जगरनाथ ने तीसरी सीढ़ी पर हथेली रखी और पानी ठंडा था।
जेठ में गंगा का पानी दोपहर तक नहाने लायक़ गरम हो जाता है और सुबह भी हल्का ही रहता है। ठंडा तब होता है जब वह पहाड़ से आ रहा हो। यहाँ आसमान साफ़ रहता है, नेपाल की तरफ़ बादल फटते हैं, और तीन दिन बाद बलिया के घाट पर पानी बिना किसी चेतावनी के चढ़ जाता है।
उसने हाथ निकाला और पोंछा नहीं। सूखने में दो मिनट लगते हैं और उतनी देर वह वहीं बैठा रहा। बत्तीस बरस से वह इसी घाट पर नाव लगाता था।
पार का गाँव सीधी लकीर में डेढ़ किलोमीटर है, पर जेठ में नदी बीच से हट जाती है और बालू का लंबा दियारा उभर आता है। तब सीधी लकीर काम नहीं करती। नाव को ऊपर की तरफ़ खेकर, गहरी धार पकड़कर, दियारे के सिरे से घूमकर जाना पड़ता है। चालीस मिनट लगते हैं।
सुखई ने पिछले साल दूसरा रास्ता निकाला था। सवारियाँ दियारे तक पैदल जाती हैं, बालू पर बीस मिनट चलती हैं, और आख़िरी धार सुखई की नाव पाँच मिनट में पार करा देती है। किराया आधा। वक़्त आधा।
सुखई जगरनाथ की बहन का लड़का था और छह बरस उसी के साथ नाव पर रहा था। डाँड़ पकड़ना, धार पढ़ना, भरी नाव में सवारियों को कहाँ बिठाना है, यह सब उसने जगरनाथ से सीखा था। अब जगरनाथ के पास दिन में चार फेरे बचते थे। पहले चौदह होते थे।
दुलारी हिसाब नहीं पूछती थी, पर उसने एक बात दो बार कही थी। नाव की तली की दो पटरियाँ ढीली हो चुकी हैं और मिस्त्री सात सौ माँग रहा है। तब तक हर फेरे में तली में पानी आ जाता है और उसे टीन के लोटे से उलीचना पड़ता है।
मिस्त्री की तारीख़ गंगा दशहरा के अगले दिन की तय थी। पैसा दशहरा वाले दिन का था। उस दिन घाट पर मेला लगता है।
दस गाँवों के लोग नहाने आते हैं। दोनों तरफ़ से आते हैं, सुबह चार बजे से आते हैं, और शाम तक आते रहते हैं। एक दिन में महीने भर का किराया निकल आता है और दोनों नावों के लिए निकल आता है।
सुबह छह बजे तक दियारे पर तीन सौ लोग जमा हो चुके थे।
जगरनाथ नीचे उतरकर सुखई के पास गया। उसने किसी को सुनाकर नहीं कहा, बस बग़ल में खड़े होकर कहा कि आज दियारा ख़ाली रखो, पानी ऊपर से आ रहा है।
सुखई ने आसमान की तरफ़ देखा।
आसमान में एक टुकड़ा बादल नहीं था। जेठ की धूप ऐसी थी कि बालू पर नंगे पैर नहीं रखा जा सकता था। 'कहाँ से आ रहा है?' उसने पूछा। 'सरजू का पानी है। तीसरी सीढ़ी ठंडी है।'
सुखई हँसा और उसने वह बात कही जो एक बार कही जाए तो वापस नहीं होती। कि काका का घाट ख़ाली है इसीलिए काका को पानी ठंडा लग रहा है। आसपास चार-पाँच लोग खड़े थे और सब हँस दिए। जगरनाथ लौट आया और दोबारा किसी से नहीं कहा।
एक आदमी ने उसकी बात मानी। झिनकू काका, जो चालीस बरस से उसी की नाव में पार होते आए थे और जिनकी उम्र अब अस्सी के क़रीब थी। वे दियारे पर गए, दो-चार परिवारों से बोले, और लोगों ने उन्हें बिठाकर पानी पिला दिया।
