रामेसर के घर में बिजली नहीं थी, और यह गाँव की आधी बस्ती का हाल था। वह लालटेन के नीचे पढ़ता, और तेल ख़त्म होते ही सो जाता। उसका सपना बड़ा था और उसने वह किसी को नहीं बताया था। परिवार साधारण था, और साधारण घरों में बड़े सपनों की बात करने पर लोग पहले हँसते हैं, फिर समझाते हैं। रामेसर दोनों से बचना चाहता था।
सपना बड़ा भी नहीं था। उसे पॉलिटेक्निक में दाख़िला चाहिए था।
फ़ॉर्म भरने का काम आसान लगता है। फ़ॉर्म वह हिस्सा है जिसमें कुछ नहीं होता।
जो चीज़ फ़ॉर्म के साथ लगती है, वह आय प्रमाण पत्र है। वह तहसील से बनता है और उसके लिए तीन काग़ज़ चाहिए, और उनमें से एक राशन कार्ड है।
रामेसर के घर में राशन कार्ड था।
उस पर उसके पिता का नाम एक तरह से लिखा था। स्कूल के प्रमाणपत्र पर दूसरी तरह से।
फ़र्क़ बड़ा नहीं था। एक जगह रामप्रसाद लिखा था और दूसरी जगह राम प्रसाद, बीच में जगह छोड़कर। कहीं-कहीं तीसरी जगह पर एक अक्षर की मात्रा अलग थी।
यह उस गाँव में असाधारण नहीं है। जो लोग लिखते हैं वे सुनकर लिखते हैं, और जिनका नाम लिखा जा रहा होता है वे पढ़ नहीं सकते।
रामेसर के पिता के नाम की चार लिखावटें मिलीं और उन्हें ढूँढ़ने में उसे दो हफ़्ते लगे। राशन कार्ड, स्कूल का प्रमाणपत्र, खेत की खतौनी, और बैंक की पासबुक। खतौनी वाली सबसे पुरानी थी और सबसे अलग थी। बैंक वाली स्कूल से मिलती थी। किसी एक को सही मान लेने का कोई तरीक़ा नहीं था, क्योंकि सही वही होता है जो सामने वाले काग़ज़ पर लिखा हो।
तहसील में यह चलता नहीं।
रामेसर ने पहली बार जून में अर्ज़ी दी और उसे लौटा दिया गया। लौटाने वाले ने वजह बताई और वजह सही थी। नाम मेल नहीं खाता।
उसने पूछा कि क्या किया जाए। जवाब मिला कि सही करा लो।
यह जवाब भी सही था और उसमें कोई मदद नहीं थी, क्योंकि रामेसर को यह नहीं मालूम था कि सही कराना कहाँ होता है।
वह गाँव लौटा और उसने वही किया जो सब करते हैं। उसने लोगों से पूछा।
स्कूल के मास्टर ने कहा कि राशन कार्ड ठीक कराओ। राशन की दुकान वाले ने कहा कि स्कूल का प्रमाणपत्र ठीक कराओ। एक चाचा ने कहा कि दोबारा वही अर्ज़ी दे दो, कभी-कभी दूसरा बाबू चला देता है।
उसने वह भी किया। दूसरा बाबू भी नहीं चलाता।
जुलाई में उसने वही अर्ज़ी तीन बार दी।
इन तीन महीनों में उसने कुल छब्बीस दिन तहसील में लगाए। तहसील गाँव से चौदह किलोमीटर है और बस दिन में तीन बार जाती है। सुबह वाली छह बजे और उससे चूक जाओ तो अगली ग्यारह बजे। छब्बीस दिन का मतलब है छब्बीस बार का किराया, छब्बीस दिन की मज़दूरी, और वे सब दिन जिनमें खेत पर कोई नहीं गया।
उसके पिता ने एक बार भी नहीं पूछा कि कब तक। यह उनकी उदारता नहीं थी। उन्हें ख़ुद यह नहीं मालूम था कि इसमें कितना लगना चाहिए।
अगस्त में तारीख़ निकल गई।
यहाँ पर एक बात कहनी ज़रूरी है, क्योंकि यही इस कहानी में सबसे कम दिखने वाली चीज़ है। रामेसर ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कोशिश करना नहीं छोड़ा। उसने वह सब किया जो उसे करने को कहा गया और उससे कुछ नहीं हुआ।
जो चीज़ उसके पास नहीं थी, वह हौसला नहीं था। जानकारी थी।
वह जानकारी उसे नवंबर में मिली, और मुफ़्त में मिली, और एक ऐसे आदमी से मिली जिसका इससे कोई लेना-देना नहीं था।
तहसील के बाहर एक आदमी बैठता है जो टिकट लगाता है और अर्ज़ी लिखता है। रामेसर उससे दो बार लिखवा चुका था। तीसरी बार उस आदमी ने ऊपर देखकर पूछा कि यही अर्ज़ी बार-बार क्यों।
रामेसर ने बता दिया।
उस आदमी ने कहा कि नोटरी से शपथ पत्र बनवा लो, जिसमें लिख जाए कि दोनों नाम एक ही आदमी के हैं। पचास रुपये लगेंगे और चालीस मिनट।
पचास रुपये और चालीस मिनट।
रामेसर ने वह शपथ पत्र उसी दिन बनवाया। आय प्रमाण पत्र नौ दिन में बन गया। फ़ाइल पूरी हो गई।
उस आदमी ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई, यह सोचने लायक़ है और इसका जवाब भी सीधा है। उससे पहले रामेसर ने उसे यह बताया ही नहीं था कि अर्ज़ी लौट क्यों रही है। वह सिर्फ़ अर्ज़ी लिखवाने आता था और अर्ज़ी लिखवाने वाला अपनी दिक़्क़त नहीं बताता, वह मज़मून बताता है।
दाख़िला अगले बरस हुआ।
एक बरस छोटी चीज़ लगती है और वह घर में छोटी नहीं पड़ी। रामेसर का छोटा भाई उसी बरस दसवीं पास हुआ था और घर में दो लड़कों की फ़ीस एक साथ नहीं निकल सकती थी।
छोटा भाई काम पर चला गया।
वह सूरत गया, कपड़े की एक इकाई में। पहले बरस वह दिवाली पर आया और दूसरे बरस भी आया। तीसरे बरस से वह साल में एक बार आने लगा।
यह किसी ने तय नहीं किया। यह ऐसे ही हो गया, जैसे घरों में होता है। बड़ा पढ़ने चला गया, इसलिए छोटा कमाने चला गया।
रामेसर अब बिजली विभाग में है और उसकी नौकरी अच्छी है। भाई अब भी उसी काम पर है।
शपथ पत्र आज भी उसकी फ़ाइल में है। एक पन्ना, टाइप किया हुआ, नीचे नोटरी की मुहर।
उसे बनने में चालीस मिनट लगे थे और उसका पता चलने में ग्यारह महीने।