पानी उस साल आठ आषाढ़ को गिरा और गिरते ही सब कुछ एक साथ शुरू हो गया। गंगिया की टोली में चौदह औरतें थीं। कम नहीं, ज़्यादा नहीं।

रोपनी का काम बाक़ी सब कामों से अलग होता है। इसमें दिन नहीं होते, घंटे होते हैं। बिचड़ा तैयार खड़ा है, खेत में पानी भर चुका है, और अगर तीन-चार दिन में रोपाई न हुई तो बिचड़ा बूढ़ा हो जाता है। बूढ़े बिचड़े से धान आता है। पर आधा आता है।

इसीलिए उन दिनों टोली की क़ीमत सबसे ऊपर चली जाती है। दस दिन के लिए।

पूरे साल जो औरतें डेढ़ सौ पर मिलती हैं, वे आषाढ़ के उन दस दिनों में तीन सौ पर भी नहीं मिलतीं, क्योंकि हर खेत को एक ही हफ़्ते में रोपनी चाहिए। गंगिया इक्यावन की थी और बीस बरस से टोली बाँधती आई थी।

टोली बाँधना मज़दूरी करने से अलग काम है। किसानों से बात करना, दाम तय करना, दिन बाँटना, और झगड़ा होने पर बीच में खड़ा होना, यह सब उसी का था। बदले में उसे हर औरत के हिस्से से कुछ नहीं मिलता था। उसे बस काम पहले मिल जाता था। और यही बहुत था।

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चौथे आषाढ़ को उसने रामधन को हामी दे दी थी।

रामधन के पास कुल तीन बीघा थे और उसका खेत गाँव के पूरब की तरफ़ था। उसने बहुत पहले से कहकर रखा था और गंगिया ने दस तारीख़ का दिन उसे दे दिया था, दो सौ के हिसाब से। नौ तारीख़ की शाम को हरिशंकर का आदमी आया।

हरिशंकर के पास चौबीस बीघा थे और उसकी रोपनी दस से बारह तक चलनी थी। उसकी अपनी टोली किसी दूसरे गाँव में फँस गई थी और उसे तीन दिन के लिए चौदह औरतें चाहिए थीं। उसने तीन सौ का दाम लगाया। बिना मोल-भाव के।

फ़र्क़ सीधा था। तीन दिन, चौदह औरतें, सौ रुपये रोज़ का फ़र्क़। कुल बयालीस सौ। यह उन औरतों के लिए बड़ी रक़म थी। बहुत बड़ी। उस रात गंगिया के दरवाज़े पर सब जमा हो गईं।

मोतिया ने कहा कि रामधन को समझा देंगे, वह मान जाएगा। फेकनी ने कहा कि उसके बेटे की किताबें आनी हैं। सोहागी ने कहा कि रामधन के तीन बीघे कल नहीं तो परसों हो जाएँगे, हरिशंकर का काम आज नहीं तो कभी नहीं।

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सब बातें सही थीं। एक भी ग़लत नहीं थी। गंगिया ने सिर्फ़ इतना पूछा कि रामधन का बिचड़ा कितने दिन का है। किसी ने जवाब नहीं दिया, क्योंकि किसी ने देखा नहीं था।

उसने ख़ुद देखा हुआ था। छब्बीस दिन का था। तीन दिन और रुकता तो उनतीस का हो जाता, और उनतीस दिन के बिचड़े से रामधन की तीन बीघा ज़मीन पर उस बरस उतना ही निकलता जितना दो बीघा से निकलता है।

रामधन के पास और ज़मीन नहीं थी। कहीं भी नहीं। 'दस तारीख़ पूरब वाले खेत में है,' गंगिया ने कहा। मोतिया ने पूछा कि क्यों। 'क्योंकि मैंने कह दिया है।'

यही उसका पूरा जवाब था और उसमें कोई और बात नहीं थी। उसने यह नहीं कहा कि रामधन ग़रीब है। उसने यह भी नहीं कहा कि हरिशंकर अमीर है। दोनों बातें वहाँ खड़ी हर औरत जानती थी और दोनों से कुछ नहीं बदलता।

उस रात बात आगे नहीं बढ़ी। सब अपने-अपने घर चली गईं। दस तारीख़ को टोली रामधन के खेत में उतरी।

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काम एक ही दिन में हो गया, क्योंकि तीन बीघे के लिए चौदह औरतें ज़्यादा थीं, और दोपहर ढलने से पहले क़तार खेत के आख़िरी सिरे तक पहुँच गई। रामधन ने पैसे उसी शाम दे दिए, दो सौ के हिसाब से, और ऊपर से कुछ नहीं दिया, क्योंकि उसके पास था नहीं।

ग्यारह और बारह को हरिशंकर ने दूसरी टोली बुला ली। उसने वह टोली साढ़े तीन सौ पर बुलाई और उसमें ग्यारह ही औरतें थीं, इसलिए काम पूरा तीन दिन चला और उसका भी कुछ बिचड़ा बूढ़ा हुआ। पंद्रह तारीख़ को मोतिया ने टोली छोड़ दी। बिना कुछ कहे।

उसके साथ फेकनी और चनरकली भी चली गईं। तीनों ने दूसरे गाँव की एक टोली पकड़ ली, जिसका दाम ऊँचा था और जिसमें दिन का हिसाब हर बार नया होता था। गंगिया ने उन्हें रोका नहीं। वजह वह पहले से जानती थी, इसलिए पूछी भी नहीं।

हरिशंकर ने उस बरस और अगले बरस भी उसे नहीं बुलाया। तीसरे बरस उसने बुलवाया, क्योंकि उसकी अपनी टोली बिखर चुकी थी, और तब भी उसने दाम पहले से एक रुपया नहीं बढ़ाया। रामधन उसके बाद हर बरस सबसे पहले आता रहा। आषाढ़ लगने से भी पहले, जेठ में ही, वह एक बार आकर दिन पक्का कर जाता था।

उसकी तीन बीघा से गंगिया की टोली को साल में एक दिन का काम मिलता है। उसका दाम कभी बाज़ार वाला नहीं होता।

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टोली अब भी चलती है और उसमें ग्यारह औरतें हैं। गंगिया खेत अब भी चौदह औरतों के हिसाब से लेती है, क्योंकि कम लेने पर पूरे बरस का हिसाब नहीं बैठता। इसका मतलब यह है कि रोपनी के उन दिनों में उनका काम अँधेरा होने के बाद तक चलता है, और आषाढ़ की उन शामों में क़तार के आख़िरी सिरे पर लालटेन रखनी पड़ती है।