बोली चार बजे लगती है और वहाँ औरतें नहीं जाती थीं।
सुभद्रा वाराणसी के एक मुहल्ले में सब्ज़ी बेचती थी। सुबह सात से दोपहर एक और शाम चार से आठ, एक तिपहिया ठेले पर, वही सात-आठ चीज़ें जो रोज़ बिकती हैं।
माल वह गली के आढ़ती से लेती थी, जो सुबह छह बजे उसके मुहल्ले में गाड़ी लगाता था।
उसका भाव मंडी के भाव से पंद्रह से बीस फ़ीसदी ऊपर रहता था, और यह चोरी नहीं थी। वह मंडी जाता था, बोली में ख़रीदता था, ढुलाई देता था, और अपना मुनाफ़ा जोड़कर बेचता था। यही उसका काम था।
सुभद्रा रोज़ का चार से पाँच हज़ार का माल उठाती थी। पंद्रह फ़ीसदी का मतलब है रोज़ के छह-सात सौ, जिसमें से उसका ख़ुद का मुनाफ़ा निकलने के बाद उसके हाथ में दो सौ के आसपास कम आता था।
महीने का छह हज़ार।
यह उसे मालूम था। सात बरस से मालूम था।
न जाने की वजह डर नहीं था। वजह तीन थीं और तीनों असली थीं।
पहली, ढुलाई। मंडी उसके मुहल्ले से नौ किलोमीटर है और चार बजे का माल लाने के लिए गाड़ी चाहिए।
दूसरी, बोली का तरीक़ा। वहाँ माल लॉट में बिकता है, यानी पूरी टोकरी या पूरा कट्टा, और एक कट्टा उसकी दो दिन की खपत से ज़्यादा होता है। बची सब्ज़ी सड़ जाती है।
तीसरी, वहाँ का माहौल। चार बजे उस मंडी में तीन-चार सौ आदमी होते हैं और औरत एक भी नहीं। यह क़ानून नहीं है, यह आदत है, और आदत तोड़ने में क़ानून तोड़ने से ज़्यादा वक़्त लगता है।
उसने तीनों का जवाब निकाला और उसमें उसे पंद्रह महीने लगे।
पहला जवाब आसान था और उसने वही पहले किया। उसने अपने मुहल्ले की तीन और सब्ज़ी बेचने वालियों से बात की, और चार में से दो ने हाँ कहा।
तीन के साथ लॉट का सवाल हल हो जाता है। एक कट्टा आलू तीन में बँट जाता है और किसी का माल नहीं सड़ता।
गाड़ी का जवाब उसी से निकला। तीन औरतें मिलकर एक तिपहिया वाहन का रोज़ का किराया दे सकती हैं, जो अकेले नहीं दिया जा सकता। उन्होंने एक ऐसे आदमी को तय किया जो सुबह साढ़े तीन से छह बजे तक ख़ाली रहता था और जो उसके बाद स्कूल की सवारी ढोता था।
तीसरे का कोई जवाब नहीं होता। उसे झेलना पड़ता है।
पहले दिन वे तीनों गईं और वहाँ जो हुआ, वह मारपीट नहीं थी। किसी ने उन्हें रोका नहीं। जो हुआ वह यह था कि किसी ने उन्हें बोली में गिना ही नहीं।
बोली में हाथ उठाना पड़ता है और आवाज़ देनी पड़ती है, और बोलने वाला जिसे देख ले उसी की बोली मानी जाती है। तीन दिन तक उनकी तरफ़ किसी ने देखा नहीं।
चौथे दिन सुभद्रा टोकरी के सबसे आगे जाकर खड़ी हो गई, बोलने वाले के सामने, जहाँ आदमी भी नहीं खड़े होते।
उस दिन उसकी बोली मानी गई।
पहले महीने में उन्होंने एक ग़लती की जो नुक़सान कर गई। बोली में जोश आ जाता है और सुभद्रा ने एक दिन टमाटर का लॉट मंडी के भाव से ऊपर ले लिया, क्योंकि सामने वाला बढ़ाता जा रहा था। उस दिन का घाटा ग्यारह सौ का था।
उसके बाद उन तीनों ने एक नियम बनाया। घर से निकलने से पहले हर चीज़ का ऊपरी भाव तय करके निकलेंगे और उससे ऊपर हाथ नहीं उठाएँगे, चाहे माल छूट जाए।
यह नियम उन्होंने पंद्रह महीनों में तीन बार तोड़ा और तीनों बार घाटा हुआ।
सबसे मुश्किल महीने बरसात के निकले। जुलाई-अगस्त में तिपहिया वाहन कीचड़ में फँसता है और मंडी का फ़र्श कच्चा है, और उन दिनों माल भी जल्दी ख़राब होता है। एक बार होली के हफ़्ते में उलटी दिक़्क़त हुई, माल इतना सस्ता था कि बोली में सब कुछ ले लेने का मन करता है, और उस हफ़्ते उन्होंने अपना नियम याद रखा।
आज उस मंडी में सुबह चार बजे नौ औरतें होती हैं।
इसमें सुभद्रा का कोई अभियान नहीं है। जो छह और आईं, वे अपने आप आईं, दूसरे मुहल्लों से, और उनमें से चार पहले उसी की तरह गली के आढ़ती से लेती थीं।
पैसे का हिसाब यह है। महीने के छह हज़ार में से ढुलाई का किराया निकलता है, जो तीन में बँटकर उसका दो हज़ार पड़ता है। बचता चार हज़ार।
चार हज़ार से उसने पहले बरस अपने ठेले के पहिये और धुरा बदले, दूसरे बरस बटखरों का पूरा सेट, और तीसरे बरस से वह पैसा उसकी बेटी के कोचिंग में जा रहा है।
नींद उसकी कम हो गई है और यह उस चार बजे की कीमत है। वह रात दस बजे सोती है और तीन बजकर बीस मिनट पर उठती है, और दोपहर में एक से चार के बीच वह डेढ़ घंटा सोती है, जो पहले वह अपनी बेटी के साथ बिताती थी।
गली का आढ़ती अब भी उसी मुहल्ले में गाड़ी लगाता है और सुभद्रा अब भी उससे माल लेती है, महीने में तीन-चार बार, उन दिनों जब गाड़ी वाला नहीं आता या जब वह ख़ुद बीमार होती है। वह उससे पुराने भाव पर ही देता है और इस बात का ज़िक्र उन दोनों में कभी नहीं होता।