे लिखना उतना ही आता था जितना हिसाब में चलता है। नंबर वह ख़ुद लिखता था और तारीख़ और जिंस का नाम मंडी के एक मुनीम से लिखवाता था, रोज़ शाम, और उसके बदले उसे कुछ नहीं देना पड़ा, क्योंकि वह मुनीम उसे बरसों से जानता था।

उसके बाद वह अपना अंदाज़ा बोलने से पहले उसमें से घटाने लगा।

मंडी में किसी को इसका पता नहीं चला।

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उन चार महीनों में उसने अपनी मज़दूरी का एक हिस्सा गँवाया। तोल वाले को हर सौदे पर कुछ मिलता है और जिन दिनों उसका अंदाज़ा चूक रहा था, उन दिनों दो व्यापारियों ने उसे बुलाना कम कर दिया। महीने के हिसाब में यह लगभग दो हज़ार का नुक़सान था और वह चार महीने चला।

एक बात उसने और की, जो बड़ी थी।

उसने काँटे को दुश्मन नहीं माना। एक दिन भी नहीं। मंडी के दो और पुराने तोल वाले उस काँटे के ख़िलाफ़ थे और उनका कहना था कि यह मशीन गड़बड़ है। उनमें से एक ने महीनों तक व्यापारियों से यही कहा।

हुकमीचंद ने कभी उस मशीन पर शक नहीं किया, क्योंकि उसे चार महीने की अपनी कापी से मालूम हो गया था कि ग़लत कौन है।

नतीजा दो बरस में दिखा।

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जो दो लोग मशीन के ख़िलाफ़ थे, उनका काम कम हो गया, और वजह मशीन नहीं थी। वजह यह थी कि व्यापारी को झगड़ा नहीं चाहिए होता।

हुकमीचंद का काम वैसा ही रहा। घटा नहीं।

बीच में एक बार वह पकड़ा भी गया। एक व्यापारी ने उससे कहा कि आजकल तुम्हारा नंबर काँटे से मिलता है, पहले तुम्हारा नंबर ऊपर रहता था। हुकमीचंद ने कहा कि पहले काँटा नहीं था। इसके बाद उस आदमी ने और कुछ नहीं पूछा, और यह उन दो बरसों में उसके सबसे क़रीब का पल था।

आज उसकी उम्र सड़सठ है। बोरा वह अब उठाता नहीं। उठाने का काम अब उसके साथ का एक लड़का करता है और वह उसे बताता है कि हाथ में कैसा लगा, और नंबर हुकमीचंद बोलता है।

यानी अंदाज़ा अब दूसरे आदमी के हाथ का है।

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उस लड़के के लिए उसने उसी तरह की एक कापी बनाई, चार महीने की, और उसका फ़र्क़ अलग निकला, क्योंकि उसका हाथ जवान है और वह कम बताता है।

उस लड़के को उसने यह भी सिखाया कि नंबर बोलने से पहले एक साँस रुकना है। उसका कहना है कि जल्दी बोला गया नंबर हाथ का होता है और रुककर बोला गया नंबर दिमाग़ का, और मंडी में दूसरा चलता है।

मंडी में वह अब भी सबसे भरोसे का माना जाता है और इसकी वजह उसका अंदाज़ा नहीं है। वजह यह है कि उसका नंबर काँटे से लड़ता नहीं।

वह कापी उसके थैले में रहती है, गिनकर छठी, क्योंकि पाँच भर चुकी हैं। नई हर बरस शुरू होती है और उसमें हर दो-तीन महीने पर वह अपना फ़र्क़ दोबारा जाँचता है, क्योंकि वह जानता है कि फ़र्क़ हर बरस थोड़ा और बढ़ेगा।