रमन के साथ मुश्किलें कतार बाँधकर आती थीं। एक ख़त्म नहीं होती कि दूसरी आ जाती। वह मेहनती था और ईमानदार भी। यही बात उसे और चुभती थी। जो लोग उससे कम मेहनत करते थे, उनका काम आसानी से चल रहा था। रमन रात को सोचता कि कमी कहाँ है, और सुबह उठकर फिर वही करता जो कल किया था।
रमन की दुकान स्कूल के मोड़ पर थी और उसमें साइकिलें ठीक होती थीं। पंचर, चेन, ब्रेक, रिम। वह काम पूरा करके ही छोड़ता था। अधूरा उससे होता नहीं था। अगर ट्यूब में दूसरी जगह भी कमज़ोरी दिखती तो वह बता देता, और अगर ग्राहक मना कर देता तो भी वह उसे चुपचाप ठीक कर देता और पैसे नहीं लेता। मोड़ के दूसरी तरफ़ शौकत की दुकान थी। शौकत जल्दी करता था और सस्ता करता था। शाम को शौकत की दुकान के बाहर आठ साइकिलें खड़ी होतीं। रमन की दुकान के बाहर दो।
यह बात रमन को अंदर से काटती थी। वह जानता था कि शौकत पंचर पर पंचर चिपकाता है और ट्यूब कभी नहीं बदलता। वह यह भी जानता था कि वही साइकिल तीन हफ़्ते बाद फिर शौकत के पास खड़ी होती है। यही उसका धंधा था। एक-दो बार उसने ग्राहकों को यह समझाने की कोशिश की। नतीजा उलटा निकला। लोग उसे जलने वाला समझने लगे। उसके बाद उसने समझाना बंद कर दिया और सिर्फ़ काम करने लगा, चुपचाप, पहले से भी ज़्यादा।
बरसात के बाद वाले महीने में एक आदमी अपने बेटे की साइकिल लेकर आया। रमन ने उसे पहचाना नहीं। चेहरा नया था। आदमी ने ख़ुद बताया, "पिछले साल आपने इसकी चेन बदली थी। साल भर चल गई।" फिर वह हँसा और बोला, "आपके यहाँ तो साल में एक ही बार आना पड़ता है।" उसने यह तारीफ़ की तरह कहा था। रमन ने इसे शिकायत की तरह सुना। पैसे लेकर उसने आदमी को विदा किया और फिर बहुत देर तक ख़ाली दुकान में बैठा रहा।
रात को माँ ने पूछा कि क्या हुआ। रमन ने वह बात दोहरा दी और कहा कि यही तो दिक़्क़त है, उसके यहाँ कोई दोबारा आता ही नहीं। माँ रोटी बेलती रहीं। उन्होंने कोई सलाह नहीं दी, पूछा कि क्या वह आदमी सच कह रहा था। रमन ने कहा, हाँ। माँ ने कहा, "तब तो उसने तेरे काम की तारीफ़ की।" इसके आगे उन्होंने कुछ नहीं जोड़ा। रमन उस रात सो नहीं पाया, इसलिए नहीं कि वह दुखी था, बल्कि इसलिए कि उसे लग रहा था कि कहीं कुछ है जो उसे दिख नहीं रहा।
सुबह वह चीज़ उसे दिख गई। बात सीधी थी। उसकी दुकान की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह थी कि उसका काम टिक जाता था। और यही उसकी ताक़त भी थी। बस वह उसे बेच नहीं रहा था। उसने एक गत्ते पर लिखा। फिर उसे दुकान के बाहर टाँग दिया: स्कूल की साइकिल, महीने में एक बार पूरी जाँच, बीस रुपये। ब्रेक, चेन, हवा, घंटी। नीचे उसने एक लाइन और जोड़ी: कुछ ख़राब निकला तो बताएँगे, बिना पूछे कुछ नहीं बदलेंगे।
पहले इतवार कोई नहीं आया। रमन सात बजे दुकान खोलकर बैठा रहा और दोपहर तक गत्ता वहीं टँगा रहा। दूसरे इतवार भी कोई नहीं आया, और शौकत ने मोड़ के उस पार से एक बार इधर देखा। रमन ने गत्ता नहीं उतारा। उसे उतार लेना सबसे आसान होता, क्योंकि उसे टाँगते हुए किसी ने देखा नहीं था और उतारते हुए पूरा मोड़ देखता।
पहले महीने ग्यारह लड़के आए। ज़्यादातर की साइकिलों में कुछ ख़ास नहीं निकला और रमन बीस रुपये लेकर उन्हें भेज देता। तीसरे महीने तक यह संख्या चौंतीस हो गई। उसने जाँच का दिन तय कर दिया, हर महीने का पहला इतवार, और उस दिन दुकान के बाहर लड़कों की क़तार लगने लगी। दोपहर तक हवा भरते-भरते उसका हाथ दुखने लगता था। यह दुखना उसे बुरा नहीं लगता था।
चौथे महीने की जाँच में एक लड़के की अगली ब्रेक की तार उसे आधी कटी मिली। रमन ने वह तार बदल दी और बीस रुपये के अलावा तीस और लिए। दो दिन बाद उस लड़के की माँ दुकान पर आईं। रमन को लगा कि वे तीस रुपये की बात करने आई हैं। वे उसका नाम पूछने आई थीं। सिर्फ़ नाम। स्कूल का रास्ता ढलान से उतरता था और उन्हें यह बात रात में सोते हुए याद आई थी।
अब जिन साइकिलों में सचमुच कोई ख़राबी होती, वह रमन को पहले पता चल जाती। ब्रेक की तार टूटने से पहले बदल जाती। चेन घिसने से पहले। अगली बरसात में जब शौकत के यहाँ भीड़ लगी हुई थी, रमन के ग्राहकों की साइकिलें चल रही थीं। दूसरे साल स्कूल के चौकीदार ने उससे कहा कि हेडमास्टर साहब पूछ रहे थे, क्या वह महीने में एक दिन स्कूल के अंदर, साइकिल स्टैंड के पास बैठ सकता है।
रमन आज भी वही काम करता है और उसी तरह करता है। उसने न कभी सस्ता किया, न कभी जल्दी। दोनों बातें अब भी वैसी ही हैं। मोड़ के दूसरी तरफ़ शौकत की दुकान भी चल रही है और शाम को उसके बाहर अब भी साइकिलें खड़ी रहती हैं। रमन को अब इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। इसलिए नहीं कि उसने सोचना बदल दिया है। इसलिए कि उसे अपनी साइकिलें गिनने से फ़ुर्सत नहीं मिलती।
पहले इतवार की सुबह वह दुकान सात बजे खोल देता है। लड़के आठ बजे से आने लगते हैं। रमन उनसे ज़्यादा बात नहीं करता। वह हवा भरता है, ब्रेक दबाकर देखता है, चेन पर उँगली फेरता है, और क़तार आगे खिसकती रहती है।