चंद्रकला के घर में एक बल्ब छह बरस से नहीं जलाया गया था। वह ख़राब नहीं था। उसमें फ़िलामेंट सही था और होल्डर भी सही था, और उसे जलाने में कुल इतना ख़र्च आता जितना दो-तीन रुपए महीना होता है। वह इसलिए नहीं जलता था कि उस घर में हर चीज़ एक हिसाब से चलती थी और उस हिसाब में वह बल्ब नहीं आता था।
मीटर की वजह से।
उस मकान में उसके पति की चक्की थी। एक कमरे में आटा-चक्की और उसके पीछे रहने के दो कमरे, जैसा इटावा की उस गली में और भी कई मकानों में था। चक्की के लिए बिजली का कनेक्शन व्यापारिक श्रेणी में लिया गया था, क्योंकि वही नियम है। दस घोड़े की मोटर घरेलू मीटर पर नहीं चल सकती।
दो हज़ार बीस में उसके पति गुज़र गए। चक्की उसी बरस बिक गई, क्योंकि उसे चलाना चंद्रकला के बस का नहीं था और उसके दोनों बेटे बाहर थे। मोटर उखड़ गई, पत्थर उखड़ गए, वह कमरा ख़ाली हो गया और उसमें अनाज रखा जाने लगा।
मीटर वहीं रहा। और श्रेणी भी वहीं रही।
व्यापारिक और घरेलू में फ़र्क़ सिर्फ़ नाम का नहीं होता। दर अलग होती है, तयशुदा भार का पैसा हर महीने अलग से जुड़ता है, और वह पैसा तब भी जुड़ता है जब आपने बिजली एक यूनिट भी न जलाई हो। चंद्रकला के घर में तीन बल्ब, एक पंखा और एक टीवी चलता था। उसका बिल हर महीने उन्नीस सौ से तेईस सौ के बीच आता था।
घरेलू श्रेणी में वही ख़र्च तीन सौ चालीस का बनता।
यह उसे किसी ने बताया नहीं था। छह बरस वह वही बिल भरती रही, क्योंकि बिल आता है तो भर दिया जाता है। बताया आख़िर में उसके छोटे बेटे ने, फ़ोन पर, जब उसने बात-बात में महीने का ख़र्च गिनाया।
उसके बाद वह उपकेंद्र गई।
पहली बार में उसे यह मालूम हुआ कि काम हो जाएगा। बाबू ने कहा कि श्रेणी परिवर्तन का फ़ॉर्म भरो, नया भार लिखो, और लाइनमैन आकर देख लेगा। उसने फ़ॉर्म भरा और जमा कर दिया और लौट आई।
उस बात के बाद चौदह महीने लगे।
उस अरसे में जो हुआ वह किसी की बदनीयती नहीं थी। हुआ यह कि हर बार एक नई चीज़ निकल आई।
पहली बार कहा गया कि चक्की का कनेक्शन बंद कराने का प्रमाण चाहिए। यानी काग़ज़ पर यह दर्ज हो कि मोटर हट चुकी है। चंद्रकला ने कहा कि आप आकर देख लीजिए, कमरा ख़ाली है। बाबू ने कहा कि देखने से नहीं होता, कनिष्ठ अभियंता की जाँच रिपोर्ट लगती है।
जाँच के लिए तारीख़ मिली और उस दिन कनिष्ठ अभियंता आया नहीं, क्योंकि उसी दिन शहर की तरफ़ एक तार गिर गया था।
दूसरी तारीख़ पर वह आया। उसने कमरा देखा, ख़ाली मिला, और रिपोर्ट लिख दी। रिपोर्ट में उसने पुराने भार के आगे नया भार लिखा और नीचे लिखा कि व्यापारिक उपयोग बंद पाया गया।
उसके बाद फ़ाइल दो महीने रुकी।
वजह यह थी कि उस मकान का कनेक्शन उसके पति के नाम था और नामांतरण नहीं हुआ था। नामांतरण के लिए उत्तराधिकार का काग़ज़ चाहिए, और उसके लिए तहसील जाना पड़ता है, और तहसील का अपना अलग वक़्त होता है। चंद्रकला ने वह भी कराया। उसमें तीन महीने गए और चार चक्कर लगे और एक बार उसे यह सुनना भी पड़ा कि इतनी उम्र में अकेले क्यों आती हैं, बेटों को भेजिए। उसने इसका जवाब नहीं दिया, क्योंकि बेटे नहीं आ सकते थे और यह बताने का कोई फ़ायदा नहीं था।
नामांतरण हो गया तो पता चला कि उसी बीच नियम बदल गया है और अब श्रेणी परिवर्तन ऑनलाइन होगा।
उसे कंप्यूटर नहीं आता। गली के मोड़ पर एक दुकान है जहाँ फ़ॉर्म भरे जाते हैं और तीस रुपए लगते हैं। उसने वहीं से भरवाया। उसमें भार की जगह ग़लत अंक चढ़ गया और आवेदन निरस्त हो गया, और यह उसे दो महीने बाद पता चला।
दोबारा भरवाया। इस बार उसने दुकान वाले लड़के के साथ बैठकर हर ख़ाना ख़ुद पढ़ा और तब जमा करने दिया।
इस पूरे अरसे में एक बात उसने बंद नहीं की। हर महीने की सात या आठ तारीख़ को वह उपकेंद्र जाती थी और अपनी फ़ाइल के बारे में पूछती थी। बीच में जब बहुत गरमी थी, तब भी। कुल इकतीस चक्कर हुए, और यह गिनती उसने नहीं रखी, दुकान वाले लड़के ने रखी, क्योंकि हर चक्कर से पहले वह उसी से पर्चा निकलवाती थी।
इससे एक चीज़ हुई जो उसने सोची नहीं थी। उपकेंद्र के लोग उसे पहचानने लगे।
पहचानना बड़ी चीज़ नहीं है और उससे नियम नहीं बदलते। पर उससे यह होता है कि आपकी फ़ाइल कहाँ है, यह कोई बताने लगता है। तेरहवें महीने में एक बाबू ने उसे बताया कि आपका आवेदन बना हुआ है, अटका सिर्फ़ इसलिए है कि पुराने बकाया का समाधान बाक़ी है, और वह बकाया आपका नहीं है, वह उन्नीस सौ अट्ठानबे का किसी और उपभोक्ता का है जो इसी खाते में चढ़ा हुआ है।
वह सुनकर वह हँस पड़ी। यह उन चौदह महीनों में उसका पहली बार हँसना नहीं था, पर उपकेंद्र में पहली बार था।
उस बकाया को हटवाने में और छह हफ़्ते लगे। हनुमान जयंती के आसपास का हफ़्ता था और दफ़्तर में आधे लोग नहीं थे।
मीटर बदलने वाले दो लड़के मई की एक दोपहर आए, जिस दिन लू चल रही थी। उन्होंने पुराना मीटर उतारा, नया लगाया, सील की, और सील का नंबर पर्ची पर लिखकर दे दिया। पूरे काम में अठारह मिनट लगे।
पहला बिल अगले महीने आया। तीन सौ इकसठ रुपए।
चंद्रकला ने वह बिल पढ़ा और अंदर जाकर रसोई के दरवाज़े के ऊपर लगा वह बल्ब जलाया, जो छह बरस से नहीं जलाया गया था। वह जल गया। उसके बाद वह वहीं खड़ी रही और उसने उसे बुझाया नहीं, और वह बल्ब अब रोज़ शाम जलता है और रात को बुझाया जाता है, बाक़ी सब बल्बों की तरह।