रघुवीर की मेहनत पर किसी को शक नहीं था। यही सबसे तकलीफ़देह बात थी। अगर वह कम पढ़ता तो कोई कह देता कि और पढ़ो। पर वह सबसे ज़्यादा पढ़ता था, और नंबर फिर भी औसत आते थे। मोहल्ले में लोग उसकी मेहनत की तारीफ़ करते और फिर आपस में कहते कि बेचारा, लगता है दिमाग़ ही ऐसा है।
यह बात उसने किसी से नहीं कही, पर उसे मालूम थी। मोहल्ले में तारीफ़ और तरस एक ही साँस में आते हैं, और सुनने वाले को दोनों अलग-अलग सुनाई देते हैं। रघुवीर तारीफ़ पर सिर हिला देता और बाकी हिस्सा घर आकर सोचता।
वह रोज़ आठ घंटे पढ़ता था। सुबह चार बजे उठकर दो घंटे, फिर कॉलेज, फिर शाम को चार घंटे, फिर रात को दो। यह हिसाब उसकी कॉपी के आख़िरी पन्ने पर लिखा था और वह उस पर रोज़ निशान लगाता था। निशान कभी छूटा नहीं।
घर में पैसे की तंगी नहीं थी, पर गुंजाइश भी नहीं थी। बाप की दुकान चलती थी और उसी से सब चलता था। दुकान सँभाल लो, यह बात रघुवीर से कभी नहीं कही गई, और उसका न कहा जाना भी अपनी जगह एक बोझ था। तीसरी बार बैठने का मतलब था कि चौथी बार की बात अब कोई नहीं करेगा।
उस साल की परीक्षा उसकी तीसरी थी। पहली में वह बिना तैयारी के बैठा था, दूसरी में तैयारी के साथ, तीसरी में उससे भी ज़्यादा तैयारी के साथ। नंबर तीनों बार लगभग एक जैसे आए। यही समझ में नहीं आता था। इतनी मेहनत के बाद नंबर बढ़ने चाहिए थे, चाहे थोड़े ही सही।
नतीजा दोपहर को आया। रघुवीर ने सूची में नाम ढूँढ़ा। नहीं मिला। दोबारा ढूँढ़ा। फिर भी नहीं। वह वहीं खड़ा रहा, जब तक भीड़ छँट नहीं गई। फिर वह घर नहीं गया। शाम तक स्टेशन के पीछे वाली दीवार पर बैठा रहा।
रात को वह घर पहुँचा तो माँ ने खाना गरम करके रख दिया और कुछ पूछा नहीं। बाप ने भी नहीं पूछा। घर में सबको मालूम था, क्योंकि नतीजा दोपहर का था और मोहल्ला छोटा है। किसी ने उसे तसल्ली नहीं दी, और उन दिनों की सबसे अच्छी बात यही रही।
उन दिनों वह रोज़ शाम को उसी दीवार पर जाकर बैठ जाता था। स्टेशन के पीछे वाली उस दीवार से प्लेटफ़ॉर्म दिखता है और गाड़ियाँ दिखती हैं, और वहाँ बैठे आदमी से कोई कुछ नहीं पूछता। यह उन दिनों की सबसे काम की बात थी।
तीन हफ़्ते उसने कुछ नहीं किया। कॉपी खुली भी नहीं। इन तीन हफ़्तों में उसे एक ही चीज़ बार-बार दिखती रही, और वह नतीजे की नहीं थी। उसे परीक्षा वाला दिन दिखता था, जब एक सवाल का जवाब लिखते-लिखते वह बीच में रुक गया था, क्योंकि आगे का याद ही नहीं आया।
वह सवाल उसने पढ़ा हुआ था। तीन बार पढ़ा हुआ था। परीक्षा से नौ दिन पहले पढ़ा था, और तब उसे पूरा आता था।
चौथे हफ़्ते उसने अपनी कॉपियाँ निकालकर उलटनी शुरू कीं। शाम तक उसे समझ आ गया कि दिक़्क़त पढ़ने में नहीं है। वह पढ़ता बहुत था और भूलता उससे भी ज़्यादा था। आठ घंटे में जो अंदर जाता, उसका आधा अगले हफ़्ते तक निकल चुका होता, और वह उस आधे की जगह नया भरता रहता।
नई रणनीति में सबसे बड़ा बदलाव यह था कि उसने पढ़ने का समय कम कर दिया। यह सुनकर उसकी माँ घबरा गईं। रघुवीर ने समझाया कि वह आठ घंटे पढ़कर आधा भूल जाता था। अब वह पाँच घंटे पढ़ेगा और हर शाम एक घंटा सिर्फ़ यह जाँचने में लगाएगा कि सुबह जो पढ़ा था, वह याद है या नहीं। पहले महीने कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। तीसरे महीने पड़ा।
जाँचने का तरीक़ा उसने ख़ुद बनाया और वह सादा था। शाम को वह कॉपी बंद करके एक कोरे काग़ज़ पर लिखता कि सुबह क्या पढ़ा था। जो लिख पाता, वह याद था। जो नहीं लिख पाता, उसे अगली सुबह दोबारा पढ़ना था। कोरे काग़ज़ झूठ नहीं बोलते, और उसे यही सबसे भारी लगता था।
शुरू में काग़ज़ लगभग कोरा ही रहता था। यह देखना आसान नहीं होता। छह घंटे कम पढ़कर यह पाना कि जो पढ़ा वह भी नहीं टिका, आदमी का मन करता है कि वापस आठ घंटे पर चला जाए, जहाँ कम से कम मेहनत दिखती तो है। रघुवीर ने दो बार यह सोचा। दोनों बार नहीं लौटा।
तीसरे महीने में काग़ज़ भरने लगा। चौथे में वह पूरा भरता था, और उसमें वे चीज़ें भी आ जाती थीं जो दो हफ़्ते पहले पढ़ी थीं। यह उसके लिए नई बात थी। इतनी नई कि उसने एक दिन वे काग़ज़ गिनकर देखे और उन्हें फेंका नहीं।
अगली परीक्षा में उसका नाम सूची में था। सूची उसी दीवार पर लगी थी और उसने उसे उसी तरह ढूँढ़ा जैसे पिछली बार ढूँढ़ा था, ऊपर से नीचे, दो बार। नाम दूसरी बार में मिला।
घर पर मिठाई आई और फ़ोन आए। मोहल्ले के जिन लोगों ने उसे बेचारा कहा था, उन्होंने अब कहा कि उन्हें तो पहले से मालूम था। रघुवीर इस पर चुप रहा। उसे इससे फ़र्क़ भी नहीं पड़ा, और यह उसे ख़ुद अजीब लगा।
अब वह पढ़ाता है। जो लड़के उसके पास आते हैं, उनसे वह पहले दिन घंटों की बात नहीं करता। वह उन्हें एक कोरा काग़ज़ देता है और कहता है कि आज शाम इस पर लिखकर लाना कि आज क्या पढ़ा। ज़्यादातर लड़के पहले दिन वह काग़ज़ लगभग कोरा ही लौटाते हैं। रघुवीर उसे देखकर कुछ कहता नहीं, बस अगले दिन एक और काग़ज़ दे देता है।