चयन के दिन मोहिनी चौदहवें नंबर पर रही और ज़िले की टीम में बारह लिए जाते हैं।

यह पहली बार की बात है। दूसरी बार का ज़िक्र आगे है।

बीकानेर से पैंतीस किलोमीटर दूर उस गाँव के स्कूल में खो-खो पहले से खेली जाती थी, इस वजह से नहीं कि किसी ने उसे चुना था, बल्कि इस वजह से कि उसमें कुछ नहीं लगता। दो खंभे, एक नापा हुआ मैदान, और नौ खिलाड़ी। गेंद नहीं। जाल नहीं। बल्ला नहीं।

रेत वाले मैदान में खो-खो का एक फ़ायदा और है। गिरने पर चोट कम लगती है।

मोहिनी तेरह की थी और वह जिस चीज़ में अच्छी थी, वह दौड़ना नहीं था। खो-खो में सबसे ज़रूरी चीज़ बैठे-बैठे मुड़ना और एक ही झटके में उठ जाना है, और उसमें वह अपनी कक्षा में सबसे तेज़ थी।

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उसके पास खेलने के जूते नहीं थे। वह नंगे पैर खेलती थी, जैसे वहाँ लगभग सब खेलती थीं।

ज़िला स्तर के चयन में यह पहली दिक़्क़त बनी, और यह उस तरह नहीं बनी जैसे लगता है। किसी ने उसे जूतों की वजह से नहीं रोका। दिक़्क़त यह हुई कि चयन का मैदान पक्का था, मिट्टी वाला नहीं, और पक्के मैदान पर नंगे पैर बैठकर मुड़ना दूसरी चीज़ है।

उस दिन उसका सबसे अच्छा काम, यानी झटके से उठना, आधा रह गया।

चौदहवें नंबर पर रही।

सूची पढ़कर सुनाई गई और उसमें नाम नहीं था। वह रोई नहीं। बस में बैठकर वापस आ गई और घर पर इतना बताया कि नहीं हुआ।

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आगे के ग्यारह महीने ऐसे गुज़रे।

पहली चीज़ जूते थी। स्कूल के खेल शिक्षक ने कहा कि सरकारी योजना से आ सकते हैं, पर उसमें वक़्त लगेगा। पैसा उसके घर में था नहीं। उसके पिता ऊँट-गाड़ी से रेत ढोते थे और गरमी में वह काम रुक जाता है।

घर में इस पर एक बार बात हुई। उसकी माँ ने पूछा कि खेल से क्या मिलेगा। यह सवाल था, तंज़ नहीं, क्योंकि उसे सचमुच मालूम नहीं था कि खेल से कुछ मिलता भी है। उसके पिता ने कोई राय नहीं दी और सिर्फ़ इतना किया कि शाम के अभ्यास पर उसे मैदान तक छोड़ने लगे, क्योंकि रास्ते में एक सूखा नाला पड़ता है और अँधेरे में उसमें पैर पड़ जाता है।

जूते आख़िर में उसकी बुआ ने दिलवाए, जो जयपुर में रहती थीं, और वे चार सौ अस्सी रुपए के थे और सस्ते थे और उसी काम के थे।

जूते आने के बाद असली बात शुरू हुई, जिसका किसी ने अंदाज़ा नहीं लगाया था।

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जूते पहनकर वह पहले से ख़राब खेलने लगी।

इसकी वजह सीधी है। तीन बरस उसने नंगे पैर खेला था और उसके पैर का पंजा रेत में जिस तरह पकड़ता था, जूते में वह पकड़ नहीं बनती। दो हफ़्ते वह गिरती रही। एक बार टख़ना मुड़ गया।

उसने जूते उतारे नहीं।

खेल शिक्षक ने उसे एक बात बताई जो काम आई। जूते पहनकर मैदान में मत खेलो, पहले जूते पहनकर चलो। तीन हफ़्ते उसने सिर्फ़ चलना और मुड़ना किया, खेल के बाहर, स्कूल के बरामदे में।

गरमी में मैदान दोपहर में तपता है, इसलिए अभ्यास सुबह छह से सात और शाम छह के बाद होता था। रमज़ान के दिनों में गाँव की दो लड़कियाँ शाम को नहीं आती थीं, इसलिए उन दिनों नौ की जगह सात से अभ्यास होता रहा।

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अक्टूबर तक वह जूतों में वैसी हो गई जैसी नंगे पैर थी। इसमें कुछ जुड़ा नहीं, बस पुराना वापस आया।

दूसरा चयन अगले बरस मार्च में था।

इस बार वह आठवें नंबर पर आई। टीम में आ गई।

ज़िले की टीम राज्य के लिए खेलने गई और वहाँ पहले दौर में हार गई। मोहिनी उस मुक़ाबले में मैदान पर सात मिनट रही, क्योंकि वह बारह में थी और खेलने वाले नौ होते हैं।

सात मिनट में उसने दो खो दिए और एक बार पकड़ी गई।

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राज्य का वह मुक़ाबला अजमेर में हुआ और वहाँ मैदान घास का था, जो उसने पहले कभी नहीं देखा था। टीम के आधे खिलाड़ियों के लिए यह पहली बार था। हारने के बाद वे उसी शाम बस से लौट आए और रास्ते में कोई नहीं बोला, और वह हार का ग़म नहीं था, वे सब सो गए थे।

वह राज्य की टीम में नहीं गई और आगे भी नहीं गई। दसवीं के बाद अभ्यास कम हो गया, क्योंकि उसी बरस उसकी माँ की तबीयत ख़राब रही और घर का काम उस पर आ गया, और बारहवीं के बाद वह छूट गया। उस पूरे अरसे में उसने कभी नहीं कहा कि उसे बुरा लगा।

दो चीज़ें बचीं।

पहली, उसने बारहवीं की और उसमें खेल का प्रमाण पत्र काम आया, क्योंकि उस पर उसे कॉलेज में दाख़िला आसानी से मिला।

दूसरी चीज़ मैदान में है। उन जूतों को उसने आठवीं में एक छोटी लड़की को दे दिया था, जिसका पैर उसी नाप का था, और वे उसके बाद दो और लड़कियों तक गए। अब वे किसी के पैर में नहीं हैं, वे खेल के कमरे में उस अलमारी के नीचे पड़े हैं जिसमें खंभे और चूने की डिबिया रखी रहती है, और उन्हें किसी ने फेंका नहीं है।