जो बात रामाशीष अब सबसे पहले करता है, वह यह है कि बोलने वाले को अपनी बाईं तरफ़ कर लेता है।
वह सुपौल के एक गाँव का है और नौ बरस से ईंट के भट्ठे पर जाता था। भट्ठा बुलंदशहर के पास था और मौसम अक्टूबर से जून का होता है। बरसात में भट्ठा बंद रहता है, क्योंकि कच्ची ईंट भीग जाती है, इसलिए मज़दूर उन चार महीनों में गाँव लौट आते हैं।
खाँसी उसे दो हज़ार तेईस के जनवरी में शुरू हुई।
उसने उसे तीन महीने कुछ नहीं समझा। भट्ठे पर खाँसी सबको रहती है। कोयले का धुआँ, ईंट की धूल, और चिमनी के पास का काम, इन तीनों में गला ख़राब रहता ही है और वहाँ कोई डॉक्टर के पास नहीं जाता।
अप्रैल में उसे बुख़ार के साथ ख़ून आया।
जाँच बुलंदशहर के ज़िला अस्पताल में हुई। टीबी निकली। पहला इलाज छह महीने का होता है, चार गोलियाँ रोज़, और वह मुफ़्त मिलता है।
उसने वह शुरू किया। जून में भट्ठा बंद हो गया और वह गाँव चला गया।
गाँव में उसने दवा दो महीने खाई और फिर छोड़ दी, क्योंकि खाँसी बंद हो गई थी और उसे यह लगा कि ठीक हो गया। गाँव के केंद्र पर उसका नाम कभी चढ़ा ही नहीं था।
यहीं यह बीमारी असली मुश्किल बन जाती है। बीच में छोड़ी गई दवा से जीवाणु ताक़तवर हो जाता है, और फिर पहली दवा उस पर असर नहीं करती।
अगले बरस मार्च में खाँसी वापस आई। इस बार जाँच में जो निकला, उसका इलाज नौ महीने का था।
नौ महीने का मतलब यह था कि इलाज दो जगहों पर चलेगा, क्योंकि भट्ठा छह महीने का है और गाँव चार महीने का।
यह सबसे बड़ी दिक़्क़त थी। दवा की नहीं थी।
इस इलाज में मरीज़ को हर दिन दवा किसी के सामने खानी होती है, और उसका हिसाब एक कार्ड पर चढ़ता है। कार्ड उस केंद्र का होता है जहाँ आपका नाम दर्ज है। जगह बदलने पर वह कार्ड दूसरी जगह भेजा जाता है और वहाँ आपका नाम चढ़ता है, और यह होता है, पर अपने आप नहीं होता।
पहली बार जब उसने बुलंदशहर के केंद्र में यह कहा कि जून में गाँव जाना है, तो उसे यही कहा गया कि तब वहाँ के केंद्र पर दिखा देना।
उसने पूछा कि नाम कैसे जाएगा। जवाब नहीं मिला। इसकी वजह यह नहीं थी कि कोई बताना नहीं चाहता था, बल्कि यह कि पूछने वाले उस खिड़की पर बहुत होते हैं और यह सवाल किसी ने पहले नहीं पूछा था।
रास्ता उसे एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने बताया, जो भट्ठे पर महीने में एक बार आती थी।
उसने उसे तीन चीज़ें कराईं। कार्ड की छायाप्रति, केंद्र से लिखा हुआ एक काग़ज़ जिसमें दवा का नाम और तारीख़ें थीं, और गाँव के केंद्र का फ़ोन नंबर।
जून में वह गाँव गया और चौथे दिन उस केंद्र पर पहुँच गया, और वहाँ भी दो चक्कर लगे, क्योंकि जिस आदमी को दवा देनी थी वह पहले दिन नहीं था।
दवा एक दिन भी नहीं छूटी। एक दिन भी नहीं।
यह उसने कैसे किया, इसका जवाब कोई बड़ा नहीं है। उसने अपने साथ काम करने वाले एक लड़के को यह बात बता दी और उससे कहा कि रोज़ याद दिलाना। भट्ठे पर वे दोनों एक ही जगह सोते थे।
उन नौ महीनों में जो सबसे बुरा था, वह दवा का असर था।
इस इलाज की दवाएँ भारी होती हैं। उल्टी आती है, भूख नहीं लगती, और कुछ लोगों में कान पर असर पड़ता है। रामाशीष का वज़न उन नौ महीनों में सात किलो घटा। पूरे सात किलो। भट्ठे का काम वह उस मौसम नहीं कर पाया।
पाँचवें महीने में उसे लगा कि बाईं तरफ़ की आवाज़ें दूर से आ रही हैं।
उसने छह हफ़्ते किसी को नहीं बताया, क्योंकि उसे डर था कि दवा बदल दी जाएगी और इलाज लंबा हो जाएगा।
यह उसकी ग़लती थी। बताने पर दवा में बदलाव हो सकता था और उतना नुक़सान नहीं होता।
इलाज पूरा हुआ। जाँच साफ़ आई। उस बीमारी से वह ठीक है, और चार बरस से ठीक है।
बाएँ कान से उसे अब कम सुनाई देता है। मशीन लगवाने का ख़र्च उसने पूछा है और वह पैंतीस हज़ार से शुरू होता है। उसने वह टाल दिया है।
भट्ठे पर वह अब भी जाता है और चिमनी के पास का काम नहीं लेता। वह पथाई का काम लेता है, जिसमें दिन के अस्सी रुपए कम मिलते हैं और धुआँ नहीं है।
उसके साथ जो लड़का सोता था, उसका नाम फागू है, और अब वह भट्ठे पर आने वाले हर नए मज़दूर से यह पूछ लेता है कि खाँसी कितने दिन से है। रामाशीष ने उसे यह करने को नहीं कहा और उसने यह ख़ुद शुरू किया, और जिस दिन कोई कहता है कि तीन हफ़्ते से ज़्यादा, उस दिन वह उसे रामाशीष के पास भेज देता है, क्योंकि रामाशीष को मालूम है कि उसके बाद क्या-क्या करना पड़ता है।