उमाशंकर ने तबादले का पहला आवेदन उस बरस दिया जिस बरस उसकी बड़ी बेटी पैदा हुई।

वह प्राथमिक विद्यालय में मास्टर था और उसकी तैनाती घर से दो सौ किलोमीटर दूर हुई थी, ज़िले के उस कोने में जहाँ बस दिन में दो बार आती है। यह उसका पहला सरकारी काम था और उसने इसे ख़ुशी से लिया था, क्योंकि सरकारी काम मिल जाना अपने आप में बड़ी बात थी।

तबादले का नियम सीधा है। गृह जनपद में जगह ख़ाली हो और आपका नंबर आ जाए, तो हो जाता है। नंबर वरिष्ठता से बनता है और वरिष्ठता हर बरस बढ़ती है।

पहले बरस उसका नंबर बहुत पीछे था। दूसरे बरस थोड़ा आगे। तीसरे बरस और आगे।

आवेदन वह हर बरस देता रहा। जून में सूची निकलती है और उससे पहले अप्रैल में आवेदन जाता है, और यह काम उसने ग्यारह बार किया।

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आवेदन देने का अपना एक ढर्रा बन गया था। मार्च के आख़िर में वह फ़ॉर्म लाता, उसे दो बार भरता, क्योंकि पहली बार में कहीं न कहीं कट लग जाता था, और फिर उसे ब्लॉक कार्यालय में जमा करके रसीद ले आता। रसीदें उसने सँभालकर रखीं। ग्यारह रसीदें एक ही लिफ़ाफ़े में थीं और वह लिफ़ाफ़ा अलमारी में सबसे ऊपर वाले ख़ाने में रहता था, जहाँ ज़रूरी काग़ज़ रखे जाते हैं।

इन ग्यारह बरसों को दो तरह से देखा जा सकता है।

एक तरीक़ा यह है कि वह इंतज़ार कर रहा था। यही वह ख़ुद सोचता था और यही उसने घर पर कहा भी था। जिस चीज़ का इंतज़ार हो, उसमें बीच का समय अपने आप कट जाता है, जैसे रेल में कटता है।

दूसरा तरीक़ा यह है कि उन ग्यारह बरसों में उसकी बेटियाँ बड़ी हुईं।

सुशीला उसके साथ ही रहती थी और दोनों लड़कियाँ वहीं पैदा हुईं और वहीं स्कूल गईं। किराए का मकान था, दो कमरे और एक आँगन, और मकान मालिक की अपनी दो लड़कियाँ थीं जो इन्हीं की उम्र की थीं। चारों साथ बड़ी हुईं।

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उमाशंकर ने वह मकान कभी अपना नहीं माना। उसने दीवार में एक कील तक नहीं ठोंकी। सुशीला ने आँगन में तुलसी लगाई थी और उसने एक बार कहा था कि रहने दो, जाना ही है।

तुलसी नौ बरस चली। कील एक भी नहीं ठुकी।

बड़ी लड़की जब आठवीं में आई, तब एक चीज़ हुई जो उमाशंकर ने नोट नहीं की। स्कूल में उसका नाम पुकारा गया और उसने जवाब वहाँ की बोली में दिया। घर में सब दूसरी बोली बोलते थे।

यह कोई बुरी बात नहीं थी। बच्चे वहीं की बोली बोलते हैं जहाँ वे खेलते हैं।

छोटी वाली तो घर में भी वही बोलने लगी थी और उसे टोका जाता था। टोकने पर वह चुप हो जाती और थोड़ी देर बाद फिर वैसे ही बोलने लगती, क्योंकि उसके लिए वह दूसरी बोली नहीं थी, वही पहली थी। सुशीला को यह अखरता था। उमाशंकर को नहीं अखरता था और वह इसे अपनी उदारता समझता था। असल में वह इसलिए नहीं अखरता था कि उसे लगता था यह सब कुछ बरसों की बात है।

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बारहवें बरस सूची में उसका नाम आ गया। ऊपर से सत्रहवाँ।

जून की उस सुबह उसे यह ख़बर मिली और उसने सबसे पहले सुशीला को बताया। सुशीला ने सुना और कुछ देर बाद पूछा कि लड़कियों के स्कूल का क्या होगा।

यह सवाल उसने ग्यारह बरस में एक बार नहीं सोचा था। एक बार भी नहीं।

बड़ी उस बरस दसवीं में जाने वाली थी। बोर्ड का साल। बीच में स्कूल बदलने का मतलब है कि पंजीकरण दोबारा हो और कुछ विषय बदलें। छोटी सातवीं में थी और उसका मामला आसान था, पर उसकी सारी सहेलियाँ उसी मोहल्ले में थीं।

उमाशंकर ने पहली बार यह हिसाब लगाया कि वह किसे कहाँ ले जा रहा है।

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वह अपने घर लौट रहा था। लड़कियाँ अपने घर से जा रही थीं। दोनों बातें सच थीं।

रुकने का रास्ता भी था और उसने उसे देखा भी। तबादला ठुकराया जा सकता है। ठुकराने पर आदमी सूची से बाहर हो जाता है और अगली बार सबसे नीचे से शुरू करता है, और उसकी उम्र उस वक़्त छियालीस की थी। दूसरी बार में और ग्यारह बरस लगते तो सेवानिवृत्ति सामने होती।

उसकी अपनी माँ उसी घर में थीं, दो सौ किलोमीटर दूर, और अब चलने में उन्हें सहारा लगता था।

उसने तबादला ले लिया। और कोई रास्ता नहीं था।

जुलाई में सामान बँधा। तीन दिन में। सामान ज़्यादा नहीं था, क्योंकि उमाशंकर ने ग्यारह बरस में कभी बड़ा सामान लिया ही नहीं था। जो चीज़ें छूटीं, उनमें तुलसी थी और मकान मालिक की लड़कियाँ थीं।

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बड़ी रास्ते भर चुपचाप बैठी रही और यह भी कोई बड़ी बात नहीं थी। सोलह की उम्र में लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं। छोटी ने दो बार पूछा कि क्या गर्मियों में वापस आ सकते हैं।

अब उमाशंकर अपने ही गाँव के स्कूल में पढ़ाता है और घर से स्कूल तक पैदल जाता है। यह वही चीज़ है जो उसने ग्यारह बरस माँगी थी और वह उसे मिल गई है।

बड़ी ने दसवीं में पिछले बरसों से कम अंक पाए। यह विषय बदलने से हुआ या और किसी वजह से, यह कहा नहीं जा सकता, और उमाशंकर ने इस पर कभी कुरेदा नहीं।

उस मकान की चौखट पर, जो अब छूट चुका है, पेंसिल की लकीरें बनी हुई हैं। दोनों लड़कियों की, हर जन्मदिन पर एक, नौ-नौ। मकान मालिक ने उन्हें मिटाया नहीं है, क्योंकि उसकी अपनी लड़कियों की लकीरें भी उसी चौखट पर हैं और वे आपस में मिली हुई हैं।

जिस घर में वे अब रहते हैं, उसकी चौखट पर भी लकीरें हैं। वे उमाशंकर की अपनी हैं, तीस बरस पुरानी, ऊपर वाली उसके सिर तक। उसके नीचे या ऊपर उसके बाद किसी ने कुछ नहीं बनाया।