ग्यारह बजे तक जगरनाथ ने पाँच फेरे लगा लिए। बारह बजे उसकी नाव फिर भर गई। सत्रह सवारियाँ, दो बकरियाँ, और एक ढोल वाला। किराया उसने पहले ही ले लिया था, जैसे मेले के दिन लेते हैं।
डाँड़ उठाते वक़्त उसने पानी देखा।
धार का रुख़ बदल चुका था। सुबह जो पानी दियारे के किनारे से सटकर नीचे जा रहा था, वह अब किनारे को काट रहा था और बालू छोटे-छोटे टुकड़ों में गिर रही थी। नदी चढ़ती है तो पहले यही करती है। शोर नहीं करती।
पीछे के चैनल में पानी घुस चुका था, उतना जितना घुटने तक आता है, और वह हर मिनट बढ़ रहा था। दियारे पर उस वक़्त लगभग दो सौ लोग थे। बच्चे, बूढ़े, गीले कपड़े, पूजा की थालियाँ। सुखई की नाव पार वाले किनारे पर थी।
जगरनाथ ने नाव नहीं खोली।
उसने सवारियों से कहा कि उतर जाओ, आज इस तरफ़ का फेरा नहीं होगा, और किराया वापस देना शुरू कर दिया। लोग नाराज़ हुए। दो आदमियों ने कहा कि वे थाने जाएँगे। ढोल वाले ने कहा कि उसे तीन बजे बारात में पहुँचना है।
उसने सबका पैसा लौटाया और नाव ख़ाली करके दियारे की तरफ़ मोड़ दी। पहला फेरा उसने बच्चों और बूढ़ों का लगाया।
पानी तब तक कमर तक आ चुका था और चलने में नहीं, बहाने में लगा था। बालू के नीचे से निकलता है तो पैर के नीचे की ज़मीन साथ-साथ खिसकती है। यही उस चैनल की असली बात है और यही किसी को दिखती नहीं।
दूसरे फेरे तक सुखई की नाव भी आ गई।
दोनों ने शाम तक फेरे लगाए। बीच में एक बार सुखई की नाव जगरनाथ की नाव के पास से निकली और सुखई ने सिर्फ़ इतना पूछा कि कितने रह गए हैं, और जगरनाथ ने उँगलियों पर बताया। अँधेरा होने से पहले दियारा ख़ाली हो गया।
झिनकू काका आख़िरी नाव में आए और उतरते वक़्त उन्होंने जगरनाथ का कंधा पकड़कर सहारा लिया, जैसे चालीस बरस से लेते आए थे। उस रात घाट पर लोग देर तक बैठे रहे और बात यही होती रही कि पानी अचानक आ गया था और दो नावें लगी हुई थीं।
किसी ने यह नहीं कहा कि सुबह किसी ने बताया था। जगरनाथ ने भी नहीं कहा। उस दिन उसकी कमाई तीन सौ बीस रुपये की थी, जो सुबह के पाँच फेरों की थी। मिस्त्री अगले दिन आया, नाव देखी, और सात सौ पर अड़ा रहा।
पटरियाँ उस बरसात में नहीं बदलीं।
आषाढ़ आते-आते गंगा ग्यारहवीं सीढ़ी तक चढ़ आई और तीसरी सीढ़ी पानी के नीचे चली गई, जहाँ अब हाथ डालने का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि बरसात में सारा पानी पहाड़ का ही होता है और सारा ठंडा होता है। जगरनाथ फिर भी हर सुबह घाट पर उतरता रहा, और नाव खोलने से पहले टीन का लोटा उठाकर तली का पानी उलीचता, जैसा उसे उस पूरी बरसात हर फेरे में एक बार करना पड़ा।