अंकित को नींद कम आती थी। बिस्तर पर लेटते ही दिमाग़ चलने लगता। कल क्या करना है, आज क्या नहीं हुआ, और वह बात जो किसी ने तीन दिन पहले कही थी। माता-पिता उसे मेहनत और ईमानदारी सिखाते रहे, और वह दोनों करता भी था। पर बेचैनी कम नहीं होती थी। सुबह वह थका हुआ उठता, और दिन फिर वैसे ही शुरू हो जाता।
कमरा उसने इसी वजह से लिया था। पीछे की गली में, नीचे की मंज़िल पर, एक तरफ़ दीवार और दूसरी तरफ़ सीढ़ी। सामने कोई खिड़की नहीं थी, इसलिए सड़क की आवाज़ नहीं आती थी। किराया तीन हज़ार दो सौ। मकान देखते वक़्त वह दोपहर में गया था और कमरा शांत था।
मोटर पहली रात चली। साढ़े ग्यारह बजे।
पंप रूम उसी दीवार के उस पार था, ईंट की एक ही दीवार, और चारपाई उसी दीवार से सटी हुई। चलने पर आवाज़ दो हिस्सों की होती थी। एक लगातार भिनभिनाहट, जो सह ली जाती। और बंद होने के वक़्त एक धमाका, जैसे किसी ने पाइप पर हथौड़ा मारा हो। वह धमाका हर रात लगभग एक बजे होता था।
उसने पहले महीने वही किया जो कोई भी करता। दीवार से चारपाई हटाई, फिर कमरे के दूसरे कोने में की, फिर ज़मीन पर बिस्तर लगाया। कान में रूई डाली। फिर इयरप्लग ख़रीदे। दीवार पर एक पुराना गद्दा टाँगा, जिससे भिनभिनाहट थोड़ी कम हुई और धमाका उतना ही रहा, क्योंकि वह हवा से नहीं, फ़र्श से आता था।
कुछ हफ़्तों में उसे एक चीज़ आ गई। धमाके से कोई दस सेकंड पहले भिनभिनाहट की आवाज़ थोड़ी पतली हो जाती थी। उतने में उसकी नींद खुल जाती और वह जागकर धमाके का इंतज़ार करता। इससे धमाका कम नहीं होता था। बस वह उसके लिए तैयार रहता था, और यह और बुरा था।
फिर उसने पूछा। मकान मालिक ने कहा कि मोटर रात को ही चलेगी। तीन फेज़ की बिजली रात साढ़े ग्यारह से डेढ़ बजे तक आती है, यही सरकारी रोस्टर है, और उसी में टंकी भरनी होती है। दिन में सिंगल फेज़ पर वह मोटर चलती ही नहीं।
यह किसी की बदमाशी नहीं थी। दिक़्क़त ठीक यही थी। ऊपर की चार मंज़िलों पर चौदह किराएदार थे। टंकी रात में न भरे तो सुबह ऊपर वाली दो मंज़िलों पर पानी नहीं चढ़ता। अंकित की नींद और चौदह घरों की सुबह, दोनों एक ही मोटर पर टिकी थीं, और उनमें से एक ही चीज़ मिल सकती थी।
फिर भी एक रास्ता था और अंकित को वह मालूम था। पंप रूम बिना नक़्शा पास कराए बनाया गया था और उसकी दीवार गली में डेढ़ फ़ुट आगे तक निकली हुई थी। नगर निगम में इसकी शिकायत करने पर वह सील हो जाता। शिकायत का काग़ज़ लिख भी लिया।
काग़ज़ उसने जमा नहीं किया। वजह ऊँची नहीं थी। तीसरी मंज़िल पर एक बुज़ुर्ग औरत रहती थीं जो सुबह छह बजे बाल्टी भरती थीं और चौथी पर दो लड़कियाँ थीं जो पौने सात की बस पकड़ती थीं। सील होने के बाद नया कनेक्शन बनवाने में कम से कम दस-बारह दिन लगते, और वे दस-बारह दिन उन्हीं के जाते, उसके नहीं।
क़ीमत उसने चुकाई। वह मामूली नहीं थी। दो साल उसने औसतन चार-साढ़े चार घंटे की नींद पर निकाले। दफ़्तर में दोपहर तक उसका काम ठीक रहता और उसके बाद गिर जाता। एक फ़ाइल में उसने वही ग़लती तीन बार की। नौकरी उसकी गई नहीं, पर जिस टीम में वह जा सकता था, उसमें उसे नहीं भेजा गया, और वजह किसी ने उसे नहीं बताई।
वह चीज़ें आज़माता रहा। ग्यारह बजे सोने की कोशिश छोड़कर उसने एक बजे के बाद सोना शुरू किया, पर सुबह सात बजे उठना था और हिसाब पूरा नहीं बैठता था। कुछ महीने उसने रात में पढ़ना शुरू किया, इस सोच के साथ कि जागना ही है तो काम आए। यह दो महीने चला और फिर छूट गया, क्योंकि थका हुआ आदमी पढ़ नहीं पाता, बस पन्ने पलटता है।
एक बात उसने ज़रूर सीखी, और वह मोटर के बारे में थी। वह जान गया कि धमाका किस वजह से होता है। मोटर बंद होते ही पाइप का पानी पीछे लौटता है और वापसी वाला वाल्व उसे रोकता है, और वही टकराव आवाज़ करता है। पुराने या घिसे वाल्व में यह ज़्यादा होता है। उसने यह किसी किताब में नहीं पढ़ा, बस दो साल हर रात उसी आवाज़ को सुनते रहने से समझ गया।
दो साल बाद उसे दूसरा कमरा मिल गया, थोड़ा महँगा, बड़ी सड़क की तरफ़। वहाँ रात भर ट्रक निकलते थे। आवाज़ ज़्यादा थी। पहले हफ़्ते के बाद उसे उसमें नींद आने लगी।
मकान उसने बिना किसी झगड़े के छोड़ा। मालिक ने पूरा एडवांस लौटा दिया और चलते वक़्त कहा कि कमरा जल्दी चढ़ जाएगा। यह सच निकला। संदीप नाम का एक लड़का दस दिन बाद उसी कमरे में आ गया।
अंकित उससे लगभग एक साल बाद मिला, बैंक की क़तार में, और बात निकली तो उसने वही कमरा बताया। संदीप ने कहा कि हाँ, वहीं है, ठीक है। अंकित ने मोटर के बारे में पूछा। संदीप ने कहा कि साढ़े ग्यारह बजे चलती है और एक बजे बंद होती है, और शुरू में अजीब लगती है, पर हफ़्ते भर में आदत पड़ जाती है। फिर उसने पूछा कि क्यों, कोई दिक़्क़त थी क्या। अंकित ने कहा कि नहीं, बस ऐसे ही पूछ लिया।