हरिदास बोलता बहुत था। यह उसकी बुराई नहीं मानी जाती थी, क्योंकि वह अच्छा बोलता था। उसकी आवाज़ में एक खनक थी और लोग सुनते थे। हर बात पर उसकी एक राय होती, और वह राय वह बिना पूछे दे देता। कोई मजलिस ऐसी नहीं होती जिसमें सबसे ज़्यादा हरिदास न बोला हो। चुप रहना उसे अजीब लगता था, जैसे कुछ अधूरा छूट रहा हो।

इसी वजह से गाँव उसे आगे कर देता था। बिजली का मामला हो, राशन का हो, या ब्लॉक में कोई काग़ज़ अटका हो, हरिदास जाता था। एक चीज़ उसमें थी जो गाँव में और किसी में नहीं थी। उसे याद रहता था कि किस अफ़सर ने पिछली बार क्या कहा था, और किस तारीख़ को कहा था। वह उसे मौक़े पर निकालकर सामने रख देता था।

पोखर ग्यारह बीघे का था और गाँव के उत्तर में था। मत्स्यजीवी समिति उसमें जून में जीरा डालती थी और माघ में जाल पड़ता था। जाल वाले दिन पूरा गाँव मेड़ पर होता था। रोहू, कतला, मिरगल। चालीस घरों का साल भर का कुछ न कुछ उसी पानी से निकलता था, कुछ खाने का और कुछ बेचने का।

यह कोई पुरानी चुप बात नहीं थी जिसे कोई छेड़ता न हो। ब्लॉक का एक ठेकेदार तीन साल से कोशिश कर रहा था कि पोखर की बंदोबस्ती नीलामी से हो, न कि समिति के नाम पर सीधी। हर साल यह बात उठती थी और हर साल दब जाती थी, क्योंकि दबा देना सबसे आसान काम था और उसमें किसी की कोई हार नहीं होती थी।

उस साल जनवरी में ब्लॉक के कमरे में यही बैठक थी। समिति के आदमी थे, ठेकेदार का मुंशी था, और कोई तीस लोग खड़े थे। अफ़सर ने जो कहा वह मना नहीं था। उसने कहा कि नियम नियम है, पर देखा जाएगा, और अगले हफ़्ते फ़ाइल आगे बढ़ा दी जाएगी। यह उसका हाँ कहने का तरीक़ा था और कमरे में आधे लोग यह जानते थे।

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हरिदास ने वहीं बोलना शुरू किया। उसने कहा कि नियम पिछले साल भी नियम था। फिर उसने वह वाक्य निकाला जो उसे याद था। पिछले साल सत्रह जून को, इसी कुर्सी पर बैठकर, अफ़सर ने कहा था कि समिति का हक़ पहले है और इस पर बहस की ज़रूरत नहीं। हरिदास ने वह पूरा वाक्य दोहराया, तारीख़ के साथ। फिर वह रुक गया।

कमरे को मज़ा आया। कोई हँसा, किसी ने पीठ ठोंकी, और मुंशी ने नज़र नीची कर ली। अफ़सर हँसा नहीं। उसने फ़ाइल खोली, दो लाइनें लिखीं, और कहा कि मामला नीलामी से होगा, ताकि आगे कोई सवाल न रहे।

यह उसकी बदमाशी नहीं थी। सीधी बंदोबस्ती इसलिए हो पाती थी क्योंकि कोई उसे लिखकर नहीं माँगता था। जिस दिन तीस आदमियों के सामने वह अपनी ही बात से बँध गया, उस दिन के बाद चुपचाप कर देना उसकी हार कहलाता, और अफ़सर हारना नहीं चाहता था। हरिदास सही था। सही होना यहीं तक काम आया।

नीलामी फ़रवरी में हुई। समिति के पास इकतालीस हज़ार तक जाने की ताक़त थी। ठेकेदार ने एक लाख छह हज़ार बोले। पोखर उसका हो गया। अगले जून से गाँव उसी पोखर में मज़दूरी करने लगा, दो सौ बीस रुपये रोज़ पर, और जाल वाले दिन मछली गिनकर ट्रक में चढ़ती थी और मेड़ पर खड़े लोग देखते थे।

हिसाब हर घर के लिए अलग था, पर मोटा हिसाब यह था कि जो चीज़ सालाना चार-पाँच हज़ार की पड़ती थी वह अब बारह-चौदह सौ की मज़दूरी रह गई। गाँव ने उससे झगड़ा नहीं किया। नाराज़गी भी नहीं जताई। बस उसे भेजना बंद हो गया। अगली बार बिजली के मामले में जो दो आदमी ब्लॉक गए, उनमें वह नहीं था, और उसे यह बात तब पता चली जब वे लौट आए।

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एक साल ऐसे ही बीता। वह मजलिसों में अब भी बोलता था और लोग अब भी सुनते थे, पर वह जानता था कि सुनना और भेजना दो चीज़ें हैं।

अगली सर्दी में समिति के सामने एक छोटा काम आया। पोखर में पानी जिस पइन से आता है, वह दो जगह से बैठ गई थी और उसे बनवाने के लिए ब्लॉक से मिट्टी का काम मंज़ूर होना था। ठेकेदार को इससे कोई मतलब नहीं था, क्योंकि पइन उसकी बंदोबस्ती में नहीं थी। पर पानी न आए तो पोखर किसी के काम का नहीं, न उसके और न गाँव के।

हरिदास गया, और छोटन को साथ ले गया, जो बाईस का था और जिसने आज तक किसी दफ़्तर में बात नहीं की थी। कमरे में हरिदास दरवाज़े के पास खड़ा रहा। छोटन ने बात उलटी शुरू की, बीच में दो बार माफ़ी माँगी, और पइन कहाँ बैठी है यह बताना भूल गया, फिर बाहर निकलते-निकलते दरवाज़े से लौटकर बताया। अफ़सर ने पूरी बात दो बार पूछी।

काम मंज़ूर हो गया। इसमें कोई चमत्कार नहीं था। एक लड़का हकलाते हुए मिट्टी के काम की गुज़ारिश करे तो उसे मान लेने में अफ़सर का कुछ नहीं जाता। हरिदास मुँह खोलता तो कमरे में एक और आदमी होता जो जीत सकता था, और यह अलग बात हो जाती।

पोखर की मेड़ पर शाम को जाल सुधारने वाले लड़के बैठते हैं और हरिदास वहीं बैठता है। बोलता वह अब भी उतना ही है। वह पूरी बात सुनाता है, शुरू से, ब्लॉक वाले कमरे तक, और उस जगह पर पहुँचकर धीमा नहीं पड़ता। पिछले साल सत्रह जून को, इसी कुर्सी पर बैठकर, आपने ख़ुद कहा था। यह वाक्य वह हर बार जस का तस दोहराता है, और उसके बाद बताता है कि उसके बाद क्या हुआ